‘अनन्या’ प्रतिनिधि है करार तोड़ती सरकार के विरुद्ध खड़ी होती युवा पीढ़ी की

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परसों एक वाकया दरपेश आया। काशी विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई कर रही एक लड़की अनन्या अपने घर रांची जाने के लिए मुगलसराय से रांची के लिए राजधानी एक्सप्रेस से रवाना हुई। लेकिन ट्रेन डाल्टनगंज में रुक गयी, रेल ने कहा अगले स्टेशन पर आंदोलन के चलते ट्रैक बाधित है, ट्रेन नही जाएगी, यात्रियों को यहां से बस द्वारा जाना पड़ेगा। रेल ने बस दिया भी। लेकिन अनन्या ने बस से जाने पर इनकार कर दिया। रेल ने मजबूरन  अनन्या को उसी ट्रेन से रांची पहुंचाया।

इस घटना पर, लोग दो खाने खड़े हो गए। एक समर्थन में दूसरे विरोध में। इस घटना को एक ‘टेस्ट पीस’ की तरह देखा जाय इससे पता चलेगा कि हम जिस समाज मे आज पहुंच गए है, यह कितना पका है, कितना जला है? जनतंत्र बहुदलीय होता है, (बाज दफे एकदलीय जनतंत्र की भी चर्चा हो जाती है, लेकिन वह बेमानी है) हर दल के अपने उसूल होते हैं जो एक दूसरे से अलग होने का तर्क देते हैं। अब इस तंत्र के बोध को देखिये- हर दल जनता के सामने अपनी नीति, कार्यक्रम और योजना रखता है। इसे सामान्य भाषा मे घोषणापत्र कहते हैं। इस घोषणा पत्र के आधार पर ही जनता और दलविशेष के बीच करार होता है। राजनीति में करार बहुत धारदार समझौता है जिसपर हुकूमत खड़ी होती है। आइये कुछ विश्व प्रसिद्ध करार देखे –
‘तुम हमे खून दो, हम तुम्हे आजादी देंगे’ अमर सेनानी सुभाषचंद बोस का नारा ही नही था अवाम से करार था। इस करार का ही नतीजा था कि समूचा हिंदुस्तान नेताजी के पीछे चल पड़ा था।
 रोज मर्रा की जिंदगी में आप रोज करारनामे से संचालित होते हैं लेकिन उस पर गौर नही किये होंगे। आपके पास कोई नोट है। पांच, पचास, सौ कोई भी। वह कागज का टुकड़ा है पर उसपर करार है। पढ़िए,  लिखा रहता है- मैं धारक को (5, 10, 50 जो भी हो) देने का वचन देता हूँ ‘ रिजर्व बैंक के गवर्नर का दस्तखत होता है। और इसकी गारंटी केंद्रीय सरकार देती है।’ अगर कोई इस करार को तोड़ता है और आपके दिए हुए 5 रुपये की जगह 4 दे तो आप उसे मानेंगे ? नहीं न ?
इसी तरह चुनाव के समय वोट केवल वोट नही होता, वह वोट देने वाले और वोट पाने वाले के बीच का ‘करारनामा’ है। याद करिये, कोई कहता है- ‘अगर हम जीते तो भारतीय रुपये की कीमत 45 तक पहुंच जाएगी, हर  खाते में 15 लाख रुपये  जमा हो जायगा, हर साल दो करोड़ लोंगो को रोजगार मिलेगा’ वगैरह वगैरह। उनके वायदे पर आपने वोट दिया पर उन्होंने आपको कुछ नहीं दिया। अब वह करार टूट गया है। जब उनको इस करार की बात पर पूछा जाता है तो उस करार को जुमला करार कर देते हैं। अब क्या करना है ? चचों को कोई फर्क नही पड़ता एक महीने का मुफ्त राशन मिल जाएगा और चचों के चेहरे खिल जाएंगे। पर भतीजे क्या करें ? बेरोजगार, कब तक कांवर लेकर लफंगई करेगा ? कितनी माब्लिंचिंग करेगा ? कब तक उत्तेजक नारा लगाएगा ?  अब वह अपना हक मांगेगा।
इस जनतंत्र से ‘करार’ खिसकते हुए आहिस्ता आहिस्ता कब्र के मुहाने पर जा रहा है। वह दफन हो जाए उसके पहले उसे रोक लो। जिसदिन कौम यह फैसला ले लेगी  कि ‘हक’ की कीमत अनमोल है यह जम्हूरियत की जान है तभी लोकतंत्र सांस ले पायेगा।
बहाना कैसे गढ़ा जाता है हमारे पाखंडी समाज को इसमे महारत हासिल है। उदाहरण देखिये – ‘इस्तीफा दे, नया चुनाव कराओ? देश पर कितना खर्च पड़ेगा, मालूम है? ‘सरकार कोई भी आये, सब का जेब तो नही भर देगी।अब इस ‘टेस्ट पीस’ से समाज को नापिये (अनन्या ) -‘एक लड़की की जिद से लाखों का नुकसान हुआ’। लेकिन जम्हूरीयत निराश नही है। युवा तैयार है। 5 सितंबर की साँझ इतिहास की एक घटना बनने जा रही है।
(लेखक बीएचयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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