कौन है असली गुनाहगार?
बीआरडी मेडिकल कालेज आक्सीजन कांड
- मनोज सिंह
गोरखपुर मेडिकल कालेज में दो साल पहले घटा आक्सीजन कांड जांच दर जांच उलझता जा रहा है। जितनी जांच, उतने नतीजे। गोया यह कोई घटना नहीं, कोई जांच नहीं, कोई जिम्मेवार नहीं, बल्कि चूं-चूं का मुरब्बा हो। घटना के पच्चीस महीने बाद विभागीय जांच की रिपोर्ट आने के बाद सरकार द्वारा एक और जांच बैठा दिए जाने से पुराने सवाल फिर से जिंदा हो गए हैं।
वर्ष 2017 में 11-12 अगस्त को आक्सीजन की कमी से हुई 52 मरीजों की मौतों के लिए जिला प्रशासन ने फौरी जांच में मेडिकल कालेज के प्राचार्य, डाक्टर और आक्सीजन के सप्लायर को दोषी ठहराया। फिर, इसके लिए जब तत्कालीन कलेक्टर से लगायत स्वास्थ्य महकमें के आला अधिकारियों और मुख्यमंत्री कार्यालय तक की भूमिका पर सवाल खड़े होने लगे तो आक्सीजन की कमी से मौत होने से ही इंकार किया जाने लगा। पुलिस ने भी अपनी जांच में मौतों के लिए आक्सीजन की कमी को कोई वजह नहीं माना। अलबत्ता, जिस चिकित्सक ने मासूमों की जान बचाने को अपनी जान लड़ा दी थी उसे ही मुख्य आरोपी बनाकर जेल भेज दिया। अब दो साल बाद आई विभागीय जांच की रिपोर्ट में प्रशासन द्वारा मुख्य आरोपी बनाये गये डाक्टर कफील खान निर्दोष बताए गए हैं। मामला एक बार फिर सुर्खियों में है।
साल 2017 में मेडिकल कालेज में आक्सीजन की कमी से जब मौतें हुईं तो प्रशासन ने तेजी दिखाते हुए मेडिकल कालेज के तत्कालीन प्राचार्य डाक्टर राजीव मिश्र, एनेस्थेसिया विभाग के डॉ. सतीश कुमार, बालरोग विभाग के प्रवक्ता डाक्टर कफील, फार्मासिस्ट गजानंद जायसवाल, कनिष्ठ लिपिक संजीव त्रिपाठी, सहायक लिपिक सुधीर कुमार पांडेय, कनिष्ठ सहायक लेखा अनुभाग उदय प्रताप शर्मा, ऑक्सीजन आपूर्तिकर्ता पुष्पा सेल्स के निदेशक मनीष भंडारी और मेडिकल कालेज स्थित होम्योपैथिक रिसर्च सेंटर में तैनात डॉ. पूर्णिमा शुक्ला को इसके लिए जिम्मेदार ठहरातेे हुए एफआईआर दर्ज करा दिया। बाद में पुलिस ने भी अपनी जांच में प्रशासन की बात पर ही मोहर लगाते हुए कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी। हां, पुलिस अपनी जांच में मौतों के लिए आक्सीजन की कमी वाली वजह को पचा गई और पूरी घटना के लिए डाक्टर कफील को मुख्य आरोपी बना दिया गया।
इसी बीच शासन ने स्टाम्प एवं निबंधन, भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग के प्रमुख सचिव हिमांशु कुमार के नेतृत्व में विभागीय जांच कमेटी बना कर डाक्टर कफील, डॉ. राजीव मिश्र और डॉ. सतीश कुमार की घटना में भूमिका की जांच बैठा दी। शासन ने कमेटी से डाक्टर कफील की चार बिन्दुओं पर जांच करायी जिनमें से में दो उनकी प्राइवेट प्रैक्टिस से संबंधित थे जबकि दो ऑक्सीजन कांड से जुड़े हुए। सबसे गंभीर आरोप था, बीआरडी मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग में 100 बेड एईएस वार्ड के नोडल प्रभारी रहते हुए उन्होंने जीवन रक्षक ऑक्सीजन की कमी जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम से उच्चाधिकारियों को तत्काल अवगत नहीं कराया और कर्तव्य पालन में लापरवाही की। महीनों चली जांच के बाद जांच कमेटी ने माना कि डाक्टर कफील ने बाहर से आक्सीजन मंगाकर तमाम मासूमों की जान बचायी। हिमांशु कुमार की इस जांच रिपोर्ट ने पुलिस द्वारा कोर्ट में पेश चार्जशीट को तो सिरे से खारिज किया ही है, उन पुराने सवालों को एक बार फिर से खड़ा कर दिया है जिसे घटना वाले दिन से ही स्थानीय प्रशासन से लेकर प्रदेश सरकार तक नजरन्दाज करती रही है। हिमांशु कुमार की रिपोर्ट से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि मौतें आक्सीजन की कमी से ही हुई थी। ये रिपोर्ट एक सवाल भी खड़ा करती है कि सरकार और प्रशासन मे से कौन किसे बचा रहा है?
क्या है आक्सीजन कांड
गोरखपुर मेडिकल कालेज में अगस्त 2017 तक इलाहाबाद की मेसर्स पुष्पा सेल्स लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई करती थी। पुष्पा सेल्स का मेडिकल कालेज पर आक्सीजन का लाखों रूपया बकाया हो गया था। बकाया भुगतान के लिए एजेंसी ने प्राचार्य को कई पत्र लिखे। उसने इसकी जानकारी डीएम, स्वास्थ्य महकमें के आला अधिकारियों और मुख्यमंत्री को भी दी लेकिन किसी भी स्तर पर कोई कदम नहीं उठाया गया। जिसके भुगतान की फाइल सालों तक मेडिकल कालेज के प्रिन्सिपल से लगायत गोरखपुर के तत्कालीन डीएम, चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक, प्रिसिंपल सेके्रटरी हेल्थ, प्रिंसिपल सेके्रटरी मेडिकल एजुकेशन की टेबल तक घूमती रही पर भुगतान नहीं हुआ जिससे एजेन्सी ने आपूर्ति रोक दी, जिसकी वजह से 11 और 12 अगस्त 2017 को मेडिकल कालेज में 34 बच्चों और 18 वयस्क मरीजों की मौत हो गई थी।
राज्य सरकार का पक्ष
२7 सितंबर को शासन से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि डॉ. कफील को विभागीय जांच में क्लीनचिट दिए जाने संबंधी समाचार भ्रामक है। उनके ऊपर लगाए कुल चार आरोपों में से दो आरोप उनके विरूद्ध सिद्ध पाए गए हैं, जिस पर निर्णय लिए जाने की कार्यवाही विचाराधीन है। विज्ञप्ति में संक्षिप्त जांच रिपोर्ट भी दी गई है जिसमें ऑक्सीजन कांड से जुड़े दो आरोप जांच में सिद्ध नहीं पाए जाने का उल्लेख है।
डॉ. कफील पर सिद्ध पाए गए दोनों आरोप निलंबन अवधि के दौरान 22 सितंबर 2018 को डॉ. कफील के बहराइच जिला अस्पताल में जाने और सम्बद्धता स्थल कार्यालय महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण पर योगदान न देकर सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी राजनीतिक टिप्पणियां करने का आरोप है।
लेखक गोरखपुर न्यूज लाइन वेबसाइट के चीफ एडिटर हैं।

घटना के लिए शासन और सरकार में बैठे लोग सीधे सीधे दोषी हैं। उन्हें बचाने के लिए जिन लोगों ने मरीजों की जान बचाने में रात दिन एक कर दिया उन्हें ही फंसा दिया गया। जांच में साफ हो गया है कि मैं 100 बेड एईएस वार्ड का नोडल अधिकारी कभी रहा ही नहीं। यह कार्यभार बालरोग विभाग के सह आचार्य डॉ भूपेंद्र शर्मा के पास था। मेडिकल कॉलेज में लिक्विड ऑक्सीजन के रखरखाव, टेंडर, भुगतान, ऑर्डर, सप्लाई और प्रबंधन में भी मेरी कोई भूमिका नहीं रही। 10 अगस्त 2017 को अवकाश पर होने के बावजूद रात में एक व्हाट्सएप संदेश से लिक्विड ऑक्सीजन की कमी होने की जानकारी मिली तो तुरंत प्राचार्य, कार्यवाहक प्राचार्य, बाल रोग विभागाध्यक्ष सहित अपने विभागीय सहयोगियों से संपर्क किया और रात में ही मेडिकल कॉलेज पहुंचकर अपने स्तर पर वार्ड का प्रबंधन और जम्बो ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था की। लिक्विड ऑक्सीजन की आपूर्ति अचानक रुकने से उत्पन्न हुई विकट स्थिति से निपटने के लिए 11 और 12 अगस्त 2017 को दो दिन के भीतर अलग-अलग कंपनियों से 500 जम्बो ऑक्सीजन सिलेंडर मंगाया। 11 अगस्त को मयूर गैस प्राइवेट लिमिटेड से सात सिलेंडर खुद के पैसे से खरीदा। 10 अगस्त की रात से 12 अगस्त 2017 के बीच बाल रोग विभागाध्यक्ष, प्राचार्य, कार्यवाहक प्राचार्य, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, स्थानीय प्रशासन, जिला मजिस्ट्रेट, सीएमओ, एडी हेल्थ, डीआईजी एसएसबी, सेंट्रल पाइप लाइन ऑपरेटर के संपर्क में लगातार रहते हुए मैंने 26 लोगों को फोन किया। मासूमों की जान बचाने के लिए अपनी जान लड़ा दी और मुझे ही मुख्य आरोपी बना दिया गया।
