उपचुनावों में बुरे फँसे ज्योतिरादित्य सिंधिया !

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राजनीतिक पर्यवेक्षक पिछले दिनों हुए कमलनाथ के रोड ‘शो’ के कामयाब होने की 2 वजहें मानते हैं। पहली, स्थानीय स्तर पर लोग ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के ‘राजनीतिक अवसरवाद’ से नाखुश हैं। और दूसरी, हालिया दिनों में बीजेपी की कई नीतियों को लेकर उनके मन में तेजी से उभरने वाला रोष है। भोपाल स्थित बीजेपी मुख्यालय में कमलनाथ की ग्वालियर यात्रा को मिली कामयाबी पर चिंतन और मनन चल रहा है।

• आलोक शुक्ल

मार्च के तीसरे हफ़्ते में कमलनाथ की राज्य सरकार गिराने में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ने वाले विधायकों में ज्यादातर उनके ग्वालियर-चम्बल संभाग के ही थे। इस दृष्टि से कमलनाथ, सिंधिया और शिवराज सिंह- तीनों के लिए इस क्षेत्र का बहुत बड़ा महत्व है। इसी वजह से पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपना पहला उपचुनावी हल्ला इसी क्षेत्र पर बोला। 

दो दिन का कार्यक्रम बनाकर यहां आए कमलनाथ ने एयरपोर्ट से लेकर रानी लक्ष्मीबाई समाधिस्थल तक 7 किमी लंबा रोड शो किया, कार्यकर्ताओं का एक बड़ा सम्मलेन किया और संवाददाता सम्मेलन भी रखा। इन कार्यक्रमों में ग्वालियर-चम्बल संभाग के पिछड़ेपन के लिए सिंधिया वंश को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने कहा कि अब वह इस एरिया के विकास का संकल्प लेकर जा रहे हैं। 

दौरे को फ़ेल करने की कोशिश :

बीजेपी ने कमलनाथ के कार्यक्रम में विध्वंस के लिए 5 दिन पहले से ही मोर्चा खड़ा कर दिया था। इसके लिए राज्य के 2 काबीना मंत्रियों की ड्यूटी लगाकर उसने प्रशासन का भी भरपूर साथ लिया। पूर्व मुख्यमंत्री के आगमन की तैयारी में लगे बैनर और झंडों को 3 दिन पहले जिला प्रशासन ने उखाड़ फेंका। कमलनाथ के रोड शो को भी काले झंडे दिखा कर अस्त-व्यस्त करने की नाकाम कोशिश की गई। स्थानीय लोगों में इसकी विपरीत प्रतिक्रिया हुई।

ग्वालियर और चम्बल संभाग हमेशा से सिंधिया घराने की राजनीतिक सम्पदा के तौर पर देखे जाते थे। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में इस राजनीतिक मिथ का क़िला उस समय भरभरा कर ढह गया जब गुना सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया सवा लाख वोटों के विशाल मार्जिन से हार गए।

मज़ेदार बात यह है कि तब प्रदेश में कांग्रेस की हुक़ूमत थी। सिंधिया इस सीट का प्रतिनिधित्व सन 2004 से कर रहे थे। इससे पहले इस सीट पर उनके पिता माधवराव सिंधिया और दादी राजमाता सिंधिया का प्रभुत्व रहा था।

राहुल ने दी थी अहमियत :

वस्तुतः दिसंबर, 2018 में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में कमलनाथ से पिछड़ जाने के बाद से ही सिंधिया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद की चाह में डूबते-उतराते रहे थे। राहुल गाँधी ने उन्हें लोकसभा चुनावों पर फोकस करने और अच्छे ‘रिज़ल्ट’ देने को कहा था। विधानसभा चुनावों से अलग 2019 के लोकसभा चुनाव के टिकटों के बंटवारे में उनकी ठीक-ठीक सुनी गई।

चंबल-ग्वालियर संभाग के टिकटों के वारे न्यारे तो उनके नाम कर ही दिए गए थे, प्रदेश में कई और जगहों में भी हाथ मारने में उन्हें छूट मिली। दरअसल, राहुल गाँधी ने अपने इस युवा चेले से पीसीसी चीफ़ की तरह काम लेना शुरू कर दिया था। 

प्रदेश अध्यक्ष बनाने की मांग :

गुना की अपनी सीट से हारने और बाक़ी सीटों पर भी सूपड़ा साफ़ होने के बावजूद प्रदेश अध्यक्ष बनने की उनकी महत्वाकांक्षा को विराम नहीं लगा। सितम्बर का महीना शुरू होते ही उन्होंने ग्वालियर संभाग में अपने समर्थकों की तरफ से सोनिया गाँधी के नाम बड़े-बड़े बैनर लगवाए जिसमें उन्हें पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की मांग की गई थी। 

उनकी इस महत्वाकांक्षा को पार्टी आलाकमान की तरफ से हवा नहीं मिली और अंततः 6 महीने के भीतर लगभग 25 विधायकों के साथ उन्होंने पार्टी छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया। इनमें से 16 विधायक उनके अपने चम्बल-ग्वालियर संभाग के थे। आगे चलकर अपने 9 समर्थकों को वह शिवराज सिंह चौहान के कई महीनों वाले ‘एकला चलो मंत्रिमंडल’ में मंत्री बनवा सके। इनमें 6 पिछले कमलनाथ मंत्रिमंडल में काबीना मंत्री थे।

सिंधिया समर्थकों की राजनीति :

ज्योतिरादित्य कई महीनों से यह फीडबैक लेना चाह रहे थे कि क्या अपने चेलों के साथ किए गए पार्टी बदल कार्यक्रम को उनके क्षेत्र के मतदाताओं के बड़े हिस्से ने सकारात्मक तरीके से लिया है? यूं तो कहने को वह और उनके समर्थक प्रचार करते घूमते रहे कि उनके बाहर आने के बाद से कांग्रेस ‘पैरेलैटिक’ (लकवाग्रस्त) हो गयी है। कमलनाथ के उनके क्षेत्र में प्रवेश को उन्होंने बड़े खतरे के रूप में देखा और यही वजह है कि उसे असफल बनाने की सभी कोशिशें शुरू कर दी गईं।

कमलनाथ की यात्रा को ‘पंक्चर’ करने के लिए प्रदेश के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर की ड्यूटी लगी। तोमर इसी क्षेत्र के हैं और सिंधिया कैम्प के महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। लेकिन 18-19 सितंबर के कमलनाथ के ग्वालियर हल्लाबोल कार्यक्रम की घोषणा से सिंधिया कैम्प उखड़ गया। 

बैनर उतारने को लेकर घमासान :

16 सितंबर को ‘नगर निगम’ के कर्मचारियों की टीम ने सड़कों पर कमलनाथ के स्वागतार्थ लगे बैनरों को ‘बिना अनुमति’ के लगा होना कह कर उतारने का अभियान फूलबाग चौराहे से शुरू किया। कांग्रेसियों को पता चला तो वे वहां पहुँच गए और काफी कहासुनी हुई। कांग्रेसियों का आरोप था कि ठीक बगल में लगे बीजेपी के बिना अनुमति वाले बैनरों को क्यों नहीं उतारा गया? काफी देर तक हो-हल्ला चला और कार्रवाई रोक दी गई।

रात को फिर ‘नगर निगम’ ने इसी प्रक्रिया को दोहराने की कोशिश की लेकिन वहां पहुँचे कांग्रेसियों ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया। यह ड्रामा 10 घंटे तक चला। इसके बाद मांझी समाज के धरने में पहुंचे ऊर्जा मंत्री को कांग्रेसियों ने घेर लिया। 

इस बीच इसी क्षेत्र से आईं महिला-बाल विकास मंत्री इमरती देवी का एक ऑडियो भी जम कर वायरल हुआ। ऑडियो में मंत्री अपने समर्थकों से यह कहती सुनी गईं कि “सत्ता में इतनी ताकत होती है कि जहाँ भी कलेक्टर को बोल देंगे, चुनाव जीत जाएंगे।”

रोड शो की कामयाबी से बीजेपी चिंतित :

उधर, 18 सितंबर को कमलनाथ के रोड शो को ‘भारतीय जनता युवा मोर्चा’ के कुछ कार्यकर्ताओं ने रोकने की कोशिश की। पुलिस ने उन्हें खदेड़ दिया। इन सब का नतीजा यह हुआ कि स्थानीय जनता रोड शो में बड़ी तादाद में शामिल हुई। 

राजनीतिक पर्यवेक्षक ‘शो’ के इस तरह से कामयाबी हासिल करने की 2 वजहें मानते हैं। पहली तो यह कि स्थानीय स्तर पर लोग, ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के ‘राजनीतिक अवसरवाद’ से नाखुश हैं। दूसरी, हालिया दिनों में बीजेपी की कई नीतियों को लेकर उनके मन में तेजी से उभरने वाला रोष है। भोपाल स्थित बीजेपी मुख्यालय में कमलनाथ की ग्वालियर यात्रा को मिली ऐसी कामयाबी पर गहरी चिंता जताई गई है। रोड शो में जिस तरह से भीड़ उमड़ी थी उसेे देेेेखकर भाजपा नेतृत्व के माथे पर चिंता की लकीरें उभरनी लाजिमी हैं।

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