…राष्ट्रपिता

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आलोक शुक्ल

हिन्दुस्तान कोनों का मुल्क है। एक कोना सनातन का है तो एक बौद्धों का। जैन, सिक्ख, ईसाई, इस्लाम भी एक एक कोने हैं। भिन्न-भिन्न मत-मतांतर और विचारधाराएं भी अलग अलग कोने ही हैं। ये सभी मिलकर ही मुल्क की मुकम्मल तस्वीर गढ़ते हैं। कई एक बार ऐसा होता है कि अहमन्यता में डूबा हुआ कोई एक कोना स्वयं को ही पूरी तस्वीर समझने की भूल कर बैठता है। वह भूल जाता है कि उसका स्वतंत्र अस्तित्व कुछ भी नहीं, उसका अस्तित्व तो सिर्फ इसलिए है कि हिन्दुस्तान सदियों पहले से बहुलतावादी संस्कृति को अंगीकार कर बहुत आगे निकल चुका है।
रह रहकर कभी किसी कोने से सवाल उछलता है कि जब भारत गांधी जी के पैदा होने के सदियों पहले से एक देश रहा है, उसे किसी बापू ने जन्म नहीं दिया तो गांधी जी को हम राष्ट्रपिता क्यों कहें? इस सवाल का जवाब समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि गांधी जी को किसने राष्ट्रपिता या बापू का दर्जा दिया? क्या गांधी जी ने अपने लिए यह दर्जा मांगा था?
दरअसल, एक संगठन से जुड़े लोगों द्वारा कथित तौर पर गांधी विरोधी के रूप में प्रचारित किये जाने वाले सुभाषचंद्र बोस ने गांधी जी को पहली बार राष्ट्रपिता कहा था। यह वर्ष 1944 की बात है। तब जर्मनी में बैठे सुभाषचंद्र बोस को लगा कि महात्मा गांधी (महात्मा का दर्जा उन्हें रवींद्रनाथ टैगोर ने दिया था) को राष्ट्रपिता कहा जाना चाहिए। क्योंकि, बोस यह देख पा रहे थे कि पुराने राग-द्वेषों, पुरानी चौहद्दियों, पुरानी रियासतों और पुराने रजवाड़ों को पीछे छोडक़र, परंपरा की बहुत सारी जकडऩों को झटक कर, आज़ादी की लड़ाई की कोख से जो एक नया भारत निकल रहा है उसे दरअसल महात्मा गांधी आकार दे रहे थे। और यह काम वे अकेले नहीं कर रहे थे, इसमें वे पूरे राष्ट्र की सर्वानुमति को साथ लेकर चल रहे थे।
6 जुलाई 1944 को सिंगापुर रेडियो से प्रसारित एक संदेश में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने महात्मा गांधी को संबोधित अपने सम्बोधन में कहा, ‘मैं जानता हूं कि ब्रिटिश सरकार भारत की स्वाधीनता की मांग कभी स्वीकार नहीं करेगी। मैं इस बात का कायल हो चुका हूं कि यदि हमें आज़ादी चाहिये तो हमें खून के दरिया से गुजरने को तैयार रहना चाहिये। अगर मुझे उम्मीद होती कि आज़ादी पाने का एक और सुनहरा मौका अपनी जिन्दगी में हमें मिलेगा तो मैं शायद घर छोड़ता ही नहीं। मैंने जो कुछ किया है अपने देश के लिये किया है। विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने और भारत की स्वाधीनता के लक्ष्य के निकट पहुंचने के लिये किया है। भारत की स्वाधीनता की आखिरी लड़ाई शुरू हो चुकी है। आजाद हिन्द फौज के सैनिक भारत की भूमि पर सफलतापूर्वक लड़ रहे हैं। हे राष्ट्रपिता, भारत की स्वाधीनता के इस पावन युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और शुभकामनाएं चाहते हैं।’ गांधीजी के प्रति नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आस्था देखिए कि उन्होंने आजाद हिंद फौज में जो अलग अलग कई बिग्रेड बनाए, उनमें से एक महात्मा गांधी के नाम पर ‘महात्मा गांधी बिग्रेड’ था।
गांधी की हत्या भी यह याद दिलाने वाली मार्मिक घटना थी कि नए बनते देश ने अपना पिता खो दिया है। 30 जनवरी 1948 की रात जितने घरों में चूल्हा नहीं जला, जितने घरों में आंसू नहीं सूखे, उनको गिन लीजिए तो आप पाएंगे कि ऐसा शोक, ऐसा रूदन सिर्फ पिता की मृत्यु पर संभव है। पिता वही नहीं होते जो हमें जन्म देने का माध्यम बनते हैं, वे भी होते हैं जिन्हें हम पिता मान लेते हैं। जो रिश्तों और मुल्कों को बिल्कुल जड़ व्याख्या और मूर्ति तक सीमित रखते हैं, उनको ही यह बात समझ में नहीं आती कि कोई व्यक्ति किसी मुल्क का पिता कैसे हो सकता है। वे यह नहीं समझ पाते कि मुल्क जितना भूगोल में होते हैं, उतना हमारी चेतना में भी बनते रहते हैं। यही व्यक्तियों का भी सच है। व्यक्तियों की पहचान भी कई बार हमारी चेतना में इतनी बड़ी हो जाती है कि वे एक बड़े मूल्य का, कभी-कभी पूरे मुल्क का प्रतीक बन जाते हैं। भारत और गांधी एकाकार हो चुके हैं। भारत से प्रेम और गांधी से नफरत की बात, दोनों एक साथ नहीं हो सकती। इसलिए यदि किसी को गांधी से प्रेम नहीं है तो यह उसका पूरा सच नहीं है। पूरा सच यह है कि उसे इस भारत से भी प्रेम नहीं है। इस देश की सांस्कृतिक बहुलता उसे परेशान करती रही है। झंडे का तीन रंग उसे चुभा करता है।
एक बात और, गांधी पूजा की बजाए तर्क के विषय हैं। उनसे, उनके विचारों से सवाल करना चाहिए, तर्क होना चाहिए। गांधी को राष्ट्रपिता कहने वाले सुभाष चंद्र बोस उनसे बहुत दूर तक असहमत रहे। गांधी को महात्मा कहने वाले टैगोर असहयोग आंदोलन को संदेह से देखते रहे और गांधी को गुरु मानने वाले जवाहरलाल नेहरू ने उनके ‘हिंद स्वराज’ से अपनी गहरी असहमति जताई। लेकिन बाद के दौर में गांधी पर सवाल करने का, गांधी से सवाल करने का चलन ख़त्म होता गया। जो संगठन गांधी से डरता था, उसने भी जान लिया कि गांधी की पूजा करने से उसके पाप छुपे रहेंगे। सच तो यह है कि यह देश गांधी की संतानों का है, उनके मानस पुत्रों का है। इसे कुछ संगठन, कुछ कुविचार नहीं बदल सकते।

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