प्रतीकों की जड़ता के विरुद्ध लड़ने वाले योद्धा थे वोरा जी
● हेमंत शर्मा
वे प्रतीकों की जड़ता के विरुद्ध लड़े। पद के अहंकार से सदैव बचकर रहे। उन्होंने लॉट साहब के आभिजात्य को तोड़ा था। राजभवन के तिलिस्म को तोड़ उसे लोकभवन बनाया था। वह राज्यपाल के पद को आम आदमी का द्वारपाल की तरह देखते थे। वे लोकतांत्रिक मान्यताओ में रचे पगे राजनेता थे। उनका व्यक्तित्व पद का मोहताज नही था। विनम्र ,शालीन, व्यवहारकुशल और मृदुभाषी मोतीलाल वोरा का जाना मेरे लिए निजी शोक है। दुखी हूँ मैने अपना एक अभिभावक और शुभचिन्तक खो दिया है। अपनी इन्ही खासियतो के कारण मध्यप्रदेश के दुर्ग से निकले मोती लाल वोरा की लोकप्रियता का दुर्ग उत्तर प्रदेश बना। उनके निधन से कॉंग्रेस में निष्ठा और समर्पण के एक युग का अन्त हुआ है।
कॉंग्रेस न जाने कितनी बार गिरी , लुढ़की। पर वोरा जी उम्र के इस पड़ाव पर भी हमेशा कांग्रेस अध्यक्ष के पीछे तन कर ही खड़े नज़र आए।मूल्यों के प्रति उनकी यही निष्ठा मोतीलाल वोरा बनाती है। राजनीति में वे हमेशा दलीय भावना से उपर दिखे। सही मायनों में अजातशत्रु।

वोरा जी ने अपना करियर पत्रकार के तौर पर शुरू किया था। पर छ्दम नाम से। उनके बड़े भाई गोविन्द लाल वोरा रायपुर से अपने सम्पादन जो अखबार निकालते थे। उसमें वे स्ट्रीगर थे। इसलिए छ्दमनाम से लिखते थे। यही वजह थी कि पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए उन्हे हमेशा अनुराग रहा।
बात 1988 की होगी। मेरी माता की आँख में रेटिना अपनी जगह से खिसक गया था। उसका आपरेशन एम्स में ही सम्भव था। वोरा जी स्वास्थ्य मंत्री थे। लखनऊ से मैंने उन्हे फ़ोन किया। उन्होंने सुबह घर पर बुलाया। मेरे सामने एम्स के डायरेक्टर को फ़ोन किया और एक पर्ची पर लिख कर दिया। ‘माता जी को फ़ौरन एडमिट करें।’ माता एडमिट हुई। वो शायद क्रिसमस का दिन था। जब मैं एम्स में माता के कमरे में पंहुचा। तो बाहर उनके नाम की जगह लिखा था, माता जी ऑफ श्री मोतीलाल वोरा। उनकी आँख ठीक हुई। वोरा जी एक रोज देखने भी आए। तब से उनका मिलता स्नेह जीवन के अन्तिम समय तक जारी रहा। मै कोविड से पीड़ित हो अस्पताल में भर्ती था। एक रोज देखा वोरा जी के दो मिस्ड कॉल हैं। मैंने हिम्मत कर वोरा जी को मिलाया। वोरा जी ने कहा पंडित जी हौसला रखिएगा। आप ठीक होगें। मुझे जब से पता चला परेशान था। आपको हिम्मत बँधाने के लिए फ़ोन किया। मुझे हौसला दिलाने वाले वोरा जी खुद कोविड से हौसला हार गए।
उनकी याददाश्त इतनी प्रबल थी। जब भी मिलते शिशु और वीणा के अलावा मेरे मित्रों को भी ज़रूर याद करते। उनके प्रिय मेरे मित्र विनोद सिंह थे। विनोद जी बनारस के पास बरैनी के भूमिहार हैं। अपने आगे किसी को कुछ समझते नही। बहुत ही शुष्क और खूसट आख़िरी बार मुस्कुराए भी तभी होगें जब पोखरण में परमाणु विस्फोट हुआ था। विनोद जी अक्सर मेरे घर में ही रहते। विश्वविद्यालय में मेरे सिनियर। बड़े विकट किस्स के पढ़ाकू। हिन्दू के साईन्स सेक्शन से लेकर मूँगफली के ठोगें ( अख़बार से बना पैकेट ) तक को खोलकर पढ जाते थे।

वह दौर राजनैतिक उठापटक का था। उनके राज्यपाल रहते दो दफ़ा उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा। वोरा जी अक्सर रात्रि ग्यारह बजे मुझसे बात करते। फ़ोन सीधे खुद करते। सूचनाओ का आदान प्रदान होता। मुझसे उन्हे राजनैतिक दल क्या कर रहे हैं, पता चलता। मुझे उनसे सरकार क्या कर रही है इसका अन्दाज़ लगता। बहुत अनौपचारिक रूप से घर परिवार देश दुनिया का हाल लेते हुए।
मै कुछ रोज के लिए परिवार सहित कहीं बाहर गया। विनोद जी घर पर थे। रात में। फ़ोन आया। विनोद जी के पढ़ने में ख़लल। उन्होंने अनमने ढंग से फ़ोन उठाया। उधर से आवाज़ आयी। पंडित जी से बात कराइए। विनोद जी ने पूछा, आप कौन ? उधर से बताया गया। विनोद जी ने छूटते कहा ‘ देखा ब्यौरा मत दा सही सही बतावा के बोलत हउआ। वोरा जी ने कहा। “ मै गवर्नर मोतीलाल वोरा बोल रहा हूँ।” विनोद जी को लगा कि कोई खेल रहा है रात में। बोले “ इहॉं कुल गवर्नरै फोन करलन। सही नाम नही बताएगे तो मै भी नही बताऊँगा कि वो कहॉं है। “ वोरा जी ने पूछा हेमन्त है कि नही। विनोद जी ने कहा नही वे बाहर है। “ वोरा जी ने कहा कि यही पहले ही आप बता देते तो आपका इतना क़ीमती वक़्त न बर्बाद होता।
बात आयी गयी हो गयी। मै कुछ दिनों बाद लौटा। फिर एक रोज किसी समारोह में वोरा जी मुझे मिले। धीरे से पूछा। कोई स्टाफ़ रखा है क्या ? मैंने कहा नही वोरा जी, आप को यह ग़लतफ़हमी कैसे हुई? उन्होंने आपके यहॉं एक ऐसा आदमी है, जिसे मुझे अपना नियुक्त पत्र दिखाना है। मेरे लिए यह पहेली बनती जा रही थी। मैंने पूछा आख़िर हुआ क्या ? उन्होंने तफ़सील से फिर पूरी कहानी बताई। मैं सिर पकड कर बैठ गया। मैं समझ गया था। विनोद जी ने काण्ड कर दिया। मैंने उनसे माफ़ी माँगी। पर वोरा जी ने मुझसे वायदा लिया की आप उन्हे कुछ कहेंगे नही। पर मै उनसे मिलना ज़रूर चाहूंगा। वो आदमी रोचक हैं।
हमने विनोद जी ढूँढना शुरू किया। उनसे पूछा। वे बोले कि पंडित जी एक दिन रात में कोई क फ़ोन आयल ज़रूर रहल। ऊ आपन नाम मोती लाल बोरा बता हमसे खेलत रहल। हम हडकावा। मैं जामे के बाहर हुआ। विनोद जी को बताया वे वोरा जी ही थे। विनोद जी ने पश्चाताप किया और कहा आप उनसे मिलवाइए, मै उनसे मिल कर माफ़ी मॉगूगां। मैंने बोरा जी को फ़ोन किया। कि विनोद जी अपने किए पर आपसे माफ़ी माँगना चाहते है। वोरा जी ने उन्हे अपने पास राजभवन बुलाया। चाय नाश्ता कराया और गप्प लड़ायी। विनोद जी पानी पानी।
पर वोरा जी उसके बाद जब भी मिलते वे विनोद जी का हाल ज़रूर पूछते। ऐसी कितनी ही स्नेहिल स्मृतियां उनके साथ जुड़ी हुई हैं। वे मेरे लिए राजनेता नही बल्कि परिवार का ही एक हिस्सा थे। बहुत याद आएँगे वोरा जी।
प्रणाम।
हेमंत शर्मा के फेसबुक वाल से साभार
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में रहते हैं।)
