गांधी और अहिंसा के अविचल पाठ

Read Time: 6 minutes

सामाजिक हिंसा और मजहबी आधार पर भी माॅब लिंचिंग के शिकार भारत में सबसे ज्यादा हैं। देश की देह में बारूद की सुरंगें बिछी हैं। कुछ आत्महंता विचारधाराएं शहादत का चोला पहने इतिहास को धोखा दे रही हैं। गांधी की तयशुदा राय थी कि राज्यशक्ति हिंसा का भी एक हथियार है। अक्सर राज्यसत्ता की प्रतिरक्षात्मक हिंसा आक्रामक आतंकी, नक्सली या निजी अपराधी की हिंसा के मुकाबले ज्यादा धारदार और विषादमय हो जाती है। 

● कनक तिवारी 

चुनौतियां व्यक्तिगत स्तर से उठकर पूरे देश के सामने खड़ी हो जाएं, तब उनका उत्तर देना गांधी की थ्योरी के अनुसार अहिंसक रूप में ज़्यादा संभव रहा है। इसीलिए गांधी ने राजनीति के सबसे बड़े नियंता बनकर जनमानस को केवल भौतिक युद्ध की शक्ल में आंदोलन करना नहीं सिखाया। आंदोलन की तात्विक शुद्धता को नापने के लिए समय समय पर आंदोलनों को स्थगित भी किया। बल्कि हिंसा अपनाए जाने का आरोप लगाते हुए उनसे किनाराकशी भी की। फिर केन्द्रीय स्थान में आकर आंदोलन का अगले पड़ाव से प्रेरक नेतृत्व किया। 

गांधी की समझ थी कि अंग्रेज़ों के रचे शासनतंत्र में हिंसा सत्ता-प्रतिष्ठान की बहुत बड़ी शक्ति के रूप में इठलाती है। सत्ता संचालन के सूत्र ऐसे बनाए गए कि जनता की हिंसा का उत्तर राज्य की सुगठित और व्यापक हिंसा से दिया जाए। फिर समझाया जाए कि उससे ही अहिंसक सामाजिक स्थिति बनेगी। गांधी की तयशुदा राय थी कि राज्यशक्ति हिंसा का भी एक हथियार है। अक्सर राज्यसत्ता की प्रतिरक्षात्मक हिंसा आक्रामक आतंकी, नक्सली या निजी अपराधी की हिंसा के मुकाबले ज्यादा धारदार और विषादमय हो जाती है। 

भारत से अंग्रेज़ को हटाने, देश में फैली हिंसा को शांत करने और आन्दोलनों से जुड़े सभी तरह के जटिल मुद्दे हल करने में गांधी ‘राम‘ नाम का प्रयोग करते थे। उनका राम अर्थशास्त्र का अध्यापक होकर सबसे गरीब व्यक्ति की परिभाषा को माल्थस से कहीं आगे बढ़कर समझने के काम आता था। गांधी चाहते तो लोकप्रियता के आधार पर हिंसक आन्दोलनों को अंजाम दे सकते थे। गोलीकाण्ड करवाते। धार्मिक उपासना स्थल को ढहा देते और अराजकता के बावजूद अपनी पूरी शैली पर दार्शनिकता का मुलम्मा चढ़ा देते। कुछ लोग यही कुचक्र कर रहे हैं। 

बापू आत्मा के लोहारखाने के कारीगर थे। गरीब के मन से हीनता तथा अमीर के मन से अहंकार निकालकर भारतीय जीवन को गांधी ने संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण से अलग हटकर समास बना दिया था। अचानक उनकी छाती पर गोलियां लगने के बाद भी उनके शरीर का पूरा फ्रेम आत्मा के कब्जे में होने के कारण विचलित, आशंकित या बदहवास नहीं हुआ। 

बापू ने कभी नहीं कहा कि बहुत जरूरी होने पर सिद्धान्त से डिगे बिना वास्तविक मकसद हासिल करने के लिए हिंसा का सहारा लेना इकलौता विकल्प हो, तो उसे नहीं लिया जाए। यह समझना गलत है कि गांधी अहिंसा के अतिवादी पुजारी थे। 1942 में उन्होंने इशारों में कहा था, ‘जब आखिरी इंकलाब या क्रांति करते हो और अंग्रेज़ पकड़कर जेल ले जाने लगे, तो मत जाओ। जेल के कानून मत मानो और उपवास करो।‘ अपनी बात को तेज बनाने के लिए उन्होंने यहां तक कहा था कि जेल की दीवार से सर टकरा टकरा कर मर जाओ, लेकिन गलत बात मत मानो। अन्याय के आगे मत झुको। गांधी परंतुक लगाते हैं कि मकसद पाक साफ है, तभी अहिंसा वीर हृदय की प्राण वायु है। अन्यथा ठूंठ अहिंसा दुराग्रह है। उसकी दोयम दर्जे की स्थिति इस तरह भी समझी जा सकती है कि गांधी ने अपनी आत्मकथा को अहिंसा के साथ मेरे प्रयोग का नाम नहीं दिया।

गांधी की असफलताओं की भी लंबी चौड़ी फेहरिस्त है। वे पूरी जिंदगी अफसोस करते रहे कि लोगों ने उनकी बात नहीं मानी। ‘लोगों‘ से उनका संकेत और आशय सत्ता की चौकड़ी से था। 

गांधी ने साफ कहा कोई अपनी और अपनों की रक्षा अहिंसात्मक प्रतिरोध (जिसमें मृत्यु भी शामिल है) के द्वारा नहीं कर सकता तो वह आक्रमणकारी का मुकाबला हिंसा के आधार पर भी कर सकता है। जो दोनों में से एक भी यत्न नहीं कर सकता, खुद एक बोझ है। 

आज गांधी की अहिंसा दांव पर चढ़ी है। जिस बहुसंख्यक समाज के लिए गांधी ने अहिंसा का फलसफा विचार चौपाल पर रखा था, वह राज्यतंत्र के कुछ लोगों की मुट्ठी में आ जाता है। आजादी के बाद का भारत गांधी के सच की उलटबांसी है। भारत आधे अधूरे सच का यतीमखाना बना दिया गया है। गांधी के आज के सत्य के प्रयोगों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। 

गांधी ने कहा था अगर गरीबों के लिए कुछ किया भी जाता है, तो वह अहसान के रूप में किया जाता है। आज़ादी की लड़ाई में हमने कमजोरों की अहिंसा का उपयोग किया, लेकिन आजा़द हिन्दुस्तान में हमारा उद्देश्य बलवान की अहिंसक लड़ाई का विकास करना है। वे कहते थे पूरी तौर पर अहिंसक होना संभव नहीं लगता, लेकिन सत्य या अन्य नीति के मुकाबले भारत ने मेरी बात अहिंसा के इलाके में ज्यादा मानी है। 1942 का तथा कुछ और छिटपुट आंदोलन अहिंसा से छिटके हैं।

युवा पीढ़ी मौजूदा नेताओं को ही गांधी का वारिस समझती गांधी से अज्ञान के कारण नफरत पाल रही है। गांधी को सोशल मीडिया पर ट्रोल करती उनके हत्यारों को भी हीरो कहती है। किसान आंदोलन के जलते सवाल का संभावित उत्तर वक्त की दीवार पर महात्मा ने दशकों पहले लिख दिया था। उनका कहना था जब तक वातावरण में अहिंसा के लिए जगह न हो, तब तक कायरों को दंगों से बचाया नहीं जा सकता। गांधी ने खुद को भी दंगों के संदर्भ में लाचार पाया था। 

मजबूर होने पर गांधी खुद अहिंसा छोड़कर सत्य को पकड़े रहने के पक्ष में थे। जबान महात्मा गांधी और अहिंसा की आरती उतारे, दूसरी तरफ बन्दूकें और तलवारें जनता के ऊपर चलती रहें। करोड़ों गरीब, अशिक्षित, नामालूूम और पस्तहिम्मत हिंदुस्तानियों को निडर बनाना बहुत बड़ा नायाब गांधी प्रयोग हुआ। गीता या उपनिषदों के अभय की दार्शनिकता तो औसत जीवन में संभव नहीं हो, डर को निकाल फेंकना गांधी ने हर भारतीय में स्वायत्त कराया। 

गांधी कहते थे कि औसत भारतीय की दृष्टि आध्यात्मिक होती है। जो लोग इतिहास में शस्त्र उठाने को हिंसा मानकर पौराणिक आख्यानों को गलत समझाते हैं, उन्होंने गांधी की हत्या बार बार की। ऐसे लोगों ने अपनी छाती को गोलियों के सामने अड़ाने के बदले पीठ दिखाई। उनमें इतना साहस कभी नहीं रहा कि कत्ल के बदले कुर्बानी का पाठ पढ़ें। 

अहिंसा के पुजारी ने पस्तहिम्मत, मुफलिस बल्कि भिखारी तक को आत्मबल दिया कि अंग्रेज की तोप के मुकाबिल सीना अड़ाए।

आज आततायी सरकारी कानूनों में भारत नंबर एक बनकर इतरा रहा है। सामाजिक हिंसा और मजहबी आधार पर भी माॅब लिंचिंग के शिकार भारत में सबसे ज्यादा हैं। देश की देह में बारूद की सुरंगें बिछी हैं। कुछ आत्महंता विचारधाराएं शहादत का चोला पहने इतिहास को धोखा दे रही हैं।

(लेखक प्रख्यात गांधीवादी विचारक, साहित्यकार और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related

माफीनामों का ‘वीर’ : विनायक दामोदर सावरकर

Post Views: 207 इस देश के प्रबुद्धजनों का यह परम, पवित्र व अभीष्ट कर्तव्य है कि इन राष्ट्र हंताओं, देश के असली दुश्मनों और समाज की अमन और शांति में पलीता लगाने वाले इन फॉसिस्टों और आमजनविरोधी विचारधारा के पोषक इन क्रूरतम हत्यारों, दंगाइयों को जो आज रामनामी चद्दर ओढे़ हैं, पूरी तरह अनावृत्त करके […]

बस ज़रा और कांग्रेस होने की जरूरत है

Post Views: 201 शनिवार को हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग कई मायनों में ऐतिहासिक रही। इस बहुत कामयाब बैठक के बाद ऐसा माना जा रहा है कि कांग्रेस वापस लौट रही है। बस उसे ज़रा और कांग्रेस होने की जरूरत है! ● शकील अख्तर कांग्रेस के लिए काम करने वाले बहुत लोग हैं। अपने […]

‘उसने गांधी को क्यों मारा’- गांधी हत्या के पीछे के ‘वैचारिक षड्यंत्र’ को उजागर करती किताब

Post Views: 258 गांधी की हत्या, उसके कारण, साजिश और ‘विकृत मानसिकता’ के उभार को अपनी हालिया किताब ‘उसने गांधी को क्यों मारा ‘ में लेखक अशोक कुमार पांडेय ने प्रमाणिक स्त्रोतों के जरिए दर्ज किया है। ● कृष्ण मुरारी ‘भारत एक अजीब देश है। इस देश में सत्ता हासिल करने वालों को नहीं त्याग […]

error: Content is protected !!
Designed and Developed by CodesGesture