“लोक” नहीं, अब “कीलतंत्र” आ गया
दिल्ली बार्डर पर किसानों के आन्दोलन को दो महीने से ज्यादा गुजर चुका है। अपने ही देश के नागरिकों को खुद तक पहुंचने के डर से एक चुनी हुई सरकार इस कदर सिहर रही है की हाइवे खोदकर खाई बनाई जा रही है, कंक्रीट की मोटी दीवारें खड़ी की जा रही है, कटीले तार की बाड़ लगाई जा रही है और सड़कों पर कील गाड़ रही है। यह कैसा लोकतंत्र है?
● सुरेश प्रताप सिंह
गाजीपुर, टिकरी, सिंघु बाॅर्डर पर जहां किसान तीनों कृषि कानून रद्द करने और एमएसपी कानून बनाने के लिए धरना दे रहे हैं, वहां “लोक” नहीं “कीलतंत्र” आ गया है। किसानों की बिजली, पानी काटी गई। इंटरनेट सेवाएं भी बंद हैं और सड़क पर लोहे की मोटी-मोटी कीलें बिछा दी गई हैं।
किसानों के धरना से जिन्हें असुविधा हो रही थी और बाॅर्डर पर प्रदर्शन करने पहुंचे थे, वे लोग अब कहां हैं? हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों की जो महापंचायतें हो रही हैं, वो क्या बाहरी लोग हैं? किसान नहीं हैं..! अब कौन देगा इन सवालों का जवाब?
जब बातचीत के दरवाजे खुले हैं तो हाईवे पर क्यों बिछाई जा रही हैं लोहे की कीलें? हमारा लोकतंत्र कहां से कहां पहुंच गया। कौन है, जिसे किसानों से डर लग रहा है?
बाॅर्डर पर “दिल्ली पुलिस तुम लठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं” के नारे लगाने की वीडियो बनाने वाले पत्रकार को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, इसके बावजूद उसने साजिश को उजागर कर दिया। यही है पत्रकारिता..! संविधान के अनुच्छेद – 19 के मुताबिक अभिव्यक्ति की आजादी सबको है और इसी अधिकार के तहत पत्रकारों को भी लिखने व बोलने की आजादी है। जब इस उत्पीड़न के खिलाफ पत्रकार आवाज उठाएंगे तो वह किसकी आलोचना करेंगे? क्या वर्तमान परिवेश में “पत्रकार उत्पीड़न” के खिलाफ आवाज उठाने पर सरकार अपनी जवाबदेही और आलोचना से बच जाएगी?
अब तो विदेशी मीडिया भी किसान आंदोलन की खबरें देने लगी है। अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव के दौरान जब आपके प्रधानसेवक जाकर चुनाव प्रचार करेंगे तो वह भी आपकी समस्याओं के संदर्भ में बोलेंगे ही। संचार क्रांति के इस युग में अब सब कुछ ग्लोबल हो चुका है। आप अपनी अलोकतांत्रिक हरकतों, ब्लेडदार बाड़, कीलों, पुलिस के हाथ में स्टील की कांटेदार लाठियों को सीमेंट की दीवार के पीछे छिपाकर नहीं रख सकते हैं। सब कुछ उजागर हो जाएगा।
जब तक संविधान के मुताबिक अभिव्यक्ति की आजादी मिली है, तब तक इन मुद्दों पर लिखा जाएगा और संसद से सड़क तक बहस भी होगी।
और अंत में एक कविता पढ़ें…
“जो वक्त की आंधी से खबरदार नहीं होंगे
कुछ और होंगे कलमदार नहीं हैं..!
इंसान हैं हम, शाम के अखबार नहीं हैं
आवाज हैं हम, चीख हैं इस गुंगी प्रजा के
राजा के दरबार के सेवादार नहीं हैं..!”
