गांधी-150 में ऐसा क्या था जो गांधी-151 में नहीं है?
गांधीजी की जन्म शताब्दी पर विनोबा ने एक महत्वपूर्ण बात कही थी – ‘जो 99 में नहीं था, 100 में है और 101 में समाप्त हो जाएगा, वह एक ज्वार है जो उतर जाएगा’
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गांधीजी 151 साल के हो गए। इतने साल भी कोई जीता है भला। अगर जी भी जाए तो काया निरोगी न रहे। सुखी और प्रसन्न न रहे। कथाओं में भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान था। तो भी अंतिम अवस्था बाणशय्या पर आंसू बहाते हुए बीती। 79 साल में दुनिया छोड़ गए बापू के अंतिम कुछ वर्ष भी ऐसे ही रहे।
अक्सर वयोवृद्ध पिता जीते जी बोझ सरीखे होते जाते हैं। लेकिन मृत्यु के बाद मुंडेर पर आए कौए को भी पिंड खिलाया जाता है। पूरे गांव-समाज को मृत्युभोज दिया जाता है। छाता, जूता, खटिया, दरी, लोटा और लालटेन दान किया जाता है। जीते जी श्रद्धा रही हो या नहीं, मृत्योपरांत श्राद्ध में कोई कमी-कोताही नहीं होती। कबीर भजन को एकदम कबीराना अंदाज में ही गाने वाले तारा सिंह डोडवे गाते हैं – ‘जीवत बाप के रोटी न देवै, मरवा बाद पछितैहैं रे अंधेरी दुनिया…’.
आजकल जीवितों का जन्मदिन और पितरों की जयंती मनाने पर बड़ा जोर रहता है। हम भूल भी जाएं, तो सोशल मीडिया याद रखता है और याद दिलाता है। जन्मदिन वालों के लिए बधाइयां और शुभकामनाएं मिलती हैं। जयंती वाले पितरों को नमन, वंदन और श्रद्धांजलियां चलती हैं। आजकल बैंक और एलआईसी वाले भी हमारे आधिकारिक जन्मदिन पर एसएमएस के जरिए शुभकामना संदेश भेजते हैं। बैंक वाले समृद्धि की कामना वाला संदेश भेजते हैं ताकि खाता चलता रहे। जीवन बीमा वाले दीर्घायु होने की कामना वाला संदेश भेजते हैं, ताकि हम पॉलिसी मैच्योर होने तक जीवित रहें। जिस तरह जन्मदिवस को लेकर बाज़ार ने ‘कार्ड्स’ और ‘गिफ्ट्स’ का एक पूरा व्यापार खड़ा कर लिया है, उसी तरह से जयंतियों का भी है। बाज़ार भले इसमें नहीं पड़ता, लेकिन सरकारें और संस्थाएं बढ़-चढ़कर पड़ती हैं। यह एक दिन की उत्सवधर्मी श्रद्धा होती है। सरकारी कर्मचारियों को भी इसी बहाने एक दिन की छुट्टी मिल जाती है।
लेकिन जयंतियों में भी महाजयंती वर्ष होते हैं शताब्दी, डेढ़-शताब्दी, द्विशताब्दी, पंचशताब्दी और सहस्त्राब्दी आदि वर्ष। स्वर्ण, रजत, हीरक आदि जयंतियां हमारे जीवन में सोने, चांदी और हीरे का महत्व बताती हैं। या यूं कहें कि सोने और हीरे जैसी धातुओं का ही महत्व बताती हैं। महापुरुषों का नाम तो मानो एक बहाना भर रह गया है। 1969 में जब गांधीजी की जन्म शताब्दी मनाई जा रही थी, तब विनोबा ने एक महत्वपूर्ण बात कही थी:
“गांधी शताब्दी के उत्साह का उपयोग मत कीजिए। वह बड़ा खतरनाक है। जो 99 में नहीं था, 100 में है और 101 में समाप्त हो जाएगा, वह एक ज्वार है, जो उतर जाएगा।”
गांधीजी के डेढ़ सौवें वर्ष में भी यही देखने को मिला। एक ज्वार आया, जो अब उतर गया है। ऐसा क्यों होता है? इसलिए कि हम बहुत-से-बहुत होता है तो व्यक्ति और घटना तक ही पहुंच पाते हैं। विचार तक पहुंचना और उसे समझना हमें मुश्किल लगता है। आज के समय में तो ‘बोरिंग’ लगता है। गंभीर और ‘सीरियस’ की मुहर लगाकर उसे हम ‘पकाऊ’ तक बताते हैं। हमें कहानियां अच्छी लगती हैं। हमें फोटो और वीडियो का उपभोग करना सुहाता है। आवाज़ और संगीत का बढ़िया समन्वय हो तो दो-चार मिनट का समय दे सकते हैं। एडिटिंग और इफेक्ट्स का भी कमाल होना चाहिए। गांधीजी का विचार सुनाने के लिए भी फिल्म अभिनेता और अभिनेत्रियां चाहिए। राजकुमार हिरानी और मुन्नाभाई चाहिए।
विचार को बुद्धि के स्तर पर समझ लिया और उसे यहां-वहां लिखकर उसका प्रचार-प्रसार भी कर दिया, तो उससे भी बात नहीं बनती। अक्सर यह हमारे अपने लिए नहीं दूसरों के लिए होता है। हम इसे अपने ज्ञान प्रदर्शन की वस्तु बना लेते हैं। उसे तरह-तरह से ‘प्रासंगिक’ बनाने के लिए ‘प्रसंग’ ढूंढ़ने लगते हैं। जैसे ही कोई घटना (वैसे आजकल दुर्घटनाओं का महत्व ज्यादा है) होती है, तो हम पूछने-बताने लगते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में गांधीजी ने क्या कहा था, क्या नहीं कहा था। ‘सामयिकता’ ही छपास को तय करती है। गांधीजी पर कोई लेख या विचार 2 अक्टूबर या 30 जनवरी को ही छपेगा। 1 अक्टूबर या 3 अक्टूबर को वह सामयिक नहीं रहता। 29 जनवरी या 31 जनवरी को भी वह सामयिक नहीं रहता।
विचार जीने के लिए होते हैं। विचारों को समझना और स्वीकारना एक बात है, लेकिन जीवन में अपनाना या जीना दूसरी बात है। स्वीकारना आसान होता है। उतने से ही हमारा काम चल जाता है। हमारा जीवन और कुछ नहीं, बल्कि विचारों का समुच्च्य है, उनका व्यावहारिक प्रकटीकरण है। हम चाहे-अनचाहे विचारों को ही जीते हैं। लेकिन अक्सर जिन महान विचारों को जानने, समझने और स्वीकारने का दावा करते हैं, उन्हें जीने का सजग प्रयास करने के बजाय हम उनका ‘जड़ाध्यास’ करते हैं। हम गांधीजी के विचारों को स्वीकारते हैं, मानते हैं, पूजते हैं और इतने से ही हम ‘गांधीवादी’ कहलाने के अधिकारी हो जाते हैं। अगर विचारों में भी उलझना मुश्किल लगता हो, तो एक महापुरुष के रूप में हम उनकी पूजा करने लगते हैं। तस्वीर और मूर्ति रख लेते हैं। यह ज्यादा आसान है। इससे एक संतुष्टि-सी मिलती रहती है कि हम भी गांधीजी को मानने वाले लोग हैं। गांधीजी भी हमारे लिए भौतिक उपयोग की वस्तु जैसे बनते जाते हैं।
इसमें कोई इतनी बुराई भी नहीं है। महापुरुषों या महर्षियों की स्मृतियों से हमारे मन का कलुष दूर होता है। हम उनके सद्कार्यों का स्मरण करते हैं। उनकी सीख को याद करते हैं। यदि उन पर सतत चिंतन चलता है और हम उनकी ही तरह सोचने-बरतने का थोड़ा-बहुत भी प्रयास करते हैं तो उसका कुछ न कुछ असर तो होता ही है। महापुरुष भी हाड़-मांस के ही बने होते हैं। लेकिन उनकी जीवन-साधना और उनका पुरुषार्थ विशेष होता है, क्योंकि वे अपने जीवन को किसी व्यापक उद्देश्य से जोड़ते हैं। हम सबमें यह संभावना छिपी होती है लेकिन हमारे विचार उन महापुरुषों से स्वतंत्र होते हैं। हमें लगातार चिंतन करते रहना होता है। और उससे छने-बने विचारों का जीवन में व्यावहारिक प्रयोग करते रहना होता है। गांधीजी ने स्वयं भी तो यही किया था। इसलिए जिस तरह 151 के गांधीजी 150 के गांधीजी से ज्यादा परिपक्व हुए माने जाएंगे, उसी तरह हम भी नित्य अपने विचारों को संवर्धित करते हुए आगे बढ़ें।
8 अगस्त, 1942 को अपने प्रसिद्ध संबोधन में उन्होंने कहा था:
“दोस्तों मेरा विश्वास करो। मैं मरने के लिए कतई उत्सुक नहीं हूं। मैं अपनी पूरी आयु जीना चाहता हूं। और मेरे विचार से वह आयु कम-से-कम 120 साल है। उस समय तक भारत स्वतंत्र हो जाएगा और संसार स्वतंत्र हो जाएगा। मैं आपको यह भी बता दूं कि मैं इस दृष्टि से इग्लैंड या अमेरिका को भी स्वतंत्र देश नहीं मानता। ये अपने ढंग से स्वतंत्र देश हैं। ये पृथ्वी की अश्वेत जातियों को दासता के पाश में बांधे रखने के लिए स्वतंत्र हैं। … आप स्वतंत्रता की मेरी परिकल्पना को सीमित न करें।”
गांधीजी 125 साल इसलिए जीना चाहते थे कि सत्य के अपने प्रयोगों को वे और भी फलीभूत होते देखना चाहते थे। लेकिन वही गांधीजी अपनी मृत्यु से लगभग दो महीने पहले 2 दिसंबर, 1947 को अपनी प्रार्थना सभा में कहते हैं:
“एक अनुभवी बूढ़ा आदमी आपसे जो कुछ कह रहा है वह मानना चाहें तो मानें। वरना तो इस मामले में मेरी बात अरण्यरुदन ही है, यह मैं जानता हूं। फिर भी जो बात मुझे सत्य जान पड़ती है उसे कहना मैं अपना धर्म मानता हूं, इसलिए कहता हूं। अब मेरे मन में बहुत दिनों तक जीने की कोई इच्छा नहीं, उत्साह भी नहीं। एक समय था जब मेरी कामना थी कि मैं 125 वर्ष तक जिऊं और रामराज्य की स्थापना करूं। लेकिन यदि इसमें आपकी मदद ही नहीं मिली तो मैं अकेला क्या कर सकता हूं?”
गांधीजी के जाने के बाद इन 72 वर्षों में देश किस रूप में बदला है, किस दिशा में बढ़ा है, इसका ठीक-ठीक आकलन करने के लिए हम राजनीति और अर्थव्यवस्था को ही इसका आधार बनाने को प्रवृत्त रहते हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर प्रगति और अधोगति का आकलन करने का ठीक-ठीक पैमाना ही हम समझ नहीं पाए हैं। आजकल बढ़ रही मनोविकृतियों के संदर्भ में कई बार मनोवैज्ञानिक संकटों की ओर ध्यान दिलाया जाता है। लेकिन वहां भी समग्रता में चिंतन का अभाव दिखता है।
गांधीजी ने इसलिए अक्टूबर, 1945 में नेहरू जी को लिखे पत्र में भारतीय समाज को मौलिक रूप से चैतन्य बनाने की बात की थी। और उसकी मार्फत पूरी दुनिया या पूरी मानवता के चैतन्य बनने का मार्ग प्रशस्त करने की बात की थी। उस चैतन्यता का क्या अर्थ था? उस चैतन्यता के अभाव में भारत की राजनीति, आर्थिकी, सामाजिकता, संस्कृति और मानसिकता में किस प्रकार की गिरावट आई है। क्या उसका नैतिकता और अनैतिकता की कसौटियों पर कोई अध्ययन किया जा सकता है? क्या मनुष्य धर्म या इंसानियत की कसौटी पर इस समाज के पुनर्निर्माण या नवनिर्माण के लिए गांधीजी का आह्वान याद करने की कोशिश होगी?
तो जिन गांधीजी का मोहभंग अपने 75वें साल में ही होने लगा था, उन गांधीजी के 151वें साल में हम केवल उनके खट्टे-मीठे जीवन-प्रसंगों को ही लेकर बैठे रहे। जिस व्यक्ति ने विचार और कर्मयोग के प्रयोगों में अपना जीवन होम कर दिया, हम उनके छिटपुट और प्रामाणिक-अप्रामाणिक वक्तव्यों को दुहरा-दुहराकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ रहे हैं।
हमने उनके एकादश व्रतों और रचनात्मक कार्यक्रमों को नई चुनौतियों के आधार पर अद्यतित कर अपनाने की दिशा में किसी प्रयास के बारे में कुछ सुना क्या? जे. सी. कुमारप्पा के समाजशास्त्र और प्रकृति-अनुकूल अर्थशास्त्र पर कोई प्रायोगिक परियोजना की बात सुनी क्या? ऐसी कोई बात अकादमिक जगत तक में नहीं हो रही। विनोबा के स्वराज्य शास्त्र और समन्वयकारी अध्यात्म पर चर्चा नहीं हो रही। ऐसे में गांधीजी को स्वयं अच्छा नहीं लगता कि हम अपने-अपने निजी जीवन में वैचारिक साधना और प्रयोगों को स्थान देना भूल गए हैं। सत्तावादी राजनीति और भोगवादी आर्थिकी की अंधी दौड़ में हम कुछ सुनने-समझने तक का समय और धैर्य खोते जा रहे हैं, उसे अपनाना और करना तो उसके बाद की बात है।
अच्छा हुआ कि गांधीजी अपने 79वें साल में ही चले गए। यदि सचमुच 150 साल जी जाते तो पता नहीं क्या-क्या देखना पड़ता! अब तो मौजूदा भारत भी दो साल बाद 75 का हो जाएगा। आज से छह साल बाद वह उतनी ही उमर का हो जाएगा जितना गांधीजी जिए। यह सारा हिसाब-किताब समय को गणित में बांधने वाली बात है। काल तो अनादि अनंत है। वह वास्तव में अकाल है। व्यक्ति की आयु सीमित होती है। काल के चक्र में दुनिया के राष्ट्रों का भी क्या होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। अब तो दुनिया के स्तर पर यह चिंतन चलता है कि धरती रहेगी या बचेगी।
150 या 151 के गांधीजी और 75 के भारत वाली वार्षिक उत्सवधर्मिता अतीतोन्मुखी कालगणना के फेरे में फंसे रहने वाली स्थिति है। यह सार्वजनिक मनबहलाव का अवसरानुकूल झुनझुना जैसा होता है। एक तात्कालिक ‘किक’ जैसी होती है। एक ज्वार या प्रक्षेप जैसा होता है। रस्म और त्यौहार जैसा होता है। होली के अगले दिन सारे लिपे-पुते रंग धुल जाते हैं। दिवाली के अगले दिन दीयों-पटाखों का अवशेष बटोरते और बुहारते हैं। सारा उत्साह ढल जाता है। सारी खुमारी उतर जाती है। फिर अगले साल का इंतज़ार रहता है।
150 के गांधीजी वाले प्रौढ़जन 175 या 200 के गांधीजी तक शायद ही बचें। इसलिए हम जीवित मनुष्यों के लिए तो जो कुछ है, वह आज ही है।
संत कबीर कह गए हैं-
आज काल के बीच में, जंगल होगा बास
ऊपर ऊपर हल फिरै, ढोर चरेंगे घास
