हेडगेवार-गोलवलकर ने स्वाधीनता संग्राम के प्रति अपनी नफरत को कभी नहीं छुपाया!

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दुनिया में कोई भी देश या समाज कभी भी अपनी किसी पराजय का दिवस नहीं मनाता है। लेकिन भारत अब दुनिया का ऐसा पहला और एकमात्र देश हो गया है जो हर साल 14 अगस्त को अपनी पराजय का दिवस मनाएगा। देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार लोगों का कच्चा चिट्ठा खोलती वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन के लेख की “दूसरी किस्त”

● अनिल जैन

जिस तरह भारत-विभाजन की ऐतिहासिक विभीषिका इतिहास में अमिट है और जिसे कोई भुला या झुठला नहीं सकता, उसी तरह इस हकीकत को भी कोई नहीं नकार या नजरअंदाज कर सकता है कि मौजूदा सत्ताधीशों के वैचारिक पुरखों का भारत के स्वाधीनता संग्राम से कोई सरोकार नहीं था। यही नहीं, धर्म पर आधारित दो राष्ट्र हिंदू और मुसलमान का विचार भी सबसे पहले उन्होंने ही पेश किया था, जिसे बाद में मुस्लिम लीग ने भी अपनाया और उसी के आधार पर उसने पाकिस्तान हासिल किया।

भारत के मौजूदा सत्ताधीशों और उनके राजनीतिक संगठन (भारतीय जनता पार्टी) की गर्भनाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और हिंदू महासभा से जुड़ी हुई है। इन दोनों ही संगठनों ने स्वाधीनता संग्राम से न सिर्फ खुद को अलग रखा था बल्कि स्पष्ट तौर पर उसका विरोध भी किया था। 

यही नहीं, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में जब भारत का स्वाधीनता संग्राम अपने तीव्रतम और निर्णायक दौर में था, उस दौरान तो उस आंदोलन का विरोध करते हुए आरएसएस और हिंदू महासभा के नेता पूरी तरह ब्रिटिश हुकूमत की तरफदारी कर रहे थे।

पाकिस्तान के स्वप्नदृष्टा और संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने तो बहुत बाद में अपने आपको स्वाधीनता आंदोलन से अलग कर पाकिस्तान का राग अलापना शुरू किया था, लेकिन आरएसएस और हिंदू महासभा का तो शुरू से ही मानना था कि हिंदू और मुसलमान दोनों अलग-अलग राष्ट्र हैं और दोनों कभी एक साथ रह ही नहीं सकते। 

जिस तरह मुस्लिम लीग देश के मुसलमानों में हिंदुओं के प्रति नफरत फैलाने के काम में सक्रिय थी, उसी तरह आरएसएस हिंदुओं के मन में मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाने में जुटा हुआ था। यानी दोनों ही किस्म की सांप्रदायिक ताकतें अंग्रेज हुकूमत के एजेंडा पर काम कर रही थीं।

वैसे स्वाधीनता आंदोलन से अपनी दूरी और मुसलमानों के प्रति अपने नफरत भरे अभियान को आरएसएस ने कभी छुपाया भी नहीं। आरएसएस के संस्थापक पहले सर संघचालक (1925-1940) केशव बलिराम हेडगेवार ने सचेत तरीक़े से आरएसएस को ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई से अलग रखा। इसके अलावा उन्होंने बड़ी ईमानदारी के साथ ऐसी किसी भी राजनीतिक गतिविधि से भी आरएसएस को अलग रखा, जिसके तहत उसे ब्रिटिश हुकूमत के विरोधियों के साथ नत्थी नहीं किया जा सके। 

हेडगेवार की आधिकारिक जीवनी में स्वीकार किया गया है- ”संघ की स्थापना के बाद डॉक्टर साहब अपने भाषणों में हिन्दू संगठन के बारे में ही बोला करते थे। सरकार पर टीका-टिप्पणी नहीं के बराबर रहा करती थी।’’

महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश के सभी समुदायों की एकताबद्ध लड़ाई की कांग्रेस की अपील को ठुकराते हुए हेडगेवार ने कहा था- ”हिंदू संस्कृति हिंदुस्तान की जिंदगी की सांस है। इसलिए स्पष्ट है कि अगर हिंदुस्तान की रक्षा करनी है तो हमें सबसे पहले हिंदू संस्कृति का पोषण करना होगा।’’

हेडगेवार ने गांधी जी के नमक सत्याग्रह की भी निंदा करते हुए कहा- ”आज जेल जाने को देशभक्ति का लक्षण माना जा रहा है।…जब तक इस तरह की क्षणभंगुर भावनाओं के बदले समर्पण के सकारात्मक और स्थाई भाव के साथ अविराम प्रयत्न नहीं होते, तब तक राष्ट्र की मुक्ति असंभव है।’’ कांग्रेस के नमक सत्याग्रह और ब्रिटिश सरकार के बढ़ते हुए दमन के संदर्भ में उन्होंने आरएसएस कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया था, ”इस वर्तमान आंदोलन के कारण किसी भी सूरत में आरएसएस को ख़तरे में नहीं डालना है।’’

1940 में हेडगेवार की मृत्यु के बाद आरएसएस के प्रमुख भाष्यकार और दूसरे सरसंघचालक और माधव सदाशिव गोलवलकर ने भी स्वाधीनता आंदोलन के प्रति अपनी नफरत को नहीं छुपाया। वे अंग्रेज शासकों के विरुद्ध किसी भी आंदोलन अथवा कार्यक्रम को कितना नापसन्द करते थे इसका अंदाज़ा उनके इन शब्दों से लगाया जा सकता है- ”नित्यकर्म में सदैव संलग्न रहने के विचार की आवश्यकता का और भी एक कारण है। समय-समय पर देश में उत्पन्न परिस्थिति के कारण मन में बहुत उथल-पुथल होती ही रहती है। 1942 में ऐसी उथल-पुथल हुई थी। उसके पहले 1930-31 मे भी आंदोलन हुआ था। उस समय कई लोग डॉक्टर जी (हेडगेवार) के पास गए थे। इस ‘शिष्टमंडल’ ने डॉक्टर जी से अनुरोध किया कि इस आंदोलन से देश को आज़ादी मिल जाएगी और इसलिए संघ को पीछे नहीं रहना चाहिए।

उस समय एक सज्जन ने जब डॉक्टर जी से कहा कि वह जेल जाने के लिए तैयार हैं, तो डॉक्टर जी ने कहा-‘ज़रूर जाओ। लेकिन पीछे आपके परिवार को कौन चलाएगा?’ उस सज्जन ने बताया, ‘दो साल तक केवल परिवार चलाने के लिए ही नहीं, आवश्यकता अनुसार जुर्माना भरने की भी पर्याप्त व्यवस्था उन्होंने कर रखी है।’ तो डॉक्टर जी ने कहा-‘आपने पूरी व्यवस्था कर रखी है तो अब दो साल के लिए संघ का ही कार्य करने के लिए निकलो।’ घर जाने के बाद वे सज्जन न जेल गए न संघ का कार्य करने के लिए बाहर निकले।’’

गोलवलकर द्वारा प्रस्तुत इस ब्यौरे से यह बात साफ तौर पर सामने आ जाती है कि आरएसएस का मकसद स्वाधीनता संग्राम के प्रति आम लोगों को निराश व निरुत्साहित करना था। ख़ासतौर से उन देशभक्त लोगों को, जो अंग्रेजी शासन के ख़िलाफ़ कुछ करने की इच्छा लेकर घर से आते थे। 

वैसे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के प्रति आरएसएस का हिकारत भरा रवैया गोलवलकर के इस शर्मनाक वक्तव्य से भी जाना जा सकता है- ”सन 1942 में भी अनेक लोगों के मन में तीव्र आंदोलन था। उस समय भी संघ का नित्य कार्य चलता रहा। प्रत्यक्ष रूप से संघ ने कुछ न करने का संकल्प किया। परन्तु संघ के स्वयंसेवकों के मन में उथल-पुथल चल ही रही थी। संघ अकर्मण्य लोगों की संस्था है, इनकी बातों का कुछ अर्थ नहीं, ऐसा केवल बाहर के लोगों ने ही नहीं, कई अपने स्वयंसेवकों ने भी कहा। वे बड़े रुष्ट भी हुए।’’

इस तरह स्वयं गोलवलकर के बयान से यह तो पता चलता है कि आरएसएस ने भारत छोड़ो आंदोलन के पक्ष में प्रत्यक्ष रूप से किसी भी तरह की हिस्सेदारी नहीं की थी। लेकिन आरएसएस के किसी प्रकाशन या दस्तावेज़ या स्वयं गोलवलकर के किसी वक्तव्य से आज तक यह भी पता नहीं चलता है कि आरएसएस ने अप्रत्यक्ष रूप से भारत छोड़ो आंदोलन में किस तरह की हिस्सेदारी की थी। गोलवलकर का यह कहना कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान आरएसएस का ‘रोज़मर्रा का काम’ ज्यों का त्यों चलता रहा, बहुत अर्थपूर्ण है। 

यह रोज़मर्रा का काम क्या था? इसे समझना ज़रा भी मुश्किल नहीं है। यह काम था मुसलिम लीग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हिंदू और मुसलमान के बीच की खाई को गहराते जाना। 

इस ‘महान’ सेवा के लिए कृतज्ञ अंग्रेज़ शासकों ने इन्हें अपनी कृपा से नवाज़ा भी। यह गौरतलब है कि औपनिवेशिक शासन में आरएसएस और मुस्लिम लीग पर कभी भी प्रतिबंध नहीं लगाया गया।

सच तो यह है कि गोलवलकर ने स्वयं भी कभी यह दावा नहीं किया कि आरएसएस अंग्रेज़ विरोधी संगठन था। अंग्रेज शासकों के चले जाने के बहुत बाद गोलवलकर ने 1960 में मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में अपने एक भाषण में कहा- ”कई लोग पहले इस प्रेरणा से काम करते थे कि अंग्रेजों को निकाल कर देश को स्वतंत्र कराना है। अंग्रेजों के औपचारिक रूप से चले जाने के बाद यह प्रेरणा ढीली पड़ गयी। वास्तव में इतनी ही प्रेरणा रखने की आवश्यकता नहीं थी। हमें स्मरण रखना होगा कि हमने अपनी प्रतिज्ञा में धर्म और संस्कृति की रक्षा कर राष्ट्र की स्वतंत्रता का उल्लेख किया है। उसमें अंग्रेज़ों के जाने न जाने का कोई उल्लेख नहीं है।’’

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

(अभी जारी है) 

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