बजाज के बाद अब Parle-G ने नफरती चैनलों को विज्ञापन किया बंद

Read Time: 4 minutes

पूर्वा स्टार टीम

आम आदमी का बिस्किट बनाने वाली कंपनी पारले जी ने बड़ा फैसला लिया है। कंपनी ने समाज में जहर घोलने वाले और उग्र कंटेंट प्रसारित करने वाले चैनलों पर विज्ञापन न देने का फैसला लिया है। पारले जी ने ये फैसला ऐसे वक्त में लिया है जब मुम्बई पुलिस ने कुछ दिनों पहले ही टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट से छेड़छाड़ करने वाले न्यूज चैनलों के एक गिरोह का पर्दाफाश किया है। मुम्बई पुलिस की कार्रवाई के बाद टीवी मीडिया को विज्ञापन देने वाली प्रमुख कम्पनियां और मीडिया एजेंसियां इस पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं। इसके पहले बजाज कंपनी भी इस तरह का निर्णय ले चुकी है।

‘पारले जी’ के वरिष्ठ अधिकारी कृष्णराव बुद्ध का कहना है, ‘कंपनी समाज में जहर घोलने वाले कंटेंट को प्रसारित करने वाले समाचार चैनलों पर विज्ञापन नहीं देगी और ऐसी संभावनाएं तलाशेगी जिसमें अन्य विज्ञापनकर्ता एक साथ आएं4विज्ञापन देने में संयम रखें ताकि सभी समाचार चैनलों को सीधा मैसेज मिले कि उन्हें अपने कंटेंट में बदलाव लाना होगा।

खुद को राष्ट्रीय न्यूज चैनल घोषित कर दिन रात हिंदू-मुसलमान करने और जातीय-धार्मिक विद्वेष फैलाने में लगे चैनलों के लिए भले ही यह बुरी खबर है लेकिन देश व समाज के लिए सुकून देने वाली भी है कि बड़े कारपोरेट्स घराने अब इन नफरती चैनलों के बहिष्कार की ओर अपने कदम बढ़ा रहे हैं। 

पारले जी का ये फैसला सामान्य दृष्टि से तो साधारण लगता है पर है असाधारण। साधारण इस दृष्टि से कि घृणा और झूठ फैलाने वालों को विज्ञापन के माध्यम से फंड करने का मतलब है घृणा के कारोबार में खुद भी भागीदार बनना इसलिए ये बेहद सामान्य है कि कोई कम्पनी ऐसा न करे। लेकिन ऐसे दौर में जबकि ऐसे किसी भी फैसले के बाद दक्षिणपंथी नफरती चिंटू बायकॉट कैम्पेन शुरू कर देते हैं। तब पारले जी का ये निर्णय एक साहसी और असाधारण फैसला लगने लगता है।

कंपनी का मानना है कि आक्रामकता और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाली बातों को बढ़ावा देने वाले समाचार चैनल उनके असली लक्षित उपभोक्ता तक अपनी पहुंच नहीं रखते। संख्या के लिहाज से इन कम्पनियों का ये निर्णय भले ही अभी कम असरकारी दिखता हो पर आगे चलकर इस मुहिम में और भी कम्पनियाँ जुड़ेंगी, तब इसका व्यापक असर दिखेगा। 

आज रिपब्लिक टीवी जैसे न्यूज चैनल पर आम आदमी पार्टी का विज्ञापन भी आता है। जबकि ये वो पार्टी है जो बदलाव की राजनीति करने का वायदा करके चुनावों में उतरी थी लेकिन वह भी नफरत के इस साम्राज्य में हिस्सा लेने से नहीं चुकी, ऐसे में एक कॉरपोरेट कम्पनी का ये निर्णय लेना अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

बजाज कम्पनी और पारले जी के इस निर्णय को लोगों को बताने की जरूरत है। ताकि जनता इस निर्णय का स्वागत करे, बाकी कम्पनियां भी ऐसा करें तो घृणा फैलाने वाले चैनलों को या तो अपना चैनल बदलना पड़ जाएगा या घृणा फैलाना बन्द करना पड़ेगा। टीवी चैनल कॉरपोरेट के विज्ञापन के पैसे के बिना नहीं चल सकते। रिपब्लिक टीवी, जी न्यूज, सुदर्शन टीवी जैसे चैनलों और अखबारों का पूरा कारोबार कॉरपोरेट और सरकारी विज्ञापनों के दम पर चलता है। सरकार केवल उन्हीं चैनलों, अखबारों को विज्ञापन देती है जो सरकार के भौंपू बनकर काम करते हैं, जबकि उन चैनलों को विज्ञापन देना बन्द कर देती है जो जनसरोकारों को उठाते हुए सरकार से जरूरी प्रश्न करते हैं। फलस्वरूप नफरती चैनल दिनरात फलते फूलते हैं और अच्छे समाचार चैनल बन्द हो जाते हैं या संसाधनों की कमीं से जूझते रहते हैं।लेकिन टीवी चैनल केवल सरकारी विज्ञापन के पैसे से नहीं चल सकते, अंततः कॉरपोरेट ही इन सब टीवी चैनलों की रीढ़ की हड्डी है। यदि कॉरपोरेट तय कर ले कि वह ऐसे चैनलों को विज्ञापन देंगे जो झूठ-फरेब, अफवाह और घृणा नहीं बेचते, ऑटोमेटिकली मीडिया की स्थिति सुधर जाएगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related

माफीनामों का ‘वीर’ : विनायक दामोदर सावरकर

Post Views: 207 इस देश के प्रबुद्धजनों का यह परम, पवित्र व अभीष्ट कर्तव्य है कि इन राष्ट्र हंताओं, देश के असली दुश्मनों और समाज की अमन और शांति में पलीता लगाने वाले इन फॉसिस्टों और आमजनविरोधी विचारधारा के पोषक इन क्रूरतम हत्यारों, दंगाइयों को जो आज रामनामी चद्दर ओढे़ हैं, पूरी तरह अनावृत्त करके […]

ओवैसी मीडिया के इतने चहेते क्यों ?

Post Views: 225 मीडिया और सरकार, दोनो के ही द्वारा इन दिनों मुसलमानों का विश्वास जीतने की कोशिश की जा रही है कि उन्हें सही समय पर बताया जा सके कि उनके सच्चे हमदर्द असदउद्दीन ओवैसी साहब हैं। ● शकील अख्तर असदउद्दीन ओवैसी इस समय मीडिया के सबसे प्रिय नेता बने हुए हैं। उम्मीद है […]

मोदी सरकार कर रही सुरक्षा बलों का राजनीतिकरण!

Post Views: 177 ● अनिल जैन विपक्ष शासित राज्य सरकारों को अस्थिर या परेशान करने के लिए राज्यपाल, चुनाव आयोग, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), आयकर, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) आदि संस्थाओं और केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग तो केंद्र सरकार द्वारा पिछले छह-सात सालों से समय-समय पर किया ही जा रहा है। लेकिन […]

error: Content is protected !!
Designed and Developed by CodesGesture