पेगासस जासूसी : देशद्रोहियों का देश!

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“दो सौ साल में अंग्रेज जितने देशद्रोही नहीं खोज पाए, हमने कुछ साल में ही उससे ज्यादा देशद्रोही पैदा कर दिए”

● कुमार प्रशांत

पेगासस जासूसी मामले में कौन किस तरफ खड़ा है, यह तो पता नहीं लेकिन इससे यह तो पता चला ही है कि देश के हर कोने में देशद्रोही जड़ जमाए बैठे हैं। अगर सरकार नहीं तो कोई है जो विदेशी ताकतों की मदद से देशद्रोहियों का काम तमाम करने में लगा है। लेकिन सरकार की जानकारी के बिना कोई ऐसा कर पा रहा है, तो खतरा यह है कि वह देश का काम ही तमाम कर देगा। दो सौ से ज्यादा साल में अंग्रेज जितने देशद्रोही नहीं खोज पाए थे, हमने महज सात साल में उससे ज्यादा देशद्रोही पैदा कर दिए। अब तो शंका होने लगी है कि इस देश में देशभक्त ज्यादा हैं या देशद्रोही।

मन में यह बात उठती है कि जिस सरकार से समाज तौबा कर लेता है, उसे वह बदल डालता है, तो जिस समाज से सरकार तौबा कर ले उसे क्या करना चाहिए? सीधा जवाब तो यही सूझता है कि सरकार को भी अपना समाज बदल लेना चाहिए। जैसे जनता नई सरकार चुनती है, सरकार को भी नई जनता चुन लेनी चाहिए।

देशद्रोह का यही सवाल हमारे सर्वोच्च न्यायालय को भी परेशान कर रहा है।

सरकार जनता की बनाई वह संरचना है जो बहुत हुआ तो पांच साल के लिए है। हमने उसका संवैधानिक दायित्व यह तय किया कि वह अपना काम इस तरह करे कि संप्रभु जनता का इकबाल बना रहे व बढ़ता भी रहे। फिर हमने न्यायपालिका की कल्पना की। वह इसलिए कि जब भी और जहां भी सरकार खुद को संप्रभु मानने लगे, वहां न्यायपालिका अंपायर बन कर खड़ी हो। वह देखे कि लोकतंत्र का हर खेल नियम से हो। खेल के नियम के लिए हमने उसे संविधान दिया। लेकिन इस भूमिका में वह विफल हुई है। उसके सामने कई मौकों पर खेल के नियम ऐसे बदल दिए गए कि खेल ही बदलता गया। बनाना था लोकतंत्र, बन गया तंत्रलोक!

हमारे मुख्य न्यायपालक एन.वी. रमण ने सवाल खड़ा किया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए का आजादी के 70 साल बाद भी बने रहने का औचित्य क्या है? 1870 में यह धारा भारतीय दंड संहिता में उस औपनिवेशिक ताकत ने दाखिल की थी जो न भारतीय थी, न लोकतांत्रिक। लेकिन वह तब हुआ जब न हमारे पास आजादी थी, न लोकतंत्र, न संविधान। जब हमारे पास यह सब हो गया तब भी न्यायपालकों ने अंपायर की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि सत्ता की टीम की तरफ से खेलने लगे।

1962 में 124ए की वैधानिकता का सवाल अदालत के सामने आया था। तब अदालत ने न इसकी पृष्ठभूमि देखी, न लोकतांत्रिक वैधानिकता की कसौटी पर इसे कसा, बल्कि फैसला दिया कि यह धारा सिर्फ उस व्यक्ति के खिलाफ इस्तेमाल की जाएगी जो सामाजिक असंतोष भड़काने का अपराधी होगा। जजों को जमीनी हकीकत का कितना कम पता होता है! ‘सामाजिक असंतोष भड़काना’ ऐसा मुहावरा है जिसकी आड़ में किसी को फंसाना या फंसवाना सरल है।

आपातकाल न्यायपालिका के लिए कालिमामय है। 1976 के हैबियस कॉर्पस मामले में जिस तरह अदालत ने फैसला दिया कि राज्य नागरिकों के जीने के अधिकार पर भी हाथ डाल सकता है, वह संविधान का अपमान ही नहीं, वैधानिक कायरता का चरम था। नागरिक अधिकारों का गला घोंटने वाला एनएसए जैसा कानून 1977 में मिली दूसरी आजादी के तुरंत बाद, 1980 में पारित हुआ।

1994 में सत्ता एक कदम आगे बढ़ी और टाडा आया। 1996 में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट बना और 2004 में पोटा! इसने वह रास्ता तैयार किया जिस पर चल कर यूएपीए नागरिकों की गर्दन तक पहुंचा। ये सारे कानून सत्ता के कायर चरित्र और न्यायपालिका के शुतुरमुर्ग बन जाने की शर्मनाक कहानी कहते हैं।

गांधीजी ने न्यायपालिका का चरित्र रेखांकित करते हुए कहा था कि जब भी राज्य के अनाचार से सीधे मुकाबले की घड़ी आएगी, न्यायपालिका यथास्थिति की ताकतों के साथ खड़ी मिलेगी। तब हमने समझा था कि गांधीजी विदेशी न्यायपालिका के बारे में कह रहे हैं जबकि वे सत्ता व सत्ता की कृपादृष्टि की याचक सभी संरचनाओं के बारे में कह रहे थे।

राष्ट्रद्रोह और राज्यद्रोह में गहरा और बुनियादी फर्क है। महात्मा गांधी ने खुली घोषणा कर रखी थी कि वे राज के कट्टर दुश्मन हैं क्योंकि वे राष्ट्र को दम तोड़ती कायर भीड़ में बदलते नहीं देख सकते।

सत्ता को सबसे अधिक डर असहमति से लगता है। विडंबना देखिए कि लोकतंत्र असहमति के ऑक्सीजन पर ही जिंदा रहता है, जबकि सत्ता के लिए असहमति कार्बन गैस बन जाती है।

124ए से हाथ धो लेने की चीफ जस्टिस रमण की बात के जवाब में एटॉर्नी जेनरल के.के. वेणुगोपाल अदालत में ठीक वही कह रहे हैं जो सत्ता व न्यायपालिका ने अब तक नागरिक अधिकारों के पांव काटने वाले हर कानून को जन्म देते वक्त कहा है- सावधानी से इस्तेमाल करें!

यह कुछ वैसा ही है जैसे बच्चे के हाथ में चाकू दे दें और उस पर पर्ची लगा दें- सावधानी से चलाएं! बच्चा उससे अपनी गर्दन काट ले सकता है; काइयां सत्ता उससे हमेशा ही असहमत नागरिक की गर्दन काटती है। यह इतिहास सिद्ध भौगोलिक सच्चाई है। फिर न्यायपालिका इतनी अबोध कैसे हो सकती है कि सत्ता के हाथ में बड़े-से-बड़ा चाकू थमाने की स्वीकृति देती जाए?

जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ कहते हैं कि जब भी, जहां भी बहुमतवादी मानसिकता सर उठाती नजर आए, तभी उससे रू-ब-रू होना चाहिए। ‘‘ऐसा न करना हमारे पुरुखों ने भारत को जिस संवैधानिक गणतंत्र के रूप में स्वीकार किया था, उस पवित्र अवधारणा से छल होगा।’’

संविधान प्रदत्त शक्ति वाली न्यायपालिका के लिए चुनावी और संवैधानिक बहुमत का फर्क करना और उसे अदालती फैसले में दर्ज करना आसान है क्योंकि संविधान की संप्रभु जनता ऐसे हर प्रयास में उसके साथ खड़ी रहेगी। हम जानते हैं कि खड़ा तो अपने पांव पर ही होना होता है, फिर परछाई भी आपको सहारा देने आ जाती है।

(लेखक गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष और वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं। यहां व्यक्त विचार निजी हैं।)

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