बंगाल : बदल गया बीजेपी का खेल, अपने ही कार्यकर्ताओं की बगावत ने बैकफुट पर ला दिया 

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● आलोक शुक्ल

ममता बनर्जी ने बंगाली मानुष से पूछा- “खेला होबे?” और, खेल बदल गया। खेल और खेल का मैदान तो वही है लेकिन खिलाड़ियों की पोजीशन अचानक से बदल गयी। उधार के खिलाड़ियों से मैदान मारने का ख्व़ाब सजाये बैठी बीजेपी, स्ट्राइकर से डिफेंडर की भूमिका में आ गयी। उम्मीदवारों के नाम की लिस्ट सार्वजनिक क्या हुई, उसके अपने ही घर में बगावत हो गयी। भाजपा की सेना पोरस की हाथी हो गयी और टीएमसी का किला भेदने चली अपनी ही पार्टी को रौंदने लगी। फलत: गोल पोस्ट को निशाना बना शाट पर शाट लगा रही बीजेपी को भागकर पीछे होना पड़ा है।

जैसे जैसे दिन नजदीक आ रहा है बंगाल का चुनाव ​काफी दिलचस्प होता जा रहा है। खुद को पार्टी विद डिफ़रेंट कहने वाली जिस बीजेपी में आलाकमान का हर फैसला बिना सवाल किए स्वीकार कर लिया जाता है, उसमें बगावत हो रही है।

बीजेपी वह पार्टी है जहां जीते हुए राज्योें में संघ के पदाधिकारियों को बैठाने का भी कभी विरोध नहीं हुआ, चाहे हरियाणा हो, झारखंड हो या उत्तराखंड। ऐसा शायद पहली बार है जब किसी राज्य में बीजेपी के टिकट बंटवारे के फैसले को बीजेपी के कार्यकर्ता ही चुनौती दे रहे हैं।

हुगली, मालदा, जलपाईगुड़ी, मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना सहित कई जगहों पर हालात बेहद विस्फोटक हैं। इन जगहों से हिंसक विरोध-प्रदर्शनों की खबर लगातार आ रही है। बीजेपी कार्यकर्ताओं ने ही बीजेपी के दफ्तरों में तोड़फोड़ की हैं। बीजेपी जैसी ‘अति अनुशासित’ पार्टी में ये विरोध अभूतपूर्व है।

जैसा कि पिछले कुछ सालों से बीजेपी देश भर में कर रही है कि दूसरे दलों से नेताओं को तोड़ो, अपने पाले में लाकर टिकट दो और उनके जीतने पर सरकार बनाओ। ऐसा प्रयोग पार्टी कई राज्यों में कर चुकी है और ये प्रयोग अब तक सफल रहा है। चुनाव के पहले बीजेपी सबसे मजबूत विरोधी पार्टी के कई दिग्गजों को अपने पाले में खींचती है, जिससे ये संदेश जाता है कि वह हार रही है और बीजेपी जीत रही है। इसी तरह बंगाल में भी बीजेपी को लगा होगा कि टीएमसी में मची भगदड़ उसके पक्ष में माहौल बना देगी। बंगाल चुनाव में भी बीजेपी ने यही किया।

बंगाल में टीएमसी को हराने के लिए बीजेपी ने टीएमसी नेताओं के ही कंधे पर बंदूक रखनी चाही। लेकिन टिकट बंटवारे के बाद चर्चा बदल गई है कि बीजेपी के पास अपने कैंडीडेट तक नहीं हैं। बीजेपी कार्यकर्ताओं के असंतोष ने इस चर्चा पर मुहर लगा दी है।

बीजेपी कार्यकर्ताओं की परेशानी ये है कि अभी तक वे प्रचार कर रहे थे कि टीएमसी वाला सब तोलाबाज है। अब उसी तोलाबाज को लाकर बीजेपी ने टिकट दे दिया। जमीनी कार्यकर्ताओं को किनारे कर दिया। ऐसे में बीजेपी वर्कर को अब उसी नेता का सपोर्ट करना है जिसका वह अब तक विरोध करता रहा और लाठी खाता रहा।

उल्टा पड़ा दांव

बीजेपी द्वारा उम्मीदवारों की सूची जारी होते ही पार्टी में संग्राम छिड़ गया। टीएमसी और दूसरे दलों से आए नेताओं का नाम देख पार्टी कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा। कई जिलों में कार्यकर्ताओं ने अपने ही पार्टी दफ्तरों में तोड़फोड़ कर दी तो कई जगह इस्तीफे आने लगे।

हुगली के पूर्व बीजेपी अध्यक्ष भास्कर भट्टाचार्य, बीजेपी के नेशनल यूथ लीडर सौरव सिकदर जैसे कई स्थानीय नेताओं ने टिकट बंटवारे का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया।

​कह सकते हैं जिस तीव्र गति से टीएमसी के नेताओं ने बीजेपी में आने के लिए भगदड़ मचाई, बीजेपी इस भीड़ को मैनेज नहीं कर पाई। उससे अपने ही कई नेता उससे छिटक गए।

वहीं, बीजेपी की सूची जारी होने के बाद बीजेपी के दो घोषित उम्मीदवारों- शिखा मित्रा और तरुण साहा ने चुनाव लड़ने से ही मना कर दिया। सिखा मित्रा ने कहा कि मैंने तो कभी पार्टी ज्वाइन ही नहीं की थी। बीजेपी वालों का माथा खराब हो गया है।

बदल गई पोजीशन

ममता को चोट लगना, बीजेपी कार्यकर्ताओं का बगावत करना, घोषित उम्मीदवारों का लड़ने से मना करना, स्वप्न दासगुप्ता मामले में टीएमसी का हमलावर होना और बीजेपी का बैकफुट पर आना, ये सब ऐसी घटनाएं हैं जिन्होंने बीजेपी को यकीनन क्षति पहुंचाई है।

इन घटनाओं को देखकर लगता है कि ये वो बीजेपी नहीं है, जिसे चुनाव जीतने की मशीन की संज्ञा दी जाती है।

चुनाव कौन जीतेगा, ये तो नतीजे खुद गवाही देंगे, लेकिन बीजेपी के पक्ष में पहले जो माहौल बना दिख रहा था, वह कमजोर हुआ है। एक समय टीएमसी घबराई हुई दिख रही थी, लेकिन अब टीएमसी फ्रंटफुट पर दिख रही है। जबकि शुरुआती दौर में फ्रंटफुट पर खुलकर खेल रही बीजेपी ने खुद को बैकफुट पर ला दिया है। ऐसे में लाख टके का सवाल है, क्या बंगाल में अपने ही संगठन पर बीजेपी की मजबूत पकड़ नहीं बन पाई? और क्या बंगाल में बीजेपी का खेल खत्म हो गया है?

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