निजीकरण की राह भारत पेट्रोलियम!
- आलोक शुक्ल
सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण की राह पर सरकार ने एक कदम और बढ़ा दिया है। निजीकरण की इस राह का अगला पड़ाव है सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम विपणन कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल), जहां मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) बैठी इन्तजार कर रही है। सरकार, बीपीसीएल के राष्ट्रीकरण संबंधी कानून को तीन साल पहले 2016 में ही रद्द करके इसके प्रस्तावित पूर्ण निजीकरण का रास्ता साफ कर चुकी है। बीपीसीएल के राष्ट्रीकरण संबंधी कानून रद्द होने से बीपीसीएल को निजी या विदेशी कंपनियों को बेचने के लिए सरकार को संसद की अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी।
वर्षों से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के दबदबा वाले घरेलू ईंधन खुदरा कारोबार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के बहाने सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाना चाहती है। इसी के मद्देनजर सरकार बीपीसीएल में अपनी समूची 53.3 प्रतिशत हिस्सेदारी रणनीतिक भागीदार को बेचने की तैयारी कर रही है। बीपीसीएल के निजीकरण से घरेलू ईंधन खुदरा बिक्री कारोबार में काफी उथल-पुथल आ सकती है।
बीपीसीएल के निजीकरण के लिए संसद की मंजूरी न लेनी पड़े इसके लिए केंद्र सरकार ने पहले ही पुख्ता इंतजाम कर लिया है। निरसन एवं संशोधन कानून, 2016 के तहत, बेकार और पुराने कानून बता कर जिन 187 कानूनों को समाप्त किया गया है, उनमें वह कानून भी शामिल है, जिसके जरिए पूर्ववर्ती बुरमाह शेल का राष्ट्रीयकरण किया गया था।
माना जा रहा है कि सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया है ताकि निजीकरण का मामला संसद में न ले जाना पड़े। संसद में जाने पर विपक्ष इसे मुद्दा बना सकता है जिससे माहौल सरकार के खिलाफ जाएगा। जापानी स्टॉकब्रोकर नोमुरा रिसर्च के अनुसार, मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) बीपीसीएल में सरकार की 53.3 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए बोली लगा सकते हैं। निवेशकों को भेजे गए नोट में नोमुरा ने कहा कि उन्हें लगता है कि सरकार का यह कदम केवल औपचारिकता पूरी करने की कवायद भर है। नोमुरा ने कहा कि रिलायंस रिफाइनिंग या केमिकल में भले ही अपनी हिस्से कम करना चाहती हो लेकिन वह बीपीसीएल में अपनी हिस्सेदारी खरीदने के लिए बोली लगा सकती है।
नोमुरा के नोट के अनुसार, बीपीसीएल की हिस्सेदारी खरीदने के बाद रिलायंस को 25 फीसदी बाजार हिस्सेदारी हासिल हो जाएगी। इसमें 3.4 करोड़ टन की अतिरिक्त रिफाइनिंग क्षमता के साथ उसे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी पर अधिकार भी मिल जाएगा। इसके साथ ही कंपनी के करीब 15 हजार पेट्रोल पंपों के साथ ही रिलायंस को अपना कारोबार बढ़ाने में काफी मदद मिलेगी।
सरकार क्यों करना चाहती है निजीकरण
बीपीसीएल के निजीकरण से सरकार को 1.05 लाख करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य में से कम से कम एक-तिहाई प्राप्त करने में मदद मिलेगी। चार अक्टूबर को बाजार बंद होने के समय बीपीसीएल का बाजार पूंजीकरण 1.11 लाख करोड़ रुपये था। बीपीसीएल में हिस्सेदारी बेचकर सरकार को 60,000 करोड़ रुपये तक प्राप्त हो सकते हैं। इसमें नियंत्रण तथा ईंधन बाजार प्रवेश प्रीमियम भी शामिल है।
पहले भी हो चुकी है कवायद
सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों के विनिवेश की कवायद इसके पहले भी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में शुरू की गयी थी, तब सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर, 2003 में व्यवस्था दी थी कि बीपीसीएल और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) का निजीकरण संसद द्वारा कानून के संशोधन के जरिये ही किया जा सकता है। संसद में पूर्व में कानून पारित कर इन दोनों कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया गया था।
