सियासी खेती का औजार बना पूर्वी उत्तर प्रदेश
पूर्वांचल मे यदि कुछ है तो वह है गरीबी, बेकारी और भुखमरी। समय से खाद-बीज की आस मे टकटकी लगाए किसान हैं, तो मिल-कारखानों के गेट पर लगे तालों को धंसी आंखों से निहारता मजदूर है। स्कूल जाने की बजाय गांव की तंग गलियों मे उछलता-कूदता नंग धड़ंग भविष्य है। पूर्वांचल के खून पसीने की यह कथा अनन्त है।
- आलोक शुक्ल
पूर्वी उत्तर प्रदेश की पहचान पिछड़े और उपेक्षित इलाके के रूप मे है। आजादी के बहत्तर बसंत देखने के बाद भी पूर्वांचल का यह इलाका विकास की दौड़ मे देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले हांफता लंगड़ाता नजर आता है। पिछड़ापन, उपेक्षा, बेकारी, भुखमरी और बर्बादी का दंश झेलने को अभिशप्त यह वही पूर्वांचल है, जिसके खून पसीने से दुनिया के तमाम देशों और हिन्दुस्तान के भी कई महानगरों का निर्माण, विकास हुआ है।
देवरिया के प्रतापपुर मे 1903 मे एशिया की पहली चीनी मिल लगने के साथ ही इस इलाके का औद्योगीकरण आरम्भ हुआ था। बाद में यहां 31 चीनी मिलें लगीं। गोरखपुर मे खाद कारखाना था। विश्वप्रसिद्ध कालीन उद्योग, हथकरघा उद्योग समेत छोटे बड़े कई उद्योग थे। अब इनमें से 21 चीनी मिलें बन्द हैं। गोरखपुर का खाद कारखाना 1991 से बन्द है, हालांकि इसे चलाने की घोषणा कर प्रधानमंत्री शिलान्यास भी कर चुके हैं। फिर भी, मगहर का सूतमिल, बस्ती का प्लास्टिक काम्पलेक्स, खलीलाबाद का यूपी एग्रो, महराजगंज की दो और कुशीनगर व देवरिया जिले की चार-चार चीनी मिलें बन्द है। फैजाबाद का बिजली उत्पादन केन्द्र, गोंडा की नवाबगंज चीनी मिल और आईटीआई लिमिटेड भी बन्द है। कई और छोटी बड़ी इकाईयां खस्ता हालत मे घिसट रही हैं। पूर्वांचल को विकास की पटरी पर लाने के लिए 1953 मे बने केएम पणिक्कर आयोग की रिपोर्ट, 1962 मे बनी पटेल आयोग की सिफारिशें, सेन कमेटी की रिपोर्ट, जलकुंडी और करनाली परियोजना सब की सब बन्द फाइलों मे दीमक की खुराक बनकर सम्भवत: खत्म हो गई हैं।
बलिया के मंगल पांडेय जब स्वाधीनता संग्राम के नींव की पहली ईंट बने, तबसे 1947 के 15 अगस्त की मध्य रात्रि तक गंगा, सरयू और राप्ती नदियों मे पूर्वांचली रक्त का प्रवाह अविरल अनवरत बना रहा। वीर कुंवर सिंह का आजमगढ़ से लगायत बलिया तक का मुक्ति संघर्ष हो या 1922 में गोरखपुर का चौरीचौरा कांड अथवा चित्तू पांडेय द्वारा बलिया को आजाद कराने से लेकर गोरखपुर में सतासी राज के राजा उदित नारायण सिंह, बंधु सिंह और शाह इनायत अली की कुर्बानी, सभी ने पुरबिया खून की ताकत का अहसास कराया। आजादी के बाद भी पूर्वांचल की उर्वरा भूमि ने कई जमीनी नेता पैदा किए। पं. जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, वीपी सिंह, चन्द्रशेखर के रुप में पांच प्रधानमंत्री और सम्पूर्णानन्द, त्रिभुवन नारायण सिंह, पं. कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, राम नरेश यादव, विश्वनाथ प्रताप सिंह, वीर बहादुर सिंह, राजनाथ सिंह और अब महन्त योगी आदित्यनाथ के रूप मे नौ मुख्यमंत्री इसी पूर्वांचल ने दिए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की जड़ें भी इसी मिट्टी मे दबी हैं। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चुनाव क्षेत्र पूर्वांचल का वाराणसी ही है और मुख्यमंत्री महन्त योगी आदित्यनाथ भी गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से लगातार पांच बार सांसद रह चुके हैं। बावजूद इसके यहां अपेक्षित उद्योग धंधे नही लगे। दशकों पहले जो लगे भी, वे बाद मे एक एक कर बन्द होते चले गए। कुछ नेताओं ने अलग-अलग समय पर यहां विकास की कुछ रेखाएं खींची जरुर, हालांकि तब समय विशेष में ऐसा लगता रहा कि यह इलाका भी खुशहाली व समृद्धता की राह पकड़ेगा, लेकिन बात कभी आगे बढ़ती नही दिखी। पूर्व मुख्यमंत्री बीर बहादुर सिंह को लोग तीन दशक बाद भी आज तक नही भूले हैं तो उसके मूल मे उनकी विकासवादी सोच और उस दिशा मे किए गए कार्य ही हैं। अब, प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री दोनों ही इसी इलाके और एक ही दल के हैं तब यहां के लोगों मे इस क्षेत्र के विकास की उम्मीद पैदा होनी ही है। और यह उम्मीद क्यों न जगे।
पूर्वांचल में यदि कुछ है तो वह है गरीबी, बेकारी और भुखमरी। समय से खाद-बीज की आस मे टकटकी लगाए किसान हैं, तो मिल-कारखानों के गेट पर लगे तालों को धंसी आंखों से निहारता मजदूर है। स्कूल जाने की बजाय गांव की तंग गलियों मे उछलता-कूदता नंग धड़ंग भविष्य है। पूर्वांचल के खून पसीने की यह कथा अनन्त है। यहां कमाई का जरिया बन्द है। लोगों के सामने खाड़ी देशों, थाइलैंड और अपने घरों से दूर महानगरों मे मेहनत मजदूरी कर पेट पालने की मजबूरी है। यह सब इसलिए है कि यहां उद्योग धंधों का अभाव है। 30-40 बरसों मे यहां कोई बड़ा कल कारख़ाना नहीं लगा। बन्द उद्योगों को चलाने और नया स्थापित कराने के लिए कोई आन्दोलन खड़ा होता भी नही दिखा। इन सबके लिए कोई एक दल या नेता नहीं, बल्कि सभी दल व नेता समान रूप से जिम्मेदार हैं। अब यहां की धरती पर नेता नहीं, बल्कि भेड़ों का झुंड जैसा कुछ दिखता है, जिसे दिल्ली, लखनऊ में बैठे लोग हांकते हैंं। यहां पर युवा भी बड़े सियासतदानों द्वारा की जा रही जाति, धर्म, सम्प्रदाय और बहुत हद तक आपराधिक हो चली सियासी खेती का औजार बना हुआ है।
पचासी हजार वर्ग किलोमीटर के दायरे मे फैले पूर्वांचल से आने वाले 27 सांसद और 147 विधायकों को यह समझना होगा कि पूर्वांचल की तकदीर बदलने के लिए यहां के बन्द पड़े सभी मिल-कारखानों को पुरानी तकनीकी की जगह नई तकनीक से समुन्नत कर उन्हें चलाना होगा। बड़े पैमाने पर उद्योगों का जाल बिछाना होगा और पर्यटन की अपार सम्भावनाओं के द्वार खोलने होंगे। चार दशक से फाइलों की हमसफर बनी सरयू नहर परियोजना को पूरा कर खेतों मे पानी उतारना होगा और जलकुंडी व करनाली परियोजनाओं को अमलीजामा पहना कर इस इलाके को बाढ़ की विभिषिका से उबारने का निश्चिंतता भरा माहौल देना होगा। यह सब करके ही यहां समृद्धि की एक नई इबारत लिखी जा सकती है।
