हुजूर पीएम! सनक छोड़िये, लाशों के ढेर पर ‘हवा महल’ बनाने से ज्यादा जरुरी है लोगों की जिंदगी बचाना

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एक प्रधानमंत्री की प्राथमिकता क्या होनी चाहिये, लोगों की जान बचाना या फिर इमारत बनाना? यदि नागरिकों के जिंदगी की सलामती प्राथमिकता है तो इतने संकट के बावजूद बीस हजार करोड़ की ‘सेंट्रल विस्टा योजना’ को क्यों नहीं रोका जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी को अपने ‘मन की बात’ में यह बताना चाहिये कि लाशों के ढेर पर बनने वाला ये महल न बनता तो किसकी जान चली जाती!

● आलोक शुक्ल 

यह किसी सरकार और उसके मुखिया की सनक ही कही जाएगी कि उसके नागरिक एक भयंकर महामारी की त्रासदी झेल रहे हों, अगणित लोग मौत के मुंह में समा गए हों, करोड़ों पीड़ित हों, अस्पतालों में इलाज की कोई व्यवस्था न हो, शैय्या, जांच किट, दवा, आक्सीजन, वेंटिलेटर, वैक्सीन सबकी जबरदस्त किल्लत हो और नागरिकों द्वारा ही चुनी गयी सरकार के प्रधानमंत्री इन सबसे बेपरवाह होकर अपना नया हवा महल बनाने में लगा हो।

कोरोना संक्रमण के फैलाव और मौतों के लिहाज से अप्रैल और मई का महीना बेहद त्रासदीपूर्ण रहा। लखनऊ दिल्ली से लेकर अहमदाबाद तक पूरे देश के लोग अस्पतालों में बिस्तर, वेंटिलेटर, आईसीयू, दवाएं,  डॉक्टर की कमी और ऑक्सीजन के बगैर तड़प-तड़प कर मर रहे थे। सच्चाई यह है कि ज्यादातर मौतों की वजह कोरोना की अपेक्षा स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और सरकार का गैर जिम्मेदाराना रवैया रहा है।

मौतों का सिलसिला अभी भी थमा नहीं है बस रफ्तार कुछ कम जरूर हुई है। अप्रैल-मई में मौतों का सरकारी आंकड़ा जहां रोजाना चार हजार के पार था वहीं अब हरेक दिन दो हजार के आगे-पीछे है। लेकिन यह पूरे आंकड़े का केवल एक हिस्सा भर है, अनेकों मौतों की गिनती न तब हो रही थी, न अब हो रही है। 

एक मोटे अनुमान के अनुसार बीते डेढ़ महीने में महामारी से दस लाख से ज्यादा लोग जान गवां चुके हैं। तबाही अभी भी जारी है और इस तबाही के बीच भी सेंट्रल विस्टा परियोजना जोरों-शोरों से चल रही है। प्रधानमंत्री को अपने ‘मन की बात’ में यह बताना चाहिये कि लाशों के ढेर पर बनने वाला ये महल न बनता तो किसकी जान चली जाती!

क्या है सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट

1930 के दशक में निर्मित लुटियंस दिल्ली के केंद्र में राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक 3.2 किलोमीटर लंबे दायरे में 20,000 करोड़ रुपये की लागत से पुनर्विकास का काम किया जा रहा है। जिसमें कई सरकारी इमारतों, जिसमें कई प्रतिष्ठित स्थल भी शामिल हैं, को तोड़ना और एक नए त्रिभुजाकार संसद भवन, प्रधानमंत्री आवास, उपराष्ट्रपति आवास, विभिन्न मंत्रालय व साझा केंद्रीय सचिवालय भवनों का निर्माण किया जाना है।

परियोजना की घोषणा पिछले वर्ष सितंबर में हुई थी। जबकि पीएम ने 10 दिसंबर 2020 को इसकी आधारशिला रखी। इसके निर्माण का लक्ष्य अगस्त 2022 तक है, जबकि साझा केंद्रीय सचिवालय 2024 तक बनने का अनुमान है।

वैक्सीनेशन की नहीं, पर ‘हवा महल’ की समय सीमा तय

देश में कोरोना वैक्सीनेशन की न तो कोई योजना सामने आई है न टीकाकरण की कोई अन्तिम तिथि तय की गई है। लोगों का जीवन बचाने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण और प्राथमिकता वाला कार्य होना चाहिए। इसके उलट सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के अलग अलग हिस्सों को पूरा करने के लिए समय सीमा तय कर दी गई है। नया प्रधानमंत्री आवास जो इस प्रोजेक्ट का हिस्सा है, दिसंबर 2022 तक और नया उपराष्ट्रपति आवास भी मई 2022 तक तैयार हो जाएगा। 

नागरिकों का जीवन बचाने को लेकर सरकार की बेपरवाही तब भी दिखी थी जब अस्पतालों में ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मचा हुआ था। उस वक़्त भी उसे अस्पतालों तक पहुंचाने के लिए न तो कोई योजना दिखी न कोई व्यवस्था। विभिन्न राज्यों के हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को इस बारे में दखल देना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों में आक्सीजन वितरण के लिए एक हाई पावर कमेटी भी बना दिया जो एक तरह से सरकार के  मृत हो जानेे की घोषणा थी। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से वैक्सीनेशन पर राष्ट्रीय योजना बनाने को कहा है। बात बात में कोर्ट का दखल देना किसी भी सरकार के लिये डूब मरने वाली बात होती है।

पीएम की सनक, बेहयाई और पागलपन

यह सनक, बेहयाई और पागलपन ही है कि जिस समय भारत पर 50 साल का ऐतिहासिक आर्थिक संकट है, जिस समय महामारी से रोज हजारों लोग मर रहे हैं, जिस समय अस्पतालों में जीवन बचाने के लिये जरुरी सुविधाएँ नहीं हैं, और जिस समय सरकार के पास पर्याप्त वैक्सीन खरीदने का पैसा नहीं है, उस समय सरकार की प्राथमिकता प्रधानमंत्री के लिए नया आवास बनवाना है। 

महामारी की पहली लहर के समय जब तमाम लोग पैदल चल कर मर गए थे तब प्रधानमंत्री ने अपने लिए 8500 करोड़ का विमान खरीदा था, जिसकी प्रति घंटा उड़ान का खर्च करीब 1 करोड़ 30 लाख रुपये आता है। अब जब डेढ़ महीने से देश का दम घुट रहा है, तब दिल्ली में नया प्रधानमंत्री आवास और नया संसद भवन बनवाया जा रहा है। यह एक मरते हुए देश के प्रधानमंत्री का पागलपन नहीं तो और क्या कहा जायेगा?

पिछ्ले दो महीने से जेहन में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि एक प्रधानमंत्री की प्राथमिकता क्या है लोगों की जान बचाना या फिर इमारत बनाना? यदि नागरिकों के जिंदगी की सलामती चिंता है तो इतने संकट के बावजूद बीस हजार करोड़ की विस्टा योजना को क्यों नहीं रोका जा रहा है। 

श्मशानों में अपने बारी की प्रतीक्षा में पड़ी, गंगा में बहती और नदियों किनारे चील कौवों व जानवरों से नुचती लाशों को देखकर भी हमारे प्रधानमंत्री के ऊपर कोई असर नहीं दिख रहा। लोग मरें तो मरें, लाशें कुत्ते नोचें या चील कौवे, वे तो अपने सपनों का हवा महल बनवा कर ही रहेंगे।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा समेत विपक्षी दलों के कई नेता, वैश्विक स्तर के 75 से अधिक प्रसिद्ध विद्वानों, कलाकारों, लेखकों, क्यूरेटरों और संग्रहालय के पेशेवरों, कई नागरिक समूहों और पर्यावरण संगठनों ने महामारी की गंभीर स्थिति को लेकर चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री से परियोजना को रोककर इसका पैसा और सभी उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल महामारी से निपटने व टीकाकरण के लिए इस्तेमाल करने का आग्रह किया। लेकिन पीएम और सरकार इन अपीलों को दरकिनार कर बस अपनी सनक पूरी होते देखना चाहते हैं, भले ही देश को इसकी चाहे जो कीमत उठानी पड़े।

केंद्र सरकार द्वारा खरीदे जा रहे टीके की कीमत लगभग डेढ़ सौ रुपये प्रति डोज है। केंद्र द्वारा बनाए जा रहे 162 ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्रों की लागत 201 करोड़ रुपये है। ऐसे में सेंट्रल विस्टा परियोजना को अभी के लिए रोककर इसी राशि से पूरी आबादी का टीकाकरण, ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्रों का निर्माण और अस्पतालों में सुविधाओ की बढ़ोत्तरी की जा सकती है।

बेपर्दा होता सत्ता का अहंकार !

सरकार नए शहर बना सकती है। नए प्रोजेक्ट शुरू कर सकती है, पर तब जब स्थिति सामान्य हों। एक तरफ तो देश मे मेडिकल इमरजेंसी जैसे हालात हैं औऱ दूसरी तरफ सरकार अपने लिये नए आवास औऱ संसद का निर्माण कर रही है जो इस आपदा के गुजर जाने के बाद भी बन सकता है। किसी के लिये भी मनुष्य का जीवन और उसकी बीमारी का इलाज पहली प्राथमिकता फिलहाल होनी चाहिए।

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट कोई निजी प्रोजेक्ट नहीं है। यह भारत सरकार के बजट से बन रहा है। जिसमें लग रहा एक एक पैसा मेरा, आप का और हम सबका है। लेकिन नदियों में बहती लाशों और अस्पतालों में मरते लोगों के दुःख, वेदना औऱ आह के बीच नया संसद भवन और न्यू इंडिया के सम्राट का राजप्रासाद बनाया जाना सत्ता के अहंकार का ही प्रदर्शन है ?

संवेदनहीनता का स्मारक

जो भारत अपने गरीबी के दिनों में भी अपने नागरिकों का फ्री में टीकाकरण करता आया है, उसी भारत में अब टीकाकरण के लिए नागरिकों के एक बड़े हिस्से से पैसे वसूले जा रहे हैं। कम से कम एक तिहाई गरीब आबादी का टीकाकरण कैसे होगा, ये सोचने वाला कोई नहीं है। न उस पर कोई बहस है।

इतनी बड़ी त्रासदी से उबरने का एक ही रास्ता है वैक्सीनेशन का, लेकिन देश की जनता को वैक्सीन लगवाने के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है।

आज जब दुनियाभर से आ रही सहायता पर हम निर्भर हो गए हैं और देश मे सरकार नाम का कोई तंत्र मुश्किल से ही बचा है तो, सरकार को अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी। प्राथमिकता, यह महामारी और वैक्सीनेशन है न कि कोई नयी संसद भवन या प्रधानमंत्री आवास।

अब ये सवाल कौन पूछे कि जनता की जान बचाना जरूरी है या लाशों के ढेर पर हवा महल बनवाना जरूरी है? हमारा लोकतंत्र रोज क्रूरता के नए कीर्तिमान लिखता है। हमारी सरकार हर दिन बर्बरता का नया अध्याय लिखती है। जनता के पैसे से ही जनता की जान बचाने में मुस्तैदी नहीं है, हवा महल बनवाने में मुस्तैदी है।

लाशों के ढेर पर बनने वाला सेंट्रल विस्टा इतिहास में सरकार की मरी हुई इंसानियत और संवेदनहीनता के स्मारक के रूप में याद किया जाएगा। इतिहास में लिखा जाएगा… जब प्रजा ऑक्सीजन और सरकार की लापरवाही से मर रही थी… तब उन्हीं लाशों के ढेर पर राजा अपना महल खड़ा कर रहा था।

ध्यान रखिए… यह ऐसा स्मारक होगा जिसको देखकर आने वाली पीढ़ी इस हुकूमत की सच्चाई को जान सकेगी। मौजूदा माहौल में हर ज़िम्मेदार नागरिक का बस एक ही सवाल है…..देश को अभी क्या चाहिए… जीने को सांस या पीएम को नया आवास ? 

हकीकत तो यह है कि ‘सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट भारत की जनता पर किया जा रहा एक क्रूरतम अपराध है। यह एक ‘तानाशाह’ की सनक का नतीजा है जो करोड़ों लोगों की जान बचाने की जगह इतिहास में अपना नाम दर्ज कराना चाहता है। भारत की जनता ने ऐसे दुर्दिन अतीत में कभी नहीं देखे थे।

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