क्या नफरत की आग पानी के बाद हिलसा तक भी पहुंचेगी?
क्या हमारे देश में मोहब्बतें खत्म होती जा रही हैं! फागुन का महीना है। प्रेम, भाईचारे और समानता का सबसे बड़ा भारतीय पर्व होली आने वाली है। और ऐसे में खबर आती है कि एक बच्चे को मंदिर में पानी पीने के लिए बुरीतरह मारा गया। यह इस देश की कोई इकलौती घटना नहीं है। उधर, पांच राज्यों में हो रहे विधान सभा चुनाव में एक दल विशेष के नेताओं की भाषा अमन पसंद लोगों को चिंता में डालने वाली है।
● शकील अख्तर
क्या हमारे देश में मोहब्बतें खत्म होती जा रही हैं! फागुन का महीना है, होली आने वाली है। प्रेम, भाईचारे और समानता का सबसे बड़ा भारतीय पर्व। और ऐसे में खबर आती है कि एक बच्चे को मंदिर में पानी पीने के लिए बुरीतरह मारा गया। और इस कांड का सबसे खराब पार्ट यह कि मारने वाला इसका विडियो बनाकर वायरल करता है।
आज से 94 साल पहले महाड़ आंदोलन पीने के पानी लिए ही हुआ था। 1927 में इसी मार्च महीने में डा. आम्बेडकर ने महाराष्ट्र में महाड़ के चावदार तालाब से एक चुल्लू पानी लेकर पीया था। इसके बाद भी दलितों पर हमले हुए थे।
लेकिन एक संदेश था कि पानी को लेकर भेदभाव नहीं होना चाहिए। पानी पर सामाजिक रूप से कमजोर का भी हक है।
महाड़ आंदोलन इसलिए याद आया कि इस घटना में मारपीट करने वाला उस समुदाय से है जो खुद सामाजिक भेदभाव का शिकार रहा है। उसका ओबीसी होना एक नए विवाद को जन्म दे गया। हमारे यहां यह होता है। मूल विषय तो पृष्ठभूमि में चला जाता है और गैर जरूरी मुद्दों को उभार दिया जाता है। यहां भी यादवों और खासतौर से पढ़े लिखे यादवों को टारगेट किया जा रहा है। क्योंकि मारने वाला पढ़ा लिखा था। इंजीनियर था।
सोशल मीडिया पर होने वाले हमलों के बाद सामाजिक रूप से सक्रिय कुछ यादवों ने दुख व्यक्त करते हुए कहा है कि पढ़े लिखे यादवों को जबर्दस्ती टारगेट किया जा रहा है। उनका यह दुःख वाजिब है। किसी भी व्यक्ति के अपराध पर उसके पूरे समुदाय को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन हमारे समाज में होता यह है कि अगर दोषी कमजोर पृष्ठभूमि का है तो फौरन उसके समुदाय को निशाने पर ले लिया जाता है। नतीजा यह होता हैकि उस समुदाय के सक्रिय लोग डिफेंसिव होने लगते हैं। जिसकी जरूरत नहीं है।
नफरत का एक माहौल बनाया गया है। उसका शिकार होकर जो गलती करता है वह किसी समुदाय का नहीं होता। नफरत और विभाजन की उपज होता है।
आज के समय में कोई भी जाति, समुदाय, धर्म इससे नहीं बचा है। हां, लेकिन यहां थोड़ा स्पष्ट करना जरूरी है कि सिख समुदाय एक ऐसा है कि वहां भेदभाव सबसे कम दिखता है। और नफरत तो न के बराबर। तो इस नफरती राजनीतिक माहौल में हर समुदाय, कोई ज्यादा तो कोई कम नफरत से प्रभावित हुआ है। राजनीतिक माहौल बहु स्तरीय प्रभाव डालता है।
आजादी के बाद धार्मिक विभाजन सबसे ज्यादा था। मगर देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने इस विभाजन को पाटने के लिए देश में प्रगति का जाल बुन दिया। शिक्षा, तकनीक, आत्मनिर्भरता की नई शुरुआत कर दी। नतीजे में बच्चे पढ़ने लगे। पढ़े लिखे उच्च शिक्षित होने लगे। डाक्टर, इंजीनियर बनने लगे। विदेशों में जाने लगे। यह अनायास भी हो जाता है। कई सच्चाइयां इसी तरह सामने आ जाती हैं, जैसा प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुआ कि आजादी के 75 साल के मौके पर उनके मुंह से नेहरू की प्रशंसा निकल गई। नेहरू के जिन कामों को भूलाने की पूरी कोशिश की वे अचानक मुंह से निकल गईं।
नेहरू ने नफरतों को पाटने के लिए प्रेम, भाइचारे और नव निर्माण का पुल बनाया। मगर आज उस पुल को तहस नहस कर दिया गया। नफरत और विभाजन की खाईयां खोद दी गईं। आज देश की हर समस्या से लोगों को ध्यान भटकाने के लिए हिन्दु मुसलमान का सवाल खड़ा कर दिया जाता है।
मगर यह हमेशा नहीं चलेगा। कहने वाले कहते हैं! और बहुत हिम्मत से जोर देकर कहते हैं। फारूक अब्दुल्ला याद आ गए। फारूक जो अभी पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के पौत्री की शादी में डांस कर रहे थे। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को भी खींच लाए और “आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जबान पर“ की धुन पर उन्हें भी थिरका दिया, पब्लिक लाइफ के सबसे बेधड़क, बेबाक नेताओं में से एक हैं। एक बार जम्मू में एक बड़ी जनसभा में बोले, “ये हिन्दू, ये मुसलमान जहां खाली जगह देखते हैं मंदिर, मस्जिद बना लेते हैं। सरकारी जमीन पर कब्जा करते हैं। दूसरी तरफ हमारे सिख और ईसाई भाइयों को देखो। एप्लीकेशन लेकर आते हैं। सर हमें ये जमीन अलाट कर दीजिये। इसका जो पैसा हो ले लीजिए। हम गुरुद्वारा, चर्च बनाएंगे।“ सभा में हिन्दू, मुसलमानों की ही भीड़ थी। मगर यह हिम्मत फारुख अब्दुल्ला ही दिखा सकते हैं कि मुंह पर उन्हें आईना दिखा रहे हैं।
तो देश की राजनीति हमेशा हिन्दू मुसलमान की राजनीति नहीं रहेगी। राजनीति तो लोगों की जिन्दगी से जुड़े सवालों पर ही वापस आएगी। मगर यह कब होगाइसका सबको इंतजार है!
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों पर सबकी निगाहें हैं। खासतौर पर बंगाल पर। वहां माहौल बहुत सरगर्म है। भाजपा ने अपनी पुरी ताकत वहां झोंक दी है। वहां के नतीजे देश की भविष्य की राजनीति पर गहरे प्रभाव डालेंगे। बंगाल सीमावर्ती राज्य है। सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक। वह अभी तक हिन्दू मुसलमान के जहर से बचा हुआ है। वहां गर्व करने की बात बंगाली भाषा, संस्कृति, साहित्य और उनका पारंपरिक खानपान है।
वामपंथियों ने वहां 34 साल लगातार शासन किया तो बंगाली संस्कृति के साथ घुलमिल कर। सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी जो खुद बंगाली नहीं हैं ने एक बार कहा था कि “हिलसा में राजनीति नहीं है।“ हिलसा बंगालियों की प्रिय मछली है। उस समय काफी मंहगी हो गई थी। सारी पार्टियां, लेफ्ट, टीएमसी, कांग्रेस सब एक होकर हिलसा सस्ती करो की मांग कर रहे थे। तब येचुरी ने कहा था यहां सब एक हैं। हमारे एक बंगाली पत्रकार दोस्त कहते हैं कि बंगाली हिलसा खाने 10 किलोमीटर, रवीन्द्र संगीत सुनने 20 किमी और फुटबाल देखने 50 किमी पैदल जा सकता है। तो यह है वहां कीहिन्दु मुसलमान से अलग संस्कृति।
वह बंगाल जिस के बारे में कहा जाता है कि देश को हमेशा रास्ता दिखाता है अगर नफरत के जहर से बच गया तो देश में फिर उम्मीद की किरन पैदा हो जाएगी। नहीं तो देश और अंधेरे की तरफ चला जाएगा।
चाहे विधानसभा चुनाव हों या हाल का पानी पीने पर बच्चे को मारने का वाकया सबसे ज्यादा अदृश्य चोटें देश खा रहा है। इन्हें देसी भाषा में मुंदी चोटें कहा जाता है। बाहरी जख्म तो भर जाते हैं मगर मुंदी चोटें रह रह कर कसक देती हैं। अगर ज्यादा गहरी हों तो कभी कभी जीवन भर कष्ट देती है। नफरत की चोटें ऐसी ही होती हैं। देश के सीने पर बहुत जख्म कर जाएंगी।
आज अगर आप लालकृष्ण आडवानी को देखें तो समझ में आता है कि नफरत, विभाजन की राजनीति करने वालों का क्या हश्र होता है! और आडवानी ही नहीं सब चाहे वे उमा भारती हों, विनय कटियार हों, तोगड़िया हों या मुरली मनोहर जोशी सबको अकेला छोड़ दिया गया है। दरअसल जब आप नफरत करते हैं तो किसी के टूलहोते हैं और जब प्रेम करते हैं तो खुद का और विस्तार करते हैं।
इसी का एक और जस्ट अपोजिट राजनीतिक उदाहरण। शिवसेना जब नफरत की राजनीति करती थी तो उसे किस निगाहों से देखा जाता था! मुबंई में चाहे युपी औरबिहार का आदमी चुप रह जाता हो यहां आकर वह सिवाय गालियों के कुछ नहीं बोलता था। मगर आज जब उसने अपना राजनीतिक ट्रैक बदल लिया है तो उत्तर भारत में उद्धव ठाकरे की चर्चा सम्मान के साथ की जाती है। भविष्य के नेताओं में उनका और उनके बेटे आदित्य ठाकरे का नाम लिया जाता है।
देश के ज्ञात इतिहास में पहला ‘महान’ सम्राट अशोक को ही कहा जाता है। उसके कलिंग युद्ध जीतने के लिए नहीं। युद्ध के बाद के प्रायश्चित्त के लिए। दया और करुणा के लिए। कोई भी बल, नफरत , क्षमा, प्रेम से बड़ा नहीं हो सकता। देश के बाहर भी अगर देखना हो तो सबसे ताकतवर देश अमेरिका को देखना चाहिए। जहां बलशाली ट्रंप की नफरतें, साजिशें हर चाल एक सामान्य से दिखने वाले जो बाइडेन के सामने धराशाई हो गईं।
