प्रियंका गांधी : राजनीति का एक नया ‘अध्याय’
प्रियंका की हाजिरजवाबी, जनसम्वेदना, मुश्किल से मुश्किल हालातों में जूझने की प्रवृत्ति, सौम्यताए धैर्य और लोकप्रियता उन्हें दादी इन्दिरा और पिता राजीव के करीब ले जाती है।
- विश्वविजय सिंह
तीस साल से यूपी की सत्ता से बाहर और बदलाव के एकदम मुहाने पर खड़ी कांग्रेस पार्टी यूपी में प्रियंका गांधी को आगे कर सियासत की बाजी अपने पक्ष में करने की ओर सधे कदमों से बढ़ रही है। यूपी की राजनीति में प्रियंका गांधी की सक्रियता से एक बात साफ है कि पार्टी और उसके नेतृत्व ने समझ लिया है कि उत्तर प्रदेश में अपनी जड़ों को कायदे से जमाये बिना देश की सियासत में पैर टिकाये रखने में मुश्किलात बढ़ती ही जाएगी। इस मुश्किल समय में प्रियंका गांधी की सक्रियता पार्टी के लिए शुभ है।
यह सच है कि गुटबाजी की वजह से सूबे में पस्त पड़ी पार्टी को फिर से खड़ा करना मुश्किल भरा काम है। जितने नेता, उतने गुट। पिछले कुछ सालों में अधिकांश राज्य प्रभारियों और प्रदेशाध्यक्षों ने अव्वल तो इस गलाकाट प्रतिद्वंदिता को खत्म करने का कोई उपाय किया ही नहीं, और दूसरे, यदि किसी ने इसके निदान की कभी कोई कोशिश की भी, तो सफल न हो सका। ब्लाक कमेेटी से लगायत प्रदेश कांग्रेस तक फैली पसरी गुटबाजी का नतीजा ही है कि बीते वर्षों में पार्टी कायदे का कोई भी जनांदोलन नहीं खड़ा कर सकी।
पार्टी अध्यक्ष रहते हुए राहुल गांधी ने इस बात को पूरी शिद्दत से महसूस किया कि गुटबाजी खत्म किये बिना हताश, निराश होकर घर बैठ गये कार्यकर्ताओं को उनकी देहरी से बाहर निकालना मुश्किल काम है और यह सब किये बिना पार्टी एक कदम भी नहीं चल सकती। इसके लिये यूपी में एक ऐसे नेता की जरूरत थी जो संगठन में वर्षों से जमी जड़ता को तोड़ सके। काबिल कार्यकर्ता की पहचान कर उसे आगे ला सके। प्रभाव ऐसा हो कि उसके रहते गुटबाजी की बात भी न सोची जा सके। काम करने वाले नेता-कार्यकर्ताओं में यह भरोसा बढ़े कि वह, उसका काम, हर पल नेतृत्व की निगाह में है और उसके काम का मूल्यांकन ईमानदारी से होगा। साथ ही यह भी जरुरी है कि वह विपक्षी नेताओं, अखिलेश, मायावती, राजनाथ, योगी आदित्यनाथ के कद को पार करता हुआ आमजन के बीच कांग्रेस के प्रति आकर्षण पैदा कर सके। बेशक यह काम मौजूदा दौर में कांग्रेस पार्टी के लिए कठिन था, लेकिन नेतृत्व ने प्रियंका गांधी को पहले महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश, फिर पूरे यूपी का प्रभारी बनाकर कठिन सा दिख रहे कार्य की आसान शुरुआत कर ली है।
लोकसभा चुनाव के दौरान आम जनता के बीच उपस्थिति, जनमुद्दे उठाने और लोगों के दिलों को छू जाने वाली बिना लाग लपेट की बातों ने प्रियंका की एक अलग छवि बनायी है। सोनभद्र के उम्भा गांव में आदिवासियों के सामूहिक हत्या की घटना हो या उन्नाव गैंगरेप पीडि़ता का मामला, किसानों, नौजवानों का सवाल हो या जनता से जुड़ा कोई और मुद्दा, उनका सरकार से दो दो हाथ करना ऐसे काम हैं जो उन्हें जनता के करीब लाकर खड़ा कर देते हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी में नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच पिछले कुछ सालों में सम्वादहीनता का गैप बनने से कार्यकर्ताओं की सुनने वाला कोई दिख नही रहा था। परिणाम स्वरूप कार्यकर्ता घर बैठने लगा। जिससे पार्टी लगातार कमजोर होती चली गई। राजनीति में कदम रखने के साथ प्रियंका गांधी ने इसे महसूस किया और सप्ताह में दो दिन कार्यकर्ताओं से मिलने का शेड्यूल बनाया। कार्यकर्ताओं से नियमित मुलाकात शुरू की। उनकी बातें सुनना, हर मुद्दे पर राय मांगना और सब बातें खुद नोट करना, वर्षों से उपेक्षित, निराश कार्यकर्ताओं के भीतर नया उत्साह भरने लगा। इसके सकारात्मक परिणाम आने भी शुरु हो गये हैं। उपेक्षा से दुखी हो घर बैठ चुके लोगों को लग रहा है कि नेतृत्व अब उनके बीच है, जहां वे अपना दुख दर्द रख सकते हैं।
प्रियंका गांधी ने यूपी में जिस तरह से काम करना शुरू किया है उससे यह लगने लगा है कि वह राजनीति और जनमन की गहरी समझ वाली नेेेेता हैं। मिलनसार स्वभाव की वजह से पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं के साथ ही सामान्य जन के भी काफी करीब रहती हैं। हाजिरजवाबी, जनसम्वेदना, मुश्किल से मुश्किल हालातों में जूझने की प्रवृत्ति, सौम्यता, धैर्य और लोकप्रियता उन्हें दादी इन्दिरा और पिता राजीव के करीब ले जाती है। एक-एक वर्कर की पहचान और उसे उसकी अहमियत का अहसास करा देना ही प्रियंका को नेताओं की भीड़ में सबसे अलग करता है। और इस वक्त उनके इसी ‘अलग’ की जरुरत है कांग्रेस पार्टी को।
उनका आभामंडल ऐसा है कि हजारों लाखों कार्यकर्ता उससे ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं। और अन्तत: यही आभामंडल यूपी के उन किसानों, मजदूरों, नौजवानों, महिलाओं, बेबस इंसानों को अपनी बेशुमार ऊर्जा से भर देने वाला है जो बीजेपी, सपा-बसपा की चक्की में बार बार पिसने की पीड़ा से बावस्ता हैं। यकीनी तौर पर प्रियंका गांधी यूपी में कांग्रेस की सांगठनिक जड़ता तोड़, उसे बदहाली से बाहर निकाल कर हिन्दुस्तान की राजनीति को एक नई दिशा और दशा देने वाली हैं।
