पीएम मोदी का चौथा ‘मास्टर स्ट्रोक’ है कृषि कानून!
नोटबन्दी, जीएसटी, तालाबंदी, के बाद अब यह चौथा मास्टरस्ट्रोक है। नोटबन्दी, मौद्रिक सुधार था, जीएसटी कर सुधार, तालाबंदी महामारी से बचाव के लिये और यह कृषि मुक्ति किसानों को मुक्त करने के लिये लाया गया ‘सुधार’ है। मौजूदा राजनीतिक माहौल में अधिकतर मास्टर स्ट्रोक सुधार ही कहे जाते हैं। पर सुधार किसका होता है और सुधरता कौन है यह न तो सुधारक कभी बताता है और न ही किसी को पता चल पाता है। हां, अलबत्ता थाली ताली के महानाद के बीच वह अगले सुधार में लग जाता है।
● आलोक शुक्ल
…तो जैसा कि सरकार बता रही है ‘ कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 और कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 ‘ के कानून बन जाने के फायदे ही फायदे हैं। राज्यसभा में हंगामा होते हुए अशांत वातावरण के बीच जब न यह स्पष्ट हो पा रहा था कि बिल के समर्थन में कौन हुंकार भर रहा है, और विरोध में ‘ना’ कौन कर रहा है, तब राज्य सभा के उपसभापति ने यह घोषित करके कि यह बिल पास हो गया, सदन स्थगित कर के चलते बने। लोक सभा में यह बिल पहले ही पास हो चुका है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर महज औपचारिकता होते हैं जो हो ही जाएंगे। जब यह हस्ताक्षर हो जाएंगे तो यह बिल कानून की शक्ल ले लेगा।
कानून बनते ही किसानों के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आयेगा। अब खेत की मेड़ पर आमने-सामने बैठ कर इस कानून से प्राप्त अधिकार सुख की मादकता में झूमते हुए किसान, कॉरपोरेट से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की सौदेबाजी करेगा। सुनने में कितना अच्छा लगता है कि एक कानून ने कॉरपोरेट और तंगहाली के चलते खुदकशी को मजबूर किसान को एक ही पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया है। यह तो एक बहुत ही क्रांतिकारी कदम है। अच्छी बात है! अब दूर गंगा, सरयू या राप्ती के कछार का किसान, दस-बीस बोरा अनाज लेकर प्राइवेट रेल से केरल तक या और भी कहीं, जहां वो चाहे, जाकर उसे बेचने के लिये मुक्त है। जहां पोसायेगा वहीं बोरा पटकेगा, मुंहमांगा दाम गठियायेगा और फिर अपने गांव आ कर पंचायत जमाएगा। यह तो वाकई बहुत ही क्रांतिकारी कदम है। हमें आशान्वित रहना चाहिए। अब देखना ये है कि किसान की साफगोई जीतती है या कॉरपोरेट का शातिर प्रबंधकीय कौशल।
किसान और कॉरपोरेट की शिखर वार्ता के बीच अब सरकार कहीं नहीं है। उसने बाजार खोल दिये व्यापारी, कॉरपोरेट और जिसके पास एक अदद पैन कार्ड है उन्हें यह अख्तियार दे दिए कि वे कहीं भी जाकर किसी खेत से अनाज खरीद लें। दाम बेचने वाले यानी किसान और खरीदने वाले यानी व्यापारी तय करेंगे। अपना अपना सब समझिए बूझिये। सरकार को चैन से आराम करने दीजिए। अब वह भले ही अनाज के दाम तय कर दे पर वह उस पर या उससे कम अथवा अधिक कीमत पर अनाज खरीदने के लिये किसी पैनकार्ड धारक को बाध्य करने से रही।
कानून के पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ लिखा गया है और आगे भी लिखा जाता रहेगा। पर एक बात तय है कि इन कानूनों का असर भले ही अगले कुछ वर्षों में पता चल पाएगा लेकिन थोड़ा भी पढ़ा लिखा हर समझदार व्यक्ति यह समझ रहा है कि ये कानून किसानों के हित में नहीं है। फिलहाल इस बिल को लेकर कुछ सवाल हैं, जिसके जवाब सबका साथ सबका विकास का दावा करने वाली ‘लोक कल्याणकारी सरकार’ को जरुर देना चाहिए….
■ अगर न्युनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लेकर सरकार की नीयत साफ है तो वो मंडियों के बाहर होने वाली ख़रीद पर किसानों को एमएसपी की गारंटी दिलवाने से इंकार क्यों कर रही है?
■ एमएसपी से कम ख़रीद पर प्रतिबंध लगाकर किसान को कम रेट देने वाली प्राइवेट एजेंसी पर क़ानूनी कार्रवाई की मांग को सरकार खारिज क्यों कर रही है?
■ कोरोना काल के बीच जब देश जान बचाने की जद्दोजहद से गुजर रहा है और बेकारी अपने चरम पर है, और जब किसी सरकार की प्राथमिकता अपने नागरिकों का जीवन बचाना और रोजगार के अवसर बढ़ाना होना चाहिए तब इन तीन क़ानूनों को लागू करने की मांग कहां से आई? ये मांग किसने की? किसानों ने या औद्योगिक घरानों ने?
■ देश-प्रदेश का किसान जब मांग कर रहा है कि सरकार अपने वादे के मुताबिक स्वामीनाथन आयोग के सी2 फार्मूले के तहत एमएसपी दे, तब सरकार ठीक उसके उलट बिना एमएसपी प्रावधान के क़ानून लाई है। आख़िर इसकी किसने मांग की थी?
■ किसान को फसल के ऊंचे रेट देने से प्राइवेट एजेंसियों को किसने रोका है? फिलहाल मंडियों में MSP से नीचे बिक रही धान, कपास, मक्का, बाजरा और दूसरी फसलों को प्राइवेट एजेंसीज एमएसपी या उससे ज़्यादा रेट क्यों नहीं दे रहीं?
■ उस स्टेट का नाम बताइए जहां पर किसी दूसरे राज्य का किसान अपना धान, गेहूं, चावल, गन्ना, कपास, सरसों, बाजरा बेचने जाएगा और उसे अपने स्टेट से ज्यादा रेट मिल जाएगा?
■ जमाखोरी पर प्रतिबंध हटाने का फ़ायदा किसको होगा- किसान को, उपभोक्ता को या जमाखोर को?
■ सरकार नए क़ानूनों के ज़रिए बिचौलियों को हटाने का दावा कर रही है, लेकिन किसान की फसल ख़रीद करने या उससे कॉन्ट्रेक्ट करने वाली प्राइवेट एजेंसी अडानी या अंबानी को सरकार किस श्रेणी में रखती है- उत्पादक, उपभोक्ता या बिचौलिया?
■ जो व्यवस्था अब पूरे देश में लागू हो रही है, लगभग ऐसी व्यवस्था तो बिहार में 2006 से लागू है। तो बिहार के किसान इतना क्यों पिछड़ गए?
■ टैक्स के रूप में अगर मंडी की इनकम बंद हो जाएगी तो मंडियां कितने दिन तक चल पाएंगी?
■ क्या रेलवे, टेलीकॉम, बैंक, एयरलाइन, रोडवेज, बिजली महकमे की तरह घाटे में बोलकर मंडियों को भी निजी हाथों में नहीं सौंपा जाएगा?
■ अगर ओपन मार्केट किसानों के लिए फायदेमंद है तो फिर “मेरी फसल, मेरा ब्योरा” के ज़रिए क्लोज मार्केट करके दूसरे राज्यों की फसलों के लिए प्रदेश को पूरी तरह बंद करने का ड्रामा क्यों किया?
■ अगर हरियाणा सरकार ने प्रदेश में 3 नए कानून लागू कर दिए हैं तो फिर मुख्यमंत्री खट्टर किस आधार पर कह रहे हैं कि वह दूसरे राज्यों से हरियाणा में मक्का और बाजरा नहीं आने देंगे?
■ अगर सरकार सरकारी ख़रीद को बनाए रखने का दावा कर रही है तो उसने इस साल सरकारी एजेंसी FCI की ख़रीद का बजट क्यों कम दिया? वो ये आश्वासन क्यों नहीं दे रही कि भविष्य में ये बजट और कम नहीं किया जाएगा?
■ जिस तरह से सरकार सरकारी ख़रीद से हाथ खींच रही है, क्या इससे भविष्य में ग़रीबों के लिए जारी पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में भी कटौती होगी? क्या ख़रीद प्रक्रिया के निजीकरण के बाद पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम, अडानी-अंबानी के स्टोर के माध्यम से प्राइवेट डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम बनने जा रहा है?
