ब्रिटिश दंभ को ध्वस्त करने के लिए याद किया जाएगा 4 फरवरी 1922

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असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेते सत्याग्रहियों पर चार फ़रवरी 1922 को गोरखपुर के चौरीचौरा में अंगरेजी पुलिस द्वारा गोली चलाने और उसमें कई सत्याग्रहियों के मारे जाने की के बाद गुस्साई भीड़ ने उसी दिन चौरीचौरा थाना में 23 पुलिसवालों को बंद कर आग लगा दिया जिसमें सभी जल कर मर गए। हालांकि इस घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया लेकिन ब्रिटिश दंभ को ध्वस्त करने के लिए यह दिन इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया।

● आलोक शुक्ल

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में चार फरवरी 1922 का दिन ब्रिटिश दंभ को ध्वस्त करने के लिए याद किया जाएगा। इस दिन गोरखपुर के चौरीचौरा में असहयोग आंदोलन में हिस्सा ले रहे सत्याग्रहियों ने बरतानिया हुकूमत को यह जाता दिया था कि वो अहिंसा को भारतीयों की कमजोरी न समझे। जरुरत पड़ने पर भारतीय अंगरेजों की हिंसा का जवाब उससे भी बड़ी हिंसा से दे सकते हैं। चौरीचौरा में पुलिस द्वारा सत्याग्रहियों के ऊपर गोली चलाए जाने के बाद सत्याग्रहियों द्वारा 23 पुलिस वालों को थाने में ही बंद कर आग के हवाले कर देने की घटना ने अंगरेजी शासन की चूलें हिला दी।

 4 सितंबर 1920 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ। इसके बाद आरंभ हुए स्वाधीनता संग्राम के पहले सबसे बड़े आंदोलन में देशवासियों ने पूरी ताकत से हिस्सा लेना शुरु किया।

आंदोलन पूरे देश में फैल गया। लोग ब्रिटिश उपाधियों, सरकारी स्कूलों और अन्य वस्तुओं का त्याग करने लगे। असहयोग आंदोलन तेज करने के सिलसिले में 8 फरवरी 1921 को गांधीजी गोरखपुर आए और सभा को संबोधित किया। इसके बाद इस इलाके में भी आंदोलन ने जोर पकड़ा। 

असहयोग आंदोलन के संचालन के लिए स्थानीय स्तर पर जगह बैठकें होने लगीं। स्वयंसेवक मंडल का गठन होने लगा। मंडल के लोग गांवों-बाजारों में जाकर लोगों से सरकारी नौकरियों, उपाधियों व विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की अपील करते। इसी क्रम में जनवरी 1922 में चौरीचौरा से 1मील की दूरी पर स्थित छोटकी डुमरी गांव में इलाके के लोगों की मीटिंग हुई। जिसमें चौरी के लाल मोहम्मद के बुलावे पर गोरखपुर से गए कांग्रेस नेता हकीम आरिफ व अन्य कई नेताओं की देखरेख में असहयोग आंदोलन चलाने के लिए स्वयंसेवक मंडल का गठन किया गया। 

मंडल के लोग क्षेत्र के गांवों में घूम घूम कर असहयोग आंदोलन की अलख जगाने लगे। आंदोलन का प्रभाव बढ़ता जा रहा था जिससे ठंड के मौसम में भी बरतानिया हुकूमत के माथे पर पसीना छलकने लगा था।

1 फरवरी को भगवान अहीर के नेतृत्व में वालंटियर्स की टोली बाजार में घूम घूम कर लोगों से विदेशी वस्तुओं का त्याग करने की अपील कर रही थी, तभी कई पुलिस वालों के साथ थानेदार गुप्तेश्वर सिंह पहुंचा और भगवान अहीर की लाठियों से बुरी तरह पिटाई शुरू कर दी। जुलूस तितर बितर हो गया। पुलिस की इस ज्यादती का विरोध करने के लिए सत्याग्रहियों ने 4 फरवरी को चौरीचौरा में बड़ी सभा करने का ऐलान किया। सभा न हो सके इसलिए पुलिस ने 2 फरवरी को ही सत्याग्रहियों के दो प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

चार फरवरी को ब्रह्मपुर से करीब 400 सत्याग्रहियों का जत्था जुलूस की शक्ल में चौरीचौरा आया। आसपास के अन्य गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। चौरीचौरा थाना के सामने सभा शुरु हुई। देखते-देखते ढाई तीन हजार के करीब लोग जमा हो गए। स्थानीय कांग्रेसी नेता नजर अली सभा को सम्बोधित कर रहे थे, तभी थानेदार पुलिस वालों के साथ आया और सभा खत्म करने का हुक्म सुनाया। पर सत्याग्रहियों ने पुलिस का हुक्म मानने से इंकार कर दिया। सभा चलती रही।

पुलिस के एक सिपाही ने एक सत्याग्रही की गांधी टोपी को पांव से रौंद दिया था। इसपर सत्याग्रहियों का खून खौल उठा और उन्होंने जबरदस्त विरोध किया। जिससे बौखलाए थानेदार ने सभा पर गोलीबारी शुरु कर दी।

गोली तब तक चलती रही जबतक खत्म नहीं हो गई। गोली लगने से खेलावन भर और भगवान तेली समेत कई लोगों की मृत्यु हो गई, (मरने वालों की संख्या स्पष्ट नहीं है। सरकारी रिकार्ड के अनुसार 3 मौत हुई जबकि कहीं 11 और कहीं उससे भी ज्यादा लोगों के मरने की बात लिखी गई है। क्रांतिकारी मन्मथ नाथ गुप्त ने कालापानी में सजा काट रहे चौरीचौरा के द्वारिका प्रसाद के हवाले से कम से कम 26 सत्याग्रहियों के मारे जाने की बात लिखी है।) जबकि 50 से ज्यादा लोग घायल हो गए।

पुलिस द्वारा सत्याग्रहियों के ऊपर गोली चलाने और कई सत्याग्रहियों के मारे जाने की खबर इलाके में आग की तरह फैल गई। थोड़ी ही देर में आसपास के गांवों से निकल कर हजारो लोग चौरीचौरा थाने पर पहुंच गए। सत्याग्रहियों की लाशें देख उनका खून खौल उठा। भीड़ ने थाना घेर लिया। पुलिस वालों ने खुद को थाने में छिपा कर अंदर से कुंडी लगा ली। आक्रोशित भीड़ ने थाने में आग लगा दी जिसमें थानेदार समेत कुल 23 पुलिस वाले जिंदा जल कर मर गए। थाना फूंकने वाली भीड़ का नेतृत्व चौरी-चौरा के डुमरी खुर्द के लाल मुहम्मद, बिकरम अहीर, नजर अली, भगवान अहीर और अब्दुल्ला आदि कर रहे थे।

घटना के बाद गोरखपुर जिला कांग्रेस कमेटी के तत्कालीन उपसभापति प. दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने चिट्ठी लिखकर घटना की सूचना गांधी जी को दी। इस घटना को हिंसक मानते हुए गांधी जी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया।

थाने में 23 पुलिस वालों को जिंदा जलाकर मार डालने के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने इलाके में बर्बरता पूर्वक दमन चक्र चलाया। पुलिस ने इस मामले में कुल 232 लोगों का चालान किया जिसमें से 228 को कोर्ट में पेश किया गया और 225 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।

करीब 11 महीने तक चले मुकदमें के बाद गोरखपुर की सेशन कोर्ट ने 172 लोगों को फांसी, 2 को दो-दो साल कड़ी कैद की सजा सुनाई। इसके खिलाफ कांग्रेस की गोरखपुर जिला कमेटी ने हाईकोर्ट में अपील की जिसकी पैरवी पंडित मदन मोहन मालवीय ने की। हाईकोर्ट ने 19 को फांसी की सजा दी और लोगों में से 16 को कालापानी तथा बाकियों को आठ-पांच व दो साल की सजा सुनाई, जबकि बाकी दो को दंगा भड़काने के आरोप में 2 साल की सजा सुनाई गई। बाकी लोग बरी हो गए। यह कांग्रेस की बड़ी जीत थी।

इन्हें हुई फांसी :-

1. अब्दुल्ला चूड़िहार 
2. भगवान अहीर
3. बिकरम अहीर
4. दुधई
5. कालीचरन कहार
6. लाल मुहम्मद 
7. लवटू कहार
8. महादेव
9. मेघू अली 
10. नजर अली 
11. रघुबीर सुनार
12. राम लगन
13. रामस्वरूप बरई
14. रूदली केवट
15. सहदेव 
16. संपत चमार 
17. संपत पुत्र मोहन
18. श्याम सुन्दर मिश्र 
19. सीताराम 

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