महापंचायतों का दौर जारी, कल अमरोहा, मेवात व दादरी में जुटेंगे किसान

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● पूर्वा स्टार ब्यूरो

कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ देश भर में महापंचायत होने का सिलसिला जारी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुज़फ्फरनगर के बाद बाग़पत, मथुरा, बिजनौर और शामली में महापंचायत हो चुकी हैं। शामली में तो प्रशासन की ना के बाद भी महापंचायत हुई और बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। इसके अलावा हरियाणा के जींद और राजस्थान के दौसा और मेहंदीपुर बालाजी में भी किसान महापंचायतों का आयोजन किया जा चुका है। 

इसी क्रम में अब 7 फ़रवरी को हरियाणा के मेवात, दादरी और उत्तर प्रदेश के अमरोहा में महापंचायत होने जा रही हैं। मेवात की महापंचायत हरियाणा-राजस्थान बॉर्डर के सुनहेड़ा इलाक़े में होगी। इन महापंचायतों में गुरनाम सिंह चढ़ूनी, योगेंद्र यादव और राकेश टिकैत के पहुंचने की बात कही गई है।

सचिन पायलट ने दिया समर्थन

शुक्रवार को राजस्थान के दौसा में हुई महापंचायत में राज्य के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट भी पहुंचे। उनके साथ पार्टी के कुछ विधायक भी शामिल थे। इस महापंचायत में दिल्ली के बॉर्डर्स पर धरना दे रहे किसानों के समर्थन में प्रस्ताव पास किया गया। बीते साल राजस्थान में हुए सियासी घटनाक्रम के बाद कई महीनों से शांत बैठे पायलट किसान आंदोलन के जरिये सक्रिय होने की कोशिश करते दिख रहे हैं। पायलट ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने इन क़ानूनों को लेकर राज्य सरकारों से कोई चर्चा नहीं की और इन्हें जल्दी में पास कर दिया। राजस्थान कांग्रेस की कमान संभाल चुके पायलट ने कहा कि जब तक किसानों की मांगें नहीं मानी जाती हैं, वे पीछे नहीं हटेंगे। 

कई राज्यों में फैलता आंदोलन

पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलावा राजस्थान में भी कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ पिछले दो महीने से पहले से आंदोलन चल रहा है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के मुखिया और नागौर के सांसद हनुमान बेनीवाल कृषि क़ानूनों के विरोध में एनडीए से बाहर निकल चुके हैं और हरियाणा-राजस्थान के शाहजहांपुर बॉर्डर पर काफी दिनों से धरना दे रहे हैं। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ राजस्थान के कई जिलों में ट्रैक्टर रैली भी निकाली है। उत्तराखंड के भी तराई वाले इलाक़ों के किसानों की बड़ी भागीदारी ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर है।

तीन से चार महीने के भीतर 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। बिहार, हैदराबाद नगर निगम चुनाव में मिली जीत के बाद चुनावी राज्यों के ताबड़तोड़ दौरे कर रहे बीजेपी नेताओं और मोदी सरकार के मंत्रियों के माथे पर किसान आंदोलन ने चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

विपक्ष का मिला समर्थन

किसानों के आंदोलन का लगातार विस्तार होते देख विपक्षी सियासी दल भी आंदोलन के समर्थन में आगे आ चुके हैं। कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी, एनसीपी, राष्ट्रीय लोकदल, शिव सेना, इंडियन नेशनल लोकदल, शिरोमणि अकाली दल, समाजवादी पार्टी सहित कई दलों के नेताओं ने किसान आंदोलन को समर्थन दिया है।

कांग्रेस पहले दिन से ही किसानों के आंदोलन का समर्थन कर रही है। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इस मसले पर पंजाब में ट्रैक्टर यात्रा निकालने से लेकर लगातार ट्वीट कर सरकार पर दबाव बढ़ा रहे हैं। 15 जनवरी को कांग्रेस ने देश भर में राज्यपालों के आवास (राजभवन) का घेराव किया था। राहुल गांधी ने कहा है कि सरकार को ये क़ानून वापस लेने ही होंगे। 

किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि इस बात में कोई परेशानी नहीं है कि विपक्षी दलों के नेता ग़ाज़ीपुर बॉर्डर आकर आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं और इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। 

इन महापंचायतों के जरिये किसान केंद्र सरकार तक संदेश पहुंचा रहे हैं कि वह उन्हें कम करने न आंके। मतलब साफ है कि जब तक कृषि क़ानून वापस नहीं होंगे, तब तक उनका आंदोलन जारी ही नहीं रहेगा बल्कि इसका और विस्तार होगा।

भीड़ से परेशान मोदी सरकार

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलावा हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड में भी हो रही इन महापंचायतों में उमड़ी भीड़ से बीजेपी नेता और केंद्र सरकार परेशान है। अगर किसान आंदोलन लंबा चलता है, जिसका राकेश टिकैत संकेत दे चुके हैं तो निश्चित रूप से मोदी सरकार को सियासी नुक़सान तो होगा ही देश की अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ेगा क्योंकि सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर आंदोलन के कारण पंजाब और हरियाणा में कारोबार प्रभावित हो रहा है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह किसान आंदोलन के कारण पंजाब की माली हालत ख़राब होने और इससे राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर होने की बात कह चुके हैं। 

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