तिरंगा लहराते किसानों को आतंकवाद से जोड़ आग से खेल रही है सरकार

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जनता की एकजुटता में एक ताकत होती है। उसी ताकत ने भूपिंदर सिंह मान को कोर्ट की बनाई कमेटी से अलग होने को मजबूर किया है। ये ताकत पंजाब के अलावा देश भर के किसानों के बीच और मजबूत हो रही है। इस ताकत का सम्मान कीजिए और इसकी बात सुनिए। ताकत का सही इस्तेमाल न किया जाए तो वह विनाशकारी हो सकती है।

● कृष्ण कान्त

सरकार आग से खेल रही है और सरकार के पालतू उसी आग में घी डाल रहे हैं। जो किसान आज तिरंगा लहरा रहे हैं, आप उन्हें कभी देशविरोधी और कभी खालिस्तानी बताकर भयानक भूल कर रहे हैं।

आंदोलन में मैं एक पंजाबी महिला से मिला। वे मोटी सैलरी पर नौकरी करती हैं लेकिन किसानों का साथ देने के लिए नौकरी छोड़ने को तैयार हैं। उनकी तकलीफ थी कि किसानों की बात सुनने की जगह सरकार हमें बदनाम कर रही है। वे हमें खालिस्तानी बता रहे हैं। हमारे लोग मर रहे हैं, फिर भी वे नहीं मान रहे कि हमें कोई तकलीफ है। सरकार ये मानने को तैयार नहीं है कि किसानों को कोई परेशानी है।

उन्होंने कहा, ये पूछ रहे हैं कि हमारी फंडिंग कहां से हो रही है। इनको अंदाजा नहीं है। मैं एक पंजाबी हूं। जिस दिन किसानों की तरफ से कॉल हुई, मैं अपनी सारी संपत्ति आंदोलन के लिए दान कर दूंगी। पंजाब में ये स्पिरिट है।

आंदोलन कर रहे किसानों को खालिस्तानी और पाकिस्तानी बताने की हरकत पूरे पंजाब को नाराज करेगी। पंजाब में जो लोग किसानों के साथ नहीं थे, अब वे भी साथ हैं।

जनता की एकजुटता में एक ताकत होती है। उसी ताकत ने भूपिंदर सिंह मान को कोर्ट की बनाई कमेटी से अलग होने को मजबूर किया है। ये ताकत पंजाब के अलावा देश भर के किसानों के बीच और मजबूत हो रही है। इस ताकत का सम्मान कीजिए और इसकी बात सुनिए। ताकत का सही इस्तेमाल न किया जाए तो वह विनाशकारी हो सकती है। कृषि का निजीकरण धीरे-धीरे भी हो सकता है। सरकार लूट लेने की इतनी जल्दी में क्यों हैं? 

जो किसान आज तिरंगा लहरा रहे हैं, आप उन्हें कभी देशविरोधी और कभी खालिस्तानी बता रहे हैं। ये ध्यान रखिए कि जनता की तनी हुई मु​ट्ठियों में जब तक तिरंगा है, तभी तक आप सुरक्षित हैं।

आप ये भी याद रखिए कि वे जो कड़ाके की ठंड में बैठे हैं, उनमें रिटायर्ड फौजी हैं, उनमें सैनिकों की मांएं और बीवियां हैं। आपका चुनावी राष्ट्रवाद, जीवन को दांव पर लगा देने वालों के राष्ट्रवाद के आगे हमेशा बौना ही रहेगा।

देश में जो भी वर्ग सरकार से असहमति जाहिर करे, उस पर आतंकी और देशविरोधी का लेबल चस्पा कर देना ऐसी ऐतिहासिक मूर्खता है, जिसका अंजाम भयानक भी हो सकता है। कोई सरकार या उसके समर्थक देश की राजधानी में बैठे लाखों लोगों को आतंकवाद से कैसे जोड़ सकते हैं?

क्या सच में आप मानते हैं कि आंदोलन कर रहे लाखों लोग किसानों के भेष में खालिस्तानी हैं? क्या आप सच में मानते हैं कि आपकी राजधानी को आतंकवादियों ने घेर लिया है और फिर भी आप सुरक्षित हैं? अगर आप ऐसा मानते हैं तो आप मानसिक विकार के शिकार हो चुके हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं। लेख उनके फ़ेसबुक पेज से साभार।)

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