परिवर्तनकारी ऐतिहासिक फैसलों के कारण हमेशा याद किए जाएंगे लालू प्रसाद यादव

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लालू प्रसाद यादव अपने परिवर्तनकारी ऐतिहासिक निर्णयों की वजह से खुदरंग राजनेता के रूप में इतिहास में दर्ज़ किये जाएंगे।

● जयंत जिज्ञासु

जैसे महात्मा गांधी अपने वक्त की उपज कहे जाते हैं, वैसे ही लालू प्रसाद यादव अपने समय की तमाम विडंबनाओं के बीच बिहार की राजनीति के मानचित्र पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। भारतीय समाज आरंभ से असमानताओं से भरा रहा है जहां कुछ के पास सबकुछ है और कुछ के पास कुछ भी नहीं।

आज़ादी के बाद गैर-बराबरी की इस खाई को पाटने की कुछ कोशिशें ज़रूर हुईं। पर बिहार जैसे सूबे में जहां सामंती हनक कुछ ज़्यादा ही थी, वहां संसाधन का समान वितरण व हर क्षेत्र में हर सामाजिक समूह के लिए समुचित भागीदारी एक दुरूह कार्य था।

1974 के छात्र आंदोलन में जयप्रकाश नारायण (जेपी) का विश्वास अर्जित करने के बाद 1977 के चुनाव में लालू प्रसाद बिहार से इकलौते छात्र नेता थे जो लोकसभा पहुंचे। अगला चुनाव हारने के बाद वे 1980 और 1985 में विधानसभा के दरवाजे पर दस्तक देते हैं और कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद नेता प्रतिपक्ष बनते हैं। लालू प्रसाद ने सोये हुए लोगों को नींद से झकझोरा और लड़ने-भिड़ने के लिए तैयार करना शुरू किया।

उनकी आमद उस वक्त होती है जब बिहार में कोई सरकार 5 साल का अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती थी। 10 मार्च, 1990 को मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार की राजनीति में एक ऐसा पैराडाइम शिफ्ट हुआ कि लोग लालू पूर्व युग व उत्तर लालू युग की राजनीति की बात करते हैं।

सामाजिक न्याय का संघर्ष

जेपी की प्रतिमा के आगे शपथ लेने के बाद उन्होंने अपनी देहभाषा से ही यह संकेत दे दिया कि सबके लिए प्रतिष्ठापूर्ण जीवन सुनिश्चित करना ही उनकी पहली प्राथमिकता होगी। सामाजिक न्याय के संघर्ष को उन्होंने दरअसल मनुष्यता का संघर्ष बनाया।

इसके लिए उन्होंने बाबा साहब आंबेडकर के ‘शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित रहो ‘ के सूत्र वाक्य को पकड़ा। अपने पहले कार्यकाल में सबसे ज़्यादा प्राथमिक विद्यालय, स्वास्थ्य-केंद्र, प्रखंड, अनुमंडल, ज़िला व विश्वविद्यालय खोले। जैसे गांधी ने कहा, ‘करो या मरो‘, वैसे ही लालू प्रसाद कहा करते थे, ‘पढ़ो या मरो’।

वे आह्वान करते थे, ‘जन्म दिया तो शिक्षा दो’। चरवाहा विद्यालय एक सर्वथा अनूठा प्रयोग था, जिसकी मूल भावना थी- ‘गैया-बकरी चरती जाय, मुनिया बेटी पढ़ती जाय’। युवा वर्ग के लिए उन्होंने 6 और राबड़ी देवी ने एक विश्वविद्यालय की स्थापना की। लालू प्रसाद ने 15 जिले, एक पुलिस जिला और राबड़ी देवी ने एक जिला बनाया।

जहां लालू यादव के कार्यकाल में किसानों को प्रति बीघा मालगुजारी 3-5 रुपये देने होते थे, वहीं आज 300-500 रुपये देने पड़ते हैं। लालू प्रसाद ने हर समुदाय की आवश्कताओं को ध्यान में रखा और उनके लिए भी ज़मीनी स्तर पर काम किया।

2 मार्च 1991 से उन्होंने पाम ट्री टैक्स (ताड़ी कर) माफ किया और ताड़ी बेचने के लिए लाइसेंस की जरूरत समाप्त कर दी। इससे पासी समुदाय को रोजगार में सहूलियत मिली। लालू प्रसाद ने अपने कार्यकाल में निर्बलों और बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा पेंशन 30 रुपये से बढ़ाकर 100 रुपये प्रति महीना एवं बेरोजगारी भत्ता 50 रुपये से बढ़ाकर 100 रुपये किया। जब विश्वविद्यालयों का शिक्षा बजट केरल में 21 करोड़ और यूपी में 68 करोड़ का होता था, तो लालू प्रसाद ने बिहार में उसे 105 करोड़ से बढ़ाकर 156 करोड़ कर दिया था।

पहले तीन साल के कार्यकाल में उन्होंने भूमिहीनों और बेघरों को 16253 गृहस्थल बांटा। एक लाख हस्तकरघा बुनकरों को समूह बीमा के तहत लाने में वे सफल रहे और 50 हजार बुनकरों का बीमा हुआ। दंगा-पीड़ित भागलपुर के बुनकरों के लिए विशेष योजनाएं सफलीभूत कीं। सुदूर देहात के बहुतेरे गांवों में पहली बार बिजली पहुंचाई।

आज स्वच्छता अभियान को ज़ोर-शोर से मीडिया में प्रचारित किया जा रहा है, पर अब से कई बरस पहले अगर किसी सोशलिस्ट लीडर ने हर समाज के लोगों की साफ-सफाई को गंभीरता से अपना राजनैतिक व सामाजिक कार्य बनाया, तो वे थे लालू प्रसाद। डोम-मुसहर तबके के बच्चों को नहलाना, नाखून कटवाना व स्कूल जाने पर प्रतिदिन 1 रुपये देने की उन्होंने योजना चलाई। लालू प्रसाद ने जिनके तन पर वस्त्र नहीं था, उनके लिए साड़ी व धोती योजना चलाई। ये अंत्योदय हेतु ज़रूरी कदम थे।

‘डेवलेपमेंट फॉर ऑल का मॉडल’

स्वामीनाथन अय्यर ‘लालू यादव बीट्स नेहरू हॉलो ‘ नामक आलेख में कहते हैं, ‘जहां 1980-91 के दशक में बिहार का ग्रोथ रेट 4.66 प्रतिशत था, वहीं लालू-राबड़ी शासनकाल के आखिरी 12 वर्षों में विकास दर 4.89 प्रतिशत रहा। 4.89 प्रतिशत ग्रोथ रेट को ज़ीरो डिवलपमेंट नहीं कहा जा सकता। 1991-2001 के बीच जहां भारत की साक्षरता दर में वृद्धि 23 फीसदी थी, वहां लालू के नेतृत्व में बिहार 27 फीसदी की दर से अपनी साक्षरता को बढ़ा रहा था। इसे ठप्प विकास का दशक नहीं कहा जा सकता।’

लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के शासनकाल में 1996 में विश्वविद्यालय सेवा आयोग द्वारा राज्य के 11 विश्वविद्यालयों में 1300 अध्यापक बहाल किए गए और 2003 में राबड़ी देवी ने 1050 अध्यापकों की नियुक्ति की। यूनिवर्सिटी सर्विस कमीशन के चेयरमैन पद पर प्रो. अब्दुल वहाब (दो बार) और सरदार देवनंदन सिंह को बिठाया। वहीं कॉलेज सर्विस कमीशन का चेयरमैन लालू प्रसाद ने दो बार डॉ. बालेश्वर प्रसाद (कुशवाहा) और एक बार प्रो. संजीवन सिन्हा (ईबीसी) को बनाया।

लालू प्रसाद व राबड़ी देवी के द्वारा बिहार में तीन बार स्कूली शिक्षकों की नियुक्ति बीपीएससी के माध्यम से की गई जिसे अब तक का बिहार में सबसे बेहतरीन और निष्पक्ष शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया माना जाता है। और आज भी बिहार की शिक्षा व्यवस्था को लालू प्रसाद के शासनकाल में नियुक्त शिक्षक ही बचाए हुए हैं। खुद मेरे पिताजी 1994 में बहाल हुए शिक्षक थे। 1994 में 25 हज़ार शिक्षकों की बहाली हुई। विद्यालय सेवा बोर्ड के ज़रिए हाई स्कूल में व कल्याण विभाग में शिक्षकों की भर्ती हुई।

झालमुड़ी की तरह ‘डिग्री लाओ, नौकरी पाओ‘ की नीतीश की कुनीति ने तो प्राथमिक शिक्षा का बंटाधार ही कर दिया। बीपीएससी की परीक्षा को ज़िला मुख्यालयों से हटाकर राजधानी में कराने का निर्णय लेकर लालू ने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की शुरुआत की।

लालू प्रसाद ने अल्पसंख्यक आयोग को कानूनी दर्जा दिया। उर्दू को बिहार लोकसेवा आयोग की भाषा बनाई। पासी भाइयों को पारंपरिक रोज़गार में सहूलियत देने के उद्देश्य से उन्होंने ‘ताड़ी कर’ हटाया। पहले ताड़ी चुआने के लिए टैक्स देना पड़ता था। गंगा के मैदानी भाग में मछली पालन व नौका चालन मछुआरों व मल्लाहों की आजीविका का मुख्य साधन रहा है। लालू प्रसाद ने 1990 में सुल्तानगंज से पीपपैंती (भागलपुर) तक मुगलों के ज़माने से चली आ रही ज़मींदारी प्रथा को समाप्त किया। और, साल भर बाद 1991 में उन्होंने कानून बना कर सूबे को ‘जल कर’ के जंजाल से मुक्त किया।

1993 में सर पर मैला ढोले वाली अमानुषिक प्रथा के खिलाफ कड़ाई से कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किया। लीची का निर्यात बड़े पैमाने पर शुरू कराया।

इसमें कोई दो मत नहीं कि लालू प्रसाद का शासनकाल ‘ढिंढोरावादी विकास मॉडल‘ से इतर ‘डेवलेपमेंट फॉर ऑल‘ था।

उन्होंने डोम समाज से आने वाले भोलाराम तूफानी को मंत्री बनाया। राजद के प्रदेश अध्यक्ष दलित समाज से आने वाले रमई राम, उदय नारायण चौधरी, कमल पासवान, अकलियत समाज से आने वाले अब्दुल बारी सिद्दिक़ी, अति पिछड़े समाज से आने वाले डॉ. रामचंद्र पूर्वे और अगड़े समाज से आने वाले जगदानंद सिंह रहे हैं।

लालू प्रसाद सामाजिक न्याय को सिर्फ निर्गुण रूप में नहीं, बल्कि उसे लैंगिक न्याय की परिधि में सगुण ढंग से सुनिश्चित करने वाले संवेदनशील मुख्यमंत्री थे। सत्ता में आने के 2 साल के अंदर आज से 29 साल पहले उन्होंने कामकाजी महिलाओं के लिए माहवारी के दिनों में दो दिन के विशेष अवकाश का प्रावधान किया था। वह काम आज भी इस देश के कितने सूबों के मुख्यमंत्री कर पाए हैं? इटली में अब जाकर इस पर बात शुरू हुई और भारत सरकार भी सोच रही है।

राजद के कारण बिहार को मिली पहली महिला मुख्यमंत्री

बिहार को पहली महिला मुख्यमंत्री देने का श्रेय राजद को जाता है। जो लोग राबड़ी देवी की तालीम पर सवाल उठाते हैं, वे भूल जाते हैं कि देश आज़ाद हुआ 15 अगस्त 1947 को, लालू प्रसाद सीएम बने 10 मार्च 1990 को। बीच के 43 वर्षों तक किसने रोका था बिहार में किसी पीएचडी की हुई महिला को सीएम बनाने से? राबड़ी देवी तो आज़ादी के 50 साल बाद 25 जुलाई 1997 को सीएम बनीं।

1997 में जनता दल से अलग होकर बनी पार्टी राजद के खेमे में 136 विधायक थे जिनमें से 135 ने राबड़ी देवी को नेता चुना, लालू प्रसाद 136वें विधायक थे। 1995 में लालू प्रसाद के पास कुल मिलाकर 168 विधायकों का समर्थन था, वहीं 1997 में जब राबड़ी देवी ने विश्वास मत अर्जित किया तो उन्होंने 194 विधायकों को अपने पाले में कर लिया। तो, उन्हें डमी सीएम कहना यथोचित नहीं जान पड़ता। उन्होंने आते ही हर कमिश्नरी में ओबीसी-ईबीसी लड़कियों के लिए आवासीय स्कूल खोला ताकि उनकी तरह शोषित समाज की लड़कियों को पढ़ाई से वंचित न रहना पड़े।

कुछ लोग लालू को एमवाई (मुस्लिम-यादव) के नेता के रूप में महदूद करते हैं, जबकि उन्होंने ईबीसी के 10 प्रतिशत कोटे को बढ़ाकर 14 प्रतिशत और राबड़ी देवी ने 18 प्रतिशत कर दिया। अगस्त 1993 में पटना विश्वविद्यालय और बिहार विश्वविद्यालय में सीनेट और सिंडिकेट की 50 प्रतिशत सीटें ओबीसी के लिए आरक्षित कर दी गईं। 1995 में जनता दल ने 19 कुशवाहा को टिकट दिया था जिनमें 17 जीते और 11 को मंत्री बनाया गया।

जब जेपी यूनिवर्सिटी खुली, तो उसके वाइस चांसलर के रूप में कुशवाहा समाज के सत्यनारायण प्रसाद को जिम्मेदारी दिलाई। बक्सर से आने वाले कुशवाहा समाज के केशव प्रसाद को बीपीएससी का मेंबर बनाया। कॉलेज सर्विस कमीशन के तीन चेयरमैन कुशवाहा समाज से रहे। बीपीएससी के चेयरमैन के रूप में प्रो. रामाश्रय यादव, प्रो. लक्ष्मी राय, प्रो. रज़िया तबस्सुम और प्रो. रामसिंहासन सिंह को ज़िम्मेदारी दी। राबड़ी देवी के कार्यकाल में 6 ज़िले में रविदास समाज से आने वाले एसपी तैनात थे।

लालू-राबड़ी कार्यकाल में वंचित समाज के जो लोग टिकट पाने के बावजूद नहीं जीत पाते थे, उन्हें वे विधान परिषद व राज्य सभा भेजते थे। लालू के पहले कार्यकाल में पिछड़े समाज के 63 लेजिस्लेटर्स में से 31 मंत्री बने, 12 मुस्लिम लेजिस्लेटर्स में से 8 मंत्री बने, 22 दलित लेजिस्लेटर्स में से 11 को मंत्री बनाया गया, दोनों आदिवासी लेजिस्लेटर्स को मंत्री बनाया गया और 28 अगड़ी जाति के लेजिस्लेटर्स में से 18 को मंत्री बनाया गया।

लालू प्रसाद की पार्टी भारत की पहली पार्टी है जिसने तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सांगठनिक चुनावों में दलितों-आदिवासियों को 17 प्रतिशत व अतिपिछड़ों को 28 प्रतिशत आरक्षण देकर एक मिसाल पेश की है। मेरा खयाल है कि बिहार में दो ही जननेता हुए- एक कर्पूरी ठाकुर और दूसरे लालू प्रसाद यादव।

जब भी बिहार की सियासत में रीढ़ वाले नेताओं की सूची बनेगी, लालू प्रसाद का नाम शीर्ष पर होगा। हर राजनेता के पूरे सियासी सफर के कई फेज़ होते हैं। मेरा निश्चित मत है कि लालू प्रसाद 1990-95 के बाद मुख्यमंत्री नहीं भी बने होते, तो भी अपने 5 साल के पहले कार्यकाल में उन्होंने ऐसा पैराडाइम शिफ्ट कर दिया था कि इतिहास उन्हें बड़े अदब के साथ याद करती।

मंडल कमीशन की अहम सिफारिश लागू कराने में भूमिका, आडवाणी की गिरफ्तारी, सांप्रदायिकता का समूल सफाया, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अकलियतों को डिसीज़न मेकिंग का हिस्सा बनाना, उपेक्षित समाज के बच्चों को स्कूल भेजने के लिए मिशन के स्तर पर प्रेरित करने समेत सारे बड़े फैसले उन्होंने इसी पीरियड में लिए।

1995 के बाद जो अभूतपूर्व जनसमर्थन उन्हें मिला, वह उनके इन्हीं कामों पर जनता की मुहर थी। यह बिल्कुल सच है कि लालू प्रसाद का सफर अगर 1995 में भी थम गया होता, तो उनके एजाज़ में कोई कमी नहीं होती। नीतीश कुमार अभी भी घिसट ही रहे हैं। कुछ समय बाद वे बिहार के सर्वाधिक दिनों तक मुख्यमंत्री रहने वाले शख्स हो जाएंगे। लेकिन, किसी भी नेता को इसलिए नहीं याद किया जाता कि वह कितने दिनों तक सत्ता में रहा, बल्कि इसलिए याद किया जाता है कि उसने फैसले क्या लिए। लालू प्रसाद अपने परिवर्तनकारी ऐतिहासिक निर्णयों की वजह से खुदरंग राजनेता के रूप में इतिहास में दर्ज़ किये जाएंगे।

वो जाफ़रानी पुलोवर उसी का हिस्सा है

कोई दूसरा जो पहने तो दूसरा ही लगे

– बशीर बद्र

(जयंत जिज्ञासु, नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के राज्य कार्यकारिणी के सदस्य हैं। व्यक्त विचार निजी हैं)

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