हिन्दु राजनीति, मुस्लिम राजनीति के खतरे

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दो दलीय प्रणाली जिसकी अंतिम नियति दो ध्रुवीय राजनीति होना है देश के अधिकांश लोगों की भावनाओं और विचारों का प्रतिनिधत्व नहीं कर सकती। ऐसी राजनीति से भाजपा और ओवेसी दोनो को कितना फायदा है यह भी बताने की जरूरत नहीं हैं। सब कुछ सामने दिख रहा है। 

● शकील अख्तर

हिन्दुओं के बाद अब मुसलमान भी प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के जाल फंसने लगे हैं। जिस दो दलीय प्रणाली की बात आडवानी जी करते थे और जो वास्तव में दो ध्रुवीय राजनीति थी वह कामयाब होने लगी है।

बिहार में जहां ओवेसी की पार्टी एआईएमआईएम का कुछ नहीं था वहां उसे 5 सीटें मिलीं और हैदराबाद जहां भाजपा नगण्य थी वहां उसने 48 सीटें जीतीं। ओवेसी बिहार के जरिए पूरे भारत में और भाजपा हैदराबाद के जरिए शेष बचे दक्षिण भारत में अपनी जगह बनाने लगे हैं। कभी जिस तरह रेलवे स्टेशनों पर आवाज लगाकर हिन्दू चाय, मुसलमान चाय बेची जाती थी आज वैसे ही हिन्दू पार्टी, मुस्लिम पार्टी की आवाजें लगने लगी हैं। देश की एकता और आखंडता के लिए यह कितना खतरनाक है यह कहने की जरूरत नहीं। 

इस राजनीति से भाजपा और ओवेसी दोनो को कितना फायदा है यह भी बताने की जरूरत नहीं हैं। सब कुछ सामने दिख रहा है। बिहार में ओवेसी ने तो खाली प्रवेश किया मगर कब्जा भाजपा ने किया। वह अपने सहयोगी जेडीयू से बड़ी पार्टी बन गई। नतीजे में जो नीतीश अभी तक हिन्दु मुसलमान राजनीति से खुद को बचाए हुए थे उन्होंने प्रतिक्रया में एक भी मुसलमान को अपने मंत्रिमंडल में नहीं लिया। मुख्यमंत्री नीतीश का यह फैसला भाजपा और ओवेसी दोनों के लिए अनुकूल है। भाजपा कहती है हमने मुसलमानों को रोका तो ओवेसी कहते हैं मैं ही तुम्हारा हमदर्द हूं!

विविधताओं से भरा यह देश जिसे दुनिया आश्चर्य से देखती अगर एक है तो इसके पीछे यहां सबकी इच्छाओं, आकांक्षाओं के अनुरूप बहुदलीय राजनीतिक प्रणाली है। जहां चाहे कम मिले लेकिन सबको थोड़ा थोड़ा प्रतिनिधित्व मिल जाता है। सबकी उम्मीदों का चिराग जलता रहता है। 

दो दलीय प्रणाली जिसकी अंतिम नियति दो ध्रुवीय राजनीति होना है देश के अधिकांश लोगों की भावनाओं और विचारों का प्रतिनिधत्व नहीं कर सकती।

अभी बराक ओबामा ने अपनी चर्चित किताब ‘ए प्रामिस्ड लैंड‘ में लिखा कि भारत आने से पहले वे आश्चर्य में थे कि इतना बड़ा देश कि दुनिया का हर छठा आदमी वहां रहता है। जहां दो हजार से ज्यादा संप्रदाय हैं और सात सौ से ज्यादा भाषाएं बोली जाती हैं। जहां राजनीतिक दलों के बीच कटु मतभेद हैं, अलगाववादी आंदोलन और हैं लेकिन इसके बीच में ही भारत की सफलता की कहानी है। वह सफलता क्या है? 

वह सफलता है “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा !“ जिसे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विविधता में एकता कहा था। जहां वे कांग्रेस प्रत्याशियों के खिलाफ वाजपेयी और लोहिया के जीतने पर खुश होते थे। 

देश में जब तक छोटे दल, राष्ट्रीय दल, क्षेत्रीय दल सब बने रहेंगे लोकतंत्र में लोगों का प्रतिनिधित्व ज्यादा से ज्यादा होगा। लेकिन जहां उनके विकल्प कम कर दिए गए उनके गैर लोकतांत्रिक रास्तों पर जाने की आशंकाएं बढ़ जाएंगी। इसके साथ ही राजनीतिक दलों का सबके लिए खुला होना जरूरी है। हर जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति का व्यक्ति हर दल में होना चाहिए। चाहे कम ज्यादा हों, मगर ऐसा न हो कि पूरा राजनीतिक दल एक ही धर्म, जाति का हो जाए।

भारत में यह कभी कामयाब हो हो नहीं सकता। इसे एक उदाहरण से ही समझा जा सकता है कि यहां हिन्दु महासभा फेल हो गई और भाजपा कामयाब हो गई। भाजपा को सबने वोट दिए। 1967, 1977 फिर वीपी सिंह के साथ के 1989 के चुनाव, फिर वाजपेयी को 1999 में मुसलमानों के वोट कम नहीं मिले। भाजपा सहित सभी दलों को सभी धर्मों एवं जातियों के वोट मिलते रहे। इसमें किसी को कभी कोई एतराज नहीं हुआ। 

समस्या नई अब पैदा हुई है। इसमें हिन्दुओं के बाद देश के दूसरे सबसे बड़ा धर्म मुसलमानों को एक मुस्लिम पार्टी की तरफ खींचा या धकेला जा रहा है।

अल्पसंख्यकों का स्वयं में सिमट जाना लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं है। अभी यह शुरूआत है इसे रोका जाना चाहिए। भारतीय मुसलमान के लिए भी यह अच्छा है और देश के लिए भी। 

वैसे तो किसी भी देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र सबके लिए अच्छा होता है मगर अल्पसंख्यकों के लिए यह जरूरी होता है। और इसे बनाए रखने की जिम्मेदारी सबकी होती है मगर अल्पसंख्यकों की सबसे ज्यादा। क्योंकि देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र कमजोर होते ही सबसे ज्यादा नुकसान उनका ही होता है। पिछले छह साल में मुसलमान इसे देख रहे है। और इसी का फायदा ओवेसी उठा रहे हैं। 

ओवेसी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों पर हमला करते हुए कहते हैं कि इन्होंने मुसलमानों के लिए क्या किया? दूसरी तरफ भाजपा तुष्टिकरण का नरेटिव गढ़ती है। यह भी आडवानी जी की देन है। उन्होंने तुष्टिकरण का इतना प्रचार किया कि कई गैर भाजपाई नेता जिनमें कांग्रेसी भी शामिल हैं यह मानते हैं कि कांग्रेस ने मुसलमानों को अलग से कुछ दिया है।

ओवेसी और भाजपा दोनों की राजनीति मुस्लिम केन्द्रीत है। और दोनों मुसलमान को लेकर इल्जाम उस पार्टी कांग्रेस पर लगाते हैं जिसका स्वरूप ही ऐसा है कि वह किसी एक धर्म, जाति, समुदाय के लिए काम कर ही नहीं सकती। कांग्रेस कमजोर ही तब से हुई है जबसे देश में मंडल, कमंडल की राजनीति शुरू हुई है। उत्तर प्रदेश और बिहार में जाति आधारित पार्टियों और केन्द्र में एवं दूसरे राज्यों में धर्म की राजनीति करने वाली पार्टी के मुकाबले कांग्रेस सिमटती चली गई। 

मुसलमानों के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी आईएमआईएम का और आ जाना कांग्रेस के लिए उतना नुकसानदेह नहीं जितना खुद मुसलमानों के लिए है।

मुसलमानों का ऐसा ही चित्रण तो भाजपा कब से करना चाहती थी। एक मुस्लिम पार्टी की तरफ मुसलमानों का झुकाव उसे हिन्दुओं के ध्रुवीकरण के लिए और सहायक होगा। ओवेसी की राजनीति से मुसलमानों को क्या मिलेगा यह तो किसी को नहीं मालूम मगर हैदराबाद में टीआरएस के कमजोर होने और भाजपा के कई गुना मजबूत होने से यह तो साफ हो गया कि उनकी राजनीति किसे फायदा और किसे नुकसान पहुंचा रही है।

अब बंगाल में चुनाव है। वहां सबसे ताकत से जो दो पार्टियां चुनाव लडेंगी वह वे हैं जो वहां सबसे कमजोर रही हैं। भाजपा और एआईएमआईएम। खुलकर हिन्दु मुसलमान की बात होगी। धर्म की राजनीति करने वाली इन दोनों पार्टियों को फायदा मिल सकता है। और जो पार्टियां टीएमसी, लेफ्ट, कांग्रेस ये बातें नहीं कर पाएंगी वे नुकसान में रहेंगी। 

यह प्रयोग भाजपा और ओवेसी दोनों के लिए फिलहाल फायदे का सौदा हो सकता है। लेकिन दीर्घकाल में यह देश की सामाजिक ताने बाने के लिए भारी नुकसानदेह होगा

ओवेसी बंगाल के बाद यूपी में भी कुछ सीटें जीत सकते हैं। मगर वे देश की धर्मनिरपेक्ष राजनीति और खासतौर से मुसलमानों को बड़ा नुकसान करेंगे। यहां यह सवाल उठ सकता है कि क्या ओवेसी को राजनीति करने का अधिकार नहीं है?  बिल्कुल है। जब वे हैदराबाद में कर रहे थे तो किसको एतराज था। या उनसे पहले उनके वालिद सुल्तान सलाहउद्दीन ओवेसी (जो लगातार 6 लोकसभा जीते) के 2004 तक राजनीति करने पर कभी कोई सवाल नहीं उठा। मगर अब जब वे किसी दूसरी पार्टी को मदद पहुंचाते दिख रहे हैं तो उन पर सवाल उठना ऐसे ही स्वाभाविक है जैसे आजकल मायावती पर उठते हैं। 

मायावती भी खुद को दलित की बेटी कहकर दलित की राजनीति करती थीं। मगर अब जब भी वे किसी राज्य में दलित का नाम लेकर चुनाव लड़ने जाती हैं तो सब समझ जाते हैं कि वे किस दल को फायदा पहुंचाने और किस को नुकसान पहुंचाने आई हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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