बजट 2021 : निजी हाथों में देश सौंपने का सियासी घोषणापत्र है बजट !
महामारी के दौर में जबरदस्त मायूसी का सामना करने वाली जनता इस बजट से खासी उम्मीदें लगाकर बैठी थी लेकिन सोमवार को आया केंद्र सरकार का आम बजट लोगों को और ज्यादा मायूस कर गया है। जिस प्रकार से राजकोषीय और वित्तीय घाटा लगभग 9.5-10% तक पहुंच गया है, यह निवेशक और अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की बड़ी घंटी है।
● आलोक शुक्ल
महामारी के दौर में जबरदस्त मायूसी का सामना करने वाली जनता इस बजट से खासी उम्मीदें लगाकर बैठी थी लेकिन सोमवार को आया केंद्र सरकार का आम बजट लोगों को और ज्यादा मायूस कर गया है। लोगों की आशाओं आकांक्षाओं को एक झटके में ही धूल धुसरित कर गया यह बजट मुझे उस गैराज मैकेनिक की याद दिलाती है, जिसने अपने कस्टमर से कहा, “मैं तुम्हारे ब्रेक ठीक नहीं कर सकता था, इसलिए मैंने तुम्हारा हॉर्न की आवाज बढ़ा दी है।”
कोविड महामारी के बाद आये मोदी सरकार के पहले बजट में खतरनाक रूप से नीचे गिर रही अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने की दिशा में कोई कोशिश नहीं की गई है। न ही इसमें नौकरियां खो चुके और आय व जीवनयापन के स्तर में भारी गिरावट से परेशान लोगों के लिए कोई तात्कालिक राहत दी गई है। उल्टे इसमें संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था के बोझ को जनता के कंधों पर डाल बड़े काॅरपोरेटों के लिए अकूत सम्पत्ति जमा करने के और अवसर बना दिये गये हैं।
भीषण आर्थिक संकट से गुज़र रहे देश को जब बड़े फैसलों की आवश्यकता थी, तो मोदी सरकार का ध्यान सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने में है। इस आम बजट से स्पष्ट है कि “मैं देश नहीं बिकने दूँगा” के भावनात्मक नारे से सत्ता में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज देश को निजी उद्योगपतियों को सौंपने का पूरा मन बना चुके हैं।
यह भारत का पहला पेपरलेस बजट है और इस लिहाज से 100% दृष्टिहीन बजट भी है। बजट का थीम है बेचो भारत को! रेलवे बेची गई, हवाई अड्डे बेचा, बंदरगाह बेचा, बीमा बेचा, 23 PSUs बिके! आम लोगों की अनदेखी की। किसानों की अनदेखी की। अमीर, और अमीर हो रहे हैं, मध्यम वर्ग के लिए कुछ नहीं, गरीब, और गरीब होता जा रहा है। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का भी बजट में कोई जिक्र तक नहीं है। जबकि ग्रामीण गरीबों की यह मनरेगा योजना अंतिम आशा की किरण है। कोरोना संकट के समय भूखे प्यासे वापस गांव लौटे मजदूरों को भी इससे कुछ राहत मिली थी।
सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों एवं एक बीमा कंपनी को इस वित्तीय वर्ष में बेचने का मन बना लिया है। इसी वित्तीय वर्ष में जीवन बीमा निगम का भी आईपीओ शेयर बाजार में लाया जाएगा। बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश 49% से बढ़ाकर 74% करने की घोषणा हुई है। हमेशा से एफडीआई बढ़ाने का विरोध करती रही भाजपा सरकार अब यू-टर्न मार रही है। एक तरफ ‘लोकल फॉर वोकल’ का नारा दिया जाता है, तो दूसरी तरफ विदेशी निवेश 49% से भी ज़्यादा बढ़ाया जा रहा है। ये क्या है?
सरकार ने बजट में पेट्रोल-डीजल पर कृषि सेस लगाने का ऐलान किया है। पेट्रोल पर प्रति लीटर 2.50 रुपये और डीजल पर प्रति लीटर 4 रुपये का कृषि सेस लगाया गया है। इससे महंगाई तो बढ़ेगी ही, ये संघवाद पर एक और लूट है, राज्यों को राजस्व की लूट है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कल संसद में केंद्रीय बजट 2021-22 पेश करते हुए करीब एक घंटे 50 मिनट के भाषण में सरकार की जमकर तारीफ की, लेकिन अनेक अर्थशास्त्रियों और विपक्ष ने इसे खोखला करार दिया है।
हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने बजट की तारीफ में कहा कि ‘बजट में आत्मनिर्भरता का विज़न भी है और हर वर्ग का समावेश भी। हम इसमें जिन सिद्धांतों को लेकर चले हैं वो हैं- ग्रोथ के लिए नई संभावनाओं का विस्तार करना, युवाओं के लिए नए अवसरों का निर्माण करना, मानव संसाधन को एक नया आयाम देना।’
केंद्र सरकार ने रक्षा बजट नहीं बढ़ाया। जिस प्रकार से राजकोषीय और वित्तीय घाटा लगभग 9.5-10% तक पहुंच गया है, यह निवेशक और अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की बड़ी घंटी है।
लेकिन पीएम मोदी की ये बातें लोगों को खोखली लगती हैं तो उसकी वाजिब वजहें हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी बजट को मोदी सरकार द्वारा भारत की संपत्ति को अपने पूंजीवादी दोस्तों को सौंपने की योजना बता रहे हैं जो सही ही है।
स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव हों, टीएमसी के सांसद डेरेक ओ ब्रायन हों, राजद नेता तेजस्वी हों या सपा के अखिलेश यादव, सभी इस बजट ‘भारत को बेचो’ थीम वाला बजट करार दे रहे हैं।
कुल मिलाकर यह धोखेबाज बजट है। और देश को निजी हाथों में सौंपने का सियासी घोषणापत्र है !
