…तो औरतबाज नेताओं के कारण बंगाल में हारी भाजपा!
तृणमूल से भाजपा में आए शुभेंदु अधिकारी की प्रधानमंत्री व गृहमंत्री और अन्य नेताओं के साथ मुलाकात भले ही सुर्खियां बटोर रही हो, लेकिन असली बम तो वरिष्ठ भाजपा नेता एवं त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल तथागत राय ने चुपके से फोड़ा है।
● पूर्वा स्टार ब्यूरो
बंगाल विधान सभा चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक देने के बावजूद ममता बनर्जी से मिली शिकस्त से औंधे मुंह गिरे संघ-भाजपा के लिए यह और भी बुरी खबर है। चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रैलियों में मंच से जब चिल्ला चिल्लाकर ‘खेला होबे’ का स्लोगन उछाल रहे थे तब उन्हें जरा भी भान नहीं था कि उनकी पार्टी के नेता एक अलग ही ‘खेला’ में मस्त थे। वरिष्ठ भाजपा नेता व त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल तथागत राय के इस खुलासे के बाद कि बंगाल चुनाव के दौरान दिल्ली से भेजे गए नेता चुनाव की जगह औरतबाजी में मस्त थे जिसकी वजह से पार्टी हार गई, संघ-बीजेपी खेमे में भूचाल ला दिया है।
हिंदी दैनिक ‘सन्मार्ग’ की एक रिपोर्ट के अनुसार तथागत राय रविवार से दिल्ली में हैं और इस बीच उन्होंने अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से लंबी बैठकें कर बंगाल चुनाव में पार्टी की हार को लेकर गोपनीय रिपोर्ट सौंपी है। इसमें दावा किया गया है कि भाजपा के कुछ बड़े नेता ‘वूमेनाइज़र’ यानी औरतबाज हैं।
रिपोर्ट में दो बंगाली महिलाओं, जिन्हें वे विषकन्या कहते हैं, के नाम का जिक्र विशेष रूप से करते हुए लिखा है कि इन नेताओं की इस कमजोरी का एक दल ने फायदा उठाया और इनको जाल में फंसाने के लिए विषकन्याएं भेजीं। ये उनके जाल में फंस भी गए, इसी कारण पार्टी हारी।
दिलीप, कैलाश, शिवप्रकाश और मेनन पर फोड़ा ठीकरा
तथागत राय ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार और दुर्गति के लिए मुख्य रूप से उच्च चुनाव प्रबंधन कमेटी पूरी तरह से जिम्मेदार है। उच्च कमेटी के सदस्य दिलीप घोष, कैलाश विजयवर्गीय, शिव प्रकाश और अरविंद मेनन न केवल अयोग्य हैं बल्कि नैतिक और राजनीतिक दृष्टि से पूरी तरह भ्रष्ट हैं। दिलीप घोष को न राजनीतिक समझ है और न ही ज्यादा पढ़े लिखे हैं।
तथागत राय भाजपा के इन चार नेताओं को हार के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए पहले भी ट्वीट कर चुके हैं लेकिन अपनी रिपोर्ट में तो उन्होने आश्चर्यजनक खुलासे किए हैं।
न बंगाल की भाषा समझते, न भावनाएं
तथागत राय ने लिखा है कि दिलीप को छोड़कर बाकी तीनों का बंगाल की संस्कृति, भाषा, बंगाली भावनाओं, अस्मिता, संवेदनाओं और आकांक्षाओं से कुछ लेना-देना नहीं है। न ही बंगाली जनमानस की समझ है।
बंगालियों को अपनी भाषा से बहुत लगाव और संस्कृति पर बहुत गर्व होता है, लेकिन बंगाली भावनाओं को पूरी तरह से दरकिनार करके चुनाव प्रचार अभियान की रचना की गयी। कमेटियों का गठन भी बंगालियों की संवेदनाओं के अनुसार नहीं किया गया।
अच्छा होता बंगाली भाषियों के हाथ में चुनाव प्रचार की कमान दी जाती। पुराने, वरिष्ठ और अनुभवी बंगाली भाजपा नेताओं की अनदेखी की गयी, जिसकी भाजपा को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।
नासमझी ने किये कराये पर पानी फेर दिया
तथागत राय ने कहा कि राम के नाम का जो धर्म का कार्ड बंगाल में खेला गया, उससे भी भाजपा को बहुत नुकसान हुआ। जैसे ओडिशा में भगवान जगन्नाथ, असम में शंकर देवा, महाराष्ट्र में गणपति बप्पा घर-घर के देवता हैं, उसी तरह मां काली बंगाल की अधिष्ठात्री और आराध्य देवी हैं लेकिन चुनाव प्रचार में कहीं भी मां काली का नाम ही नहीं लिया गया। इससे बंगालियों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।
राय ने दावा किया है कि भाजपा यह चुनाव जरूर जीत जाती लेकिन घोष, विजयवर्गीय, शिव प्रकाश और मेनन की नासमझी ने किये कराये पर पानी फेर दिया। उन्होंने आशंका जतायी है कि अब राज्य में ज्यादातर भाजपा कार्यकर्ता भाजपा छोड़ कर टीएमसी में शामिल हो जायेंगे।
