तांडव पर ‘तांडव’ किसान आंदोलन और ‘अर्णवगेट’ से ध्यान बँटाने की कोशिश है

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अर्नव गोस्वामी के लीक व्हाट्सएप चैट से जो सनसनीखेज खुलासे हुए हैं और सोशल मीडिया पर बालाकोट और पुलवामा को लेकर जो मैसेज तेजी से वायरल हो रहे हैं उस पर सरकार व बिकी हुई मीडिया मौत सी खामोशी ओढ़ चुकी है। राजधानी दिल्ली के बार्डर्स पर 55 दिन से जारी किसान आंदोलन को लेकर भी मीडिया का यही रोल है। सोशल मीडिया पर कृषि बिल को लेकर एक बड़ी मुहिम चल रही है। चैनलों की खोई विश्वसनीयता के दौर में किसानों को मिलता समर्थन सत्ता के लिए एक सिरदर्द साबित हो रहा है, ऐसे में तांडव फिल्म पर तांडव का होना लाजिमी था। 

● पवन सिंह

फिल्म “तांडव” पर यूं ही तांडव नहीं हुआ है इसके पीछे पूरी एक रणनीति है। किसानों ने 55 दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर धरना दे रखा है। किसानों के इस आंदोलन को कई तरह से बदनाम करने की तमाम कोशिशें फेल साबित हुईं। उल्टा यह आंदोलन राज्य दर राज्य भीतर खाने तेजी से फ़ैल रहा है। कहा गया कि उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलन के साथ नहीं हैं, लेकिन पिछले दिनों एक शूट से मैं लौटा हूं और गांव वालों की तमाम बाइट मेरी हार्ड डिस्क में सेव हैं जिसमें वो खुलकर किसान आंदोलन का साथ दे रहे हैं और सरकार को कोस रहे हैं। विदेशों में भी इस आंदोलन को लेकर खूब चर्चा है सिवाय भारत के बिके हुए गोदी मीडिया के। 

सोशल मीडिया पर कृषि बिल को लेकर एक बड़ी मुहिम चल रही है। आज हर आदमी के हाथ में एक मोबाइलनुमा टीवी है और वह बहुत सी बातों को सुन-समझ रहा है। चैनलों ने अपनी विश्वसनीयता खत्म कर दी है। किसानों को मिलता समर्थन एक सिरदर्द साबित हो रहा है, ऐसे में तांडव फिल्म पर तांडव का होना लाजिमी था। 

सोशल मीडिया पर बालाकोट और पुलवामा को लेकर जो बड़े खुलासे हुए हैं उस पर सरकार व बिका हुआ मीडिया मौत सी खामोशी ओढ़ चुका है। पुलवामा पर 40 सैनिकों की शहादत पर खुशियां मनाई जाती है और कैसे सत्ता के लिए संजीवनी बनती हैं..यह भी चैट में है। 500 पन्ने की यह चैट NM और AS और तमाम विशालकाय पिरामिडों की पोल खोलती नज़र आती है। 

भले ही यह चैट मेन‌स्ट्रीम मीडिया चबा गया हो और रात दिन फर्जी राष्ट्रवादी होने की पिपिहरी बजा रहा हो लेकिन पूरी की पूरी चैट राष्ट्रीय संप्रभुता व सुरक्षा के तमाम भेद खोलती है।

अर्णव गोस्वामी चैट लीक के बाद से गायब है लेकिन बतौर एक पत्रकार मेरे ज़ेहन में बार-बार न जाने क्यों यह आ रहा है कि अर्णव की हालत जस्टिस लोया जैसी हो सकती है। हो सकता है मेरा यह सोचना गलत भी हो लेकिन यह सच है कि सत्ता का चेहरा हमेशा से क्रूर रहा है। सत्ता को आवाम व राष्ट्र से बहुत कुछ लेना-देना नहीं होता है। आवाम की याद चुनाव तिथि घोषित होने के बाद से आनी शुरू होती है और मतगणना के दिन खत्म हो जाती है। ठीक भी है क्योंकि आवाम को अपने लिए कुछ चाहिए ही नहीं। नहीं तो अर्थव्यवस्था, जीडीपी, बैंकिंग सेक्टर की बदहाली, अडानी पर अरबों रुपये का बैंक बकाया, नौकरी, रोजगार, उद्योग-धंधे पर सवाल उठाती।

ऐसे में नेताओं को भी क्या पड़ी है। वह भी तांडव परोस रहे हैं और धर्म खिला रहे हैं। यही खाइए व बिछाइए। मैंने इससे पहले भी कई अखबारों में लेख लिखा कि चीन का मसला मीडिया से सिरे से गायब है। जबकि यह एक गंभीर मुद्दा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमारा राष्ट्रवाद पाकिस्तान से ही जाग्रत होता है। 

चीन पर अरूणाचल प्रदेश के ही भाजपा के एक सांसद ने करीब दो साल पहले भरी संसद में यह कहा था कि अरूणाचल के लोग हमें कभी माफ नहीं करेंगे यदि सच हमने सामने नहीं रखा तो। 

बकौल सांसद, चीन अरुणाचल की 10-15 किलोमीटर जमीन का गया है। यदि इस वीडियो को देखना चाहें तो यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। दो दिन पूर्व ही सैटेलाइट तस्वीरें सामने आई हैं कि चीन ने अरूणाचल प्रदेश की सीमा के पांच किलोमीटर भीतर गांव बसा लिए हैं। और सरकार जवाब देने की बजाय “तांडव” परोस रही है।

धर्म एक फिल्म के दो सीन से खतरे में आ गया है लेकिन अर्णव की चैट से और अरूणाचल प्रदेश में चीनी सच से देश खतरे में नहीं है?

खैर, जब सबका गला घोंटा ही जा रहा है तो फिल्म और थियेटर भी क्यों बचे। याद रखिएगा लोकतंत्र को सरकार नहीं आवाम खुद खत्म कर रही है। इसकी बहुत बडी कीमत चुकानी पड़ेगी। मेरी इस बात से बहुतों को असमति हो सकती है लेकिन यह सच है कि आंख पर पट्टी बांध कर चौराहे पर नंगे खड़ा हो जाना और यह सोचना कि कोई देख नहीं रहा है, यह असहमति ऐसी ही है। खैर, लोकतंत्र के तांडव नृत्य का मजा लीजिए…

भारत माता की जय।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख उनके फ़ेसबुक पेज से लिया गया है।)

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