मैं नीर भरी दु:ख की बदली
महादेवी वर्मा की जयंती पर विशेष
‘मैं नीर भरी दु:ख की बदली’ ही परिचय का पर्याय है हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक सर्वकालिक कवियित्री महादेवी वर्मा का, जो उन्होंने स्वयं अपनी कविता में दिया है। इसी एक पंक्ति को मन में रखे हुए आप उनके सम्पूर्ण काव्य-साहित्य का अवलोकन कर डालिए तो आप तुरन्त जान लेंगे कि यही भाव शिराओं में बहने वाले रक्त के समान उनमें सर्वत्र प्रवाहित हो रहा है।
- डॉ. अर्चना पाण्डेय
महादेवी वर्मा जी का काव्य संसार निश्चय रूप से आंसुओं का शृृंगार है मगर उसमें निराशावाद की गंध नहीं है और जीवन के प्रभात की अरुणाई का स्वर ‘बीती रजनी प्यारे जाग’ में स्पन्दित है। जीवन की पगडंडियों पर गड़े हुए पथरीले चट्टान की परवाह नहीं करने वाली महादेवी वर्मा जीवन पर्यंत समाज की विद्रूपता को मुंह चिढ़ाती, ललकारती दिखती हैं। इसीलिए उनके व्यक्तित्व का परिचय देते हुए उनके समकालीन साहित्यकार गंगाप्रसाद पाण्डेय ने कहा, ‘महादेवी वर्मा जी के व्यक्तित्व से तुलना करने के लिए हिमालय ही सबसे अधिक उपयुक्त जान पड़ता है। उनके व्यक्तित्व का वही उन्नत और दिव्य रूप, वही विराट और विशाल प्रसार, वही करुणा तथा तरलता और सबसे बढक़र शुभ्र हास। यही तो महादेवी हैं।’
रहस्यवाद और छायावाद की कवयित्री महादेवी वर्मा के काव्य में आत्मा-परमात्मा के मिलन, विरह तथा प्रकृति के व्यापारों की स्पष्ट छाया दृष्टिगोचर होती है। वेदना और पीड़ा महादेवी जी की कविता के प्राण रहे। उनका समस्त काव्य वेदनामय है। उन्हें निराशावाद अथवा पीड़ावाद की कवयित्री भी कहा गया है। वे स्वयं लिखती हैं, दु:ख मेरे निकट जीवन का ऐसा काव्य है, जिसमें सारे संसार को एक सूत्र में बांध रखने की क्षमता है। इनकी कविताओं में सीमा के बंधन में पड़ी असीम चेतना का क्रंदन है। यह वेदना लौकिक वेदना से भिन्न आध्यात्मिक जगत की है, जो उसी के लिए सहज संवेद्य हो सकती है, जिसने उस अनुभूति क्षेत्र में प्रवेश किया हो। उनकी इस पीड़ा, वेदना को साहित्यकारों ने अलग-अलग दृष्टि से देखा है। जहां रामचंद्र शुक्ल कहते हैं, ‘इस वेदना को लेकर उन्होंने ह्रदय की ऐसी अनुभूतियां सामने रखीं, जो लोकोत्तर हैं। कहां तक वे वास्तविक अनुभूतियां हैं और कहां तक अनुभूतियों की रमणीय कल्पना, यह नहीं कहा जा सकता, तो वहीं डॉ- हज़ारी प्रसाद द्विवेदी उनके काव्य की पीड़ा को मीरा की काव्य-पीड़ा से भी बढक़र मानते हैं। महाप्राण निराला ने उन्हें ‘हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती’ भी कहा है।
महादेवी ने स्वतंत्रता के पहले का भारत भी देखा और उसके बाद का भी। वे उन कवियों में से एक हैं जिन्होंने व्यापक समाज में काम करते हुए भारत के भीतर विद्यमान हाहाकार, रुदन को देखा, परखा और करुण होकर अन्धकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की। न केवल उनका काव्य बल्कि उनके समाजसुधार के कार्य और महिलाओं के प्रति चेतना भावना भी इस दृष्टि से प्रभावित रहे। उन्होंने मन की पीड़ा को इतने स्नेह और शृंगार से सजाया कि दीपशिखा में वह जन-जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई और उसने केवल पाठकों को ही नहीं समीक्षकों को भी गहराई तक प्रभावित किया।
साहित्य सृजन, शिक्षण और समाजकार्य में उनका कार्य अप्रतिम है। 11 सितम्बर को महादेवी वर्मा की 33वीं पुण्यतिथि है। इस अवसर पर उन्हें याद करते हुए प्रस्तुत है उनकी प्रसिद्ध कविता—
मैं नीर भरी दुख की बदली!
स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा
क्रन्दन में आहत विश्व हंसा
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झारिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीत भरा
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा
नभ के नव रंग बुनते दुकूल
छाया में मलय-बयार पली।
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना
पथ-चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगन की जग में
सुख की सिहरन हो अन्त खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतनाए इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!
