चौरीचौरा की घटना और असहयोग आन्दोलन के स्थगन की अपरिहार्यता
1922 में चौरीचौरा की घटना के बाद गांधी ने जब असहयोग आन्दोलन स्थगित किया तब वह बखूबी समझते थे कि इस समय सूरज नहीं डूबने वाले दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य की सत्ता के विरुद्ध, थोड़ी भी हिंसा के सहारे संघर्ष में आगे बढ़ने पर इस कदर कुचल दिये जायेंगे कि हमारी आजादी का लक्ष्य हमसे 50 साल और दूर खिसक जायेगा।
● सतीश कुमार
चौरीचौरा भारतीय स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आन्दोलन में एक मील का पत्थर है। महात्मा गांधी ने कांग्रेस के माध्यम से भारतीय इतिहास में राजनीतिक-लोकचेतना पर आधारित प्रथम राष्ट्रीय जनान्दोलन ‘असहयोग’ में आज के दिन ही, सन् 1922 में घटित उस घटना के बाद सहसा ब्रेक लगा दिया, जिसमें पुलिस द्वारा मुंडेरा बाजार में कुछ लोगों की पिटाई की खबर पर भड़के कांग्रेसजनों और नागरिकों की भीड़ ने गोरखपुर जिले के चौरीचौरा थाने पर धावा बोल दिया था। उस हिंसक घटना में 23 पुलिस वाले और 03 नागरिक मारे गये।

4 फरवरी, 1922 को घटित उस घटना का शताब्दी वर्ष कल से शुरू हुआ है। कांग्रेस में भी गांधी जी के उस आन्दोलन स्थगन के फैसले का बहुतों ने विरोध किया। राष्ट्रीय आन्दोलन में एक अस्थायी ठहराव भी आया। पर गांधी तो दृढ़ थे, द्वन्द रहित थे सत्याग्रही असहयोग आन्दोलन में हिंसा के प्रवेश से आन्दोलन पर लगी लगाम को लेकर। कुछ आलोचक मानते हैं कि गांधी अति आदर्शवादी थे और उनका वह निर्णय नितान्त अव्यवहारिक था। सच तो इससे अलग था, क्योंकि गांधी बेशक आदर्शवादी थे, पर अव्यवाहारिक नहीं, बल्कि अत्यन्त व्यावहारिक रणनीतिकार थे।
बेशक अहिंसा गांधी के सत्याग्रह की बड़ी कसौटी थी, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी तो था। जिस गांधी ने चौरीचौरा की हिंसा के बाद असहयोग का आन्दोलन रोक दिया था, वही गांधी 1930, 32 में दो कदम आगे सविनय अवज्ञा पर थे और वही गांधी सन् 1942 में कई कदम और भी आगे थे। 1942 में तो चौरीचौरा जैसी कितनी घटनायें घट गईं थीं, पर गांधी ने आन्दोलन रोका नहीं था। उस आन्दोलन की उन्होंने जिम्मेदारी ली थी। जेल जाने से पहले आन्दोलन का आह्वान करते हुये देश के लोगों को कह गये थे कि, “करो या मरो” और अंग्रेजों को भी ललकार कर कह गये थे कि “क्विट इंडिया” यानी “भारत छोड़ो”।
वजह साफ थी। गांधी मानते थे कि हिंसक युद्ध से अहिंसक युद्ध ज्यादा कठिन होता है। अत: जब हिंसक युद्ध के लिये सैनिकों को कड़ा प्रशिक्षण दिया जाता है, तो अहिंसक युद्ध के लिये तो उससे भी ज्यादा कड़े प्रशिक्षण की जरूरत है। वह जानते थे कि 1922 में ऐसे सत्याग्रह युद्द की फौज का कैडर अभी देश में तैयार नहीं है।

गांधी के आश्रम अहिंसक युद्ध के सेनानियों की प्रशिक्षण शालायें थीं। कोचरब आश्रम कुछ महीनों में बंद किये जाने के बाद साबरमती आश्रम तो अभी बना ही बना था। हिन्दुस्तानी सेवा दल (जो 1947 में कांग्रेस सेवादल में तब्दील हुआ) तो अभी बना भी नहीं था। अत: 1942 में करो या मरो का आह्वान करने वाले गांधी जानते थे कि स्वतंत्रता के निर्णायक संघर्ष का बिगुल बजाने की परिपक्व घड़ी आ गई है, कैडर ही नहीं राष्ट्रव्यापी जनमत भी आरपार की लड़ाई के अनुकूल बनाया जा चुका है और दुनिया के हालात के बीच अंग्रेजों की भी कोर दबी हुई है।
वही गांधी 1922 में भी बखूबी समझते थे कि इस समय सूरज नहीं डूबने वाले दुनिया के सबसे बड़े और सबसे शक्तिशाली साम्राज्य की सत्ता के विरुद्ध, यदि हम थोड़ी भी हिंसा के सहारे संघर्ष में आगे बढ़ते हैं, तो इस कदर कुचल दिये जायेंगे कि हमारी आजादी का लक्ष्य हमसे 50 साल और दूर खिसक जायेगा।(लेखक प्रख्यात गांधीवादी विचारक, राजनीति विज्ञानी और राजीव गांधी स्टडी सर्किल के राष्ट्रीय समन्वयक हैं।)
