बीआरडी आक्सीजन कांड : दो वर्ष बाद भी नहीं मिले सवालों के जवाब

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दो साल पहले गोरखपुर मेडिकल कालेज में हुए आक्सीजन कांड की याद आज भी लोगों के जेहन में सिहरन पैदा कर देती है। तब 52 जिंदगियां लीलकर पूरे देश को हिला देने वाली इस घटना से जुड़े सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।

  • मनोज कुमार सिंह

दो साल पहले गोरखपुर मेडिकल कालेज में हुए आक्सीजन कांड की याद आज भी लोगों के जेहन में सिहरन पैदा कर देती है। तब 52 जिंदगियां लीलकर पूरे देश को हिला देने वाली इस घटना से जुड़े सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।
घटना साल 2017 की है। उस वर्ष 10 और 11 अगस्त 2017 को गोरखपुर मेडिकल कालेज के नेहरु चिकित्सालय में लिक्विड आक्सीजन खत्म होने से महज 8 घंटे में ही 34 बच्चों और 18 वयस्कों की मौत हो गई थी। तब इस मामले को लेकर देशभर में खूब हो हल्ला मचा था। घटना के बाद जिला प्रशासन ने चिकित्सा में लगे डाक्टरों को ही आरोपित कर लीपा-पोती शुरू कर दी तो लोगों ने वहां आये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने सवाल उठाया कि आक्सीजन की सप्लाई रुकने के पीछे शासन-प्रशासन में बैठे ‘बड़ों’ का हाथ है तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही, तब मुख्यमंत्री ने जांच कराकर असल दोषियों पर कार्रवाई की बात कही थी। लेकिन जांच जैसे जैसे आगे बढ़ी उसकी दिशा बदलती गयी। ये दिशा ऐसी बदली की असल दोषियों से दूर, बहुत दूर होती चली गई।
शुरुआती जांच में मेडिकल कालेज प्रशासन द्वारा आक्सीजन सप्लायर एजेंसी पुष्पा सेल्स का बकाया भुगतान न किये जाने से पुष्पा सेल्स एजेन्सी द्वारा आक्सीजन की आपूर्ति रोक दिया जाना सामने आया था। तब सवाल उठा था कि आक्सीजन सप्लायर को समय से उसके बकाया का भुगतान क्यों नहीं हुआ जिसके कारण उसने आक्सीजन की आपूर्ति रोकी। बकाया भुगतान की फाइल वर्षों तक जिला प्रशासन से लगायत शासन तक घूमती रही। इसमें प्रिन्सिपल के साथ ही गोरखपुर के तत्कालीन डीएम, चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक, प्रिसिंपल सेक्रेटरी हेल्थ, प्रिंसिपल सेक्रेटरी मेडिकल एजुकेशन की भूमिका भी जांच के दायरे में होनी चाहिए थी। जिन्होंने समय रहते बीआरडी मेडिकल कालेज को बजट रिलीज नहीं किया। लेकिन सभी प्रशासकीय, तकनीकी और पुलिस जांच इस बारे में बेहद रहस्यमय तरीके से चुप हैं। कोई जांच इसके असल जिम्मेदारों की खोज की कोशिश नही करती है तो ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वाकई ‘असली दोषियों’ को बचाने के लिए प्रदेश सरकार ने छोटी मछलियों को फंसा दिया और सच हमेशा के लिए दफन कर दिया गया।
अभियुक्तों के खिलाफ कोर्ट में दायर चार्जशीट और खोजबीन के दौरान मिले कुछ अन्य कागजातों को देखकर लगता है कि विवेचनाधिकारी ने घटना के कारणों और जिम्मेदारों को सामने लाने की बजाय प्रशासकीय जांच में आरोपी बनाए गए मेडिकल कालेज के तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. राजीव मिश्रा, बाल रोग विभाग के निलम्बित असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कफील खान, एनस्थीसिया विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सतीश कुमार, फार्मासिस्ट गजानंद जायसवाल, डॉ. पूूर्णिमा शुक्ल, सुधीर कुमार पांडेय, संजय कुमार त्रिपाठी, उदय प्रताप शर्मा और आक्सीजन सप्लायर मनीष भंडारी को ही अपराधी साबित करने में पूरा समय व श्रम खर्च किया है। चार्जशीट अंतविर्रोधों का पुलिंदा है और वह अपनी ही कही बातों से कई बार पलटते नजर आई है। गवाहों के बयान एक जैसे हैं, जैसे लगता है कि सबने एक लिखित स्क्रिप्ट के तहत अपने बयान दिए हों। आरोपों को साबित करने के लिए सुबूत न के बराबर हैं और गवाहों द्वारा ‘देखी और सुनी गई’ बातों से आरोप को साबित करने की कोशिश की गई है।
मामूली सी घटनाओं की जांच में वर्षों लगा देने वाली यूपी पुलिस की इस मामले में तेजी देखने लायक है। एफआईआर होने के तीन महीने के भीतर 93 लोगों की गवाही और तमाम फाइलों की जांच पड़ताल पूरी कर जो चार्जशीट तैयार हुई वह भी कम हैरान करने वाली नहीं है। चार्जशीट कहती है कि 10-11 अगस्त को बीआरडी मेडिकल कालेज में मरे बच्चों के कई अभिभावकों ने विवेचना अधिकारी से बच्चों की मृत्यु आक्सीजन की कमी से नही होना कहा है।
परिजनों से जांच अधिकारी सवाल करते हैं, क्या आपके बच्चे की मृत्यु आक्सीजन खत्म होने से हुई थी? सभी का एक ही तरह का जवाब है, ‘नहीं साहब। हमारे बच्चे की मौत आक्सीजन की कमी से नहीं हुई। जब आक्सीजन की कमी हुई तो सिलेण्डर लगा दिया गया, अम्बू बैग दिया गया। बच्चे की मौत गंभीर बीमारी से हुई।’ जबकि आक्सीजन हादसे में अपने बच्चों को खोने वाले अभिभावकों मैनेजर राजभर, विपिन सिंह, ब्रम्हदेव यादव, धर्मेन्द्र गुप्ता, मो. जाहिद ने साफ कहा है कि उन्होंने जांच अधिकारी से कभी नहीं कहा कि उनके बच्चों की मौत आक्सीजन की कमी के कारण नहीं हुई।
अब प्रशासन और पुलिस भले ही कहते फिरें कि जांच पूरी हो गयी है और अदालत में है। अदालत भी भले ही आरोप तय करे, मुकदमा चलाए, लम्बी और जोरदार बहसें सुन, अपना फैसला सुनाये, किसी को सजा दे या जान बख्शे, पर लोगों के जेहन में एक सवाल अभी भी गूंज रहा है कि मुख्यमंत्री जी, घटना के लिए वाकई यही लोग जिम्मेदार हैं या असली दोषी बच गए जिन तक जांच की आंच भी न पहुंच सकी है।

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