उज्ज्वला योजना : कितनी हक़ीक़त, कितना फ़साना

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● निर्मल रानी

मार्च 2015 में हमारे प्रधानमंत्री ने देशवासियों से घरेलू गैस उपभोक्ताओं से गैस सब्सिडी छोड़ने का आवाह्न किया था। सरकार द्वारा उस समय यही बताया गया था कि जनता द्वारा स्वेच्छा से सब्सिडी त्यागने के बाद जो धनराशि जुटाई जाएगी उससे उन ग़रीबों को मुफ़्त गैस कनेक्शन दिया जाएगा जो अभी तक लकड़ी या गोबर के उपले आदि जलाकर चूल्हे पर खाना बनाने के लिये मजबूर हैं। इसी महत्वाकांक्षी योजना का नाम था प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जिसकी शुरुआत 2016 में ज़ोरदार आयोजनों व ज़बरदस्त प्रचार प्रसार के साथ हुई थी।

जितने पैसे ग़रीबों को गैस कनेक्शन व गैस चूल्हा आदि मुफ़्त में उपलब्ध करवाने में सरकार ने ख़र्च किये होंगे संभवतः उतने ही पैसे इन योजना का ढिंढोरा पीटने में ख़र्च कर दिये गये। अख़बार, टीवी, फ़्लैक्स विज्ञापनों के अलावा देश का शायद ही कोई पेट्रोल पंप ऐसा बचा हो जहाँ प्रधानमंत्री के बड़े चित्र के साथ उज्ज्वला योजना का विशाल फ़्लैक्स बोर्ड न लगाया गया हो। इस योजना का एक दूरगामी मक़सद यह भी था कि भारतवर्ष एक ऐसे देश के रूप में जाना जा सके जो धुआँ रहित देश हो।

इस योजना के अंतर्गत देश के 5 करोड़ लोगों तक गैस कनेक्शन निःशुल्क पहुंचाना था। विशेषकर ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाली महिलाओं के लिए चलाई जाने वाली इस योजना के पूरा होने की समय सीमा 2019 तय की गई थी।

अभी यह योजना अपने लक्ष्य यानी पांच करोड़ ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों तक पहुँच भी नहीं सकी थी कि इसी बीच वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फ़रवरी 2021 को आम बजट पेश करते हुए यह घोषणा कर डाली कि प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत इसी वर्ष एक करोड़ रसोई गैस के कनेक्शन मुफ़्त में दिए जाएंगे। और इसी ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ के दूसरे चरण यानी प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना 2.0 की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 10 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा उत्तर प्रदेश के महोबा ज़िले में लाभार्थियों को गैस कनेक्शन देते हुए की गयी। इस अवसर पर प्रधाननमंत्री ने उज्ज्वला योजना के कुछ लाभार्थियों से भी बात की।

यहाँ ग़ौरतलब यह भी है कि उज्ज्वला योजना 1.0 में ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार की 5 करोड़ महिलाओं को गैस कनेक्शन बांटने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। जबकि 2018 में इसी योजना में सात और श्रेणी की महिलाओं को भी लाभार्थियों की सूची में शामिल किया गया इनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अंत्योदय अन्न योजना, अति पिछड़ा वर्ग, चाय बाग़ान वर्कर, वनवासी व द्वीपों में रहने वाले परिवारों की महिलायें शामिल हैं।

इसी प्रकार उज्ज्वला 2.0 का लाभ लेने के लिए राशन कार्ड और पता प्रमाणपत्र जमा करने की ज़रूरत को समाप्त किया गया। नई योजना में ज़रूरतमंद परिवार स्वयं द्वारा सत्यापित आवेदन देकर भी इस योजना का लाभ ले सकेगा। सरकार द्वारा बताया गया कि यह कनेक्शन कम आमदनी वाले उन परिवारों को दिए जाएंगे, जो उज्ज्वला योजना के पहले चरण में शामिल नहीं हो सके थे।

उज्ज्वला योजना के ‘सरकारी गुणगान अभियान’ के तहत जब हम यह सुनते हैं कि इस योजना से महिलाओं को धुएँ से निजात मिलेगी, ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को खाना बनाने के लिए रोज़ाना प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने के चलते उन्हें जिन समस्याओं से जूझना पड़ता था उससे मुक्ति मिलेगी आदि, तो निश्चित तौर पर ऐसा ही प्रतीत होता है गोया देश के ग़रीबों की इससे ज़्यादा हितचिंतक सरकार दूसरी नहीं हो सकती।

परन्तु इस योजना की ज़मीनी स्थिति भी क्या वही है जो हमें सरकार व उसका ‘प्रवक्ता’ बना बैठा सत्ता परस्त मीडिया द्वारा दिखाया जा रहा है?

परन्तु इस योजना की बारीकी से तहक़ीक़ात करने पर एक दूसरी भी सचाई सामने आती है। जिस समय 2016 में उज्ज्वला 1.0 शुरू की गयी थी उस समय यानी 2016-17 के दौरान घरेलू गैस की क़ीमत 550 रुपये प्रति सिलिंडर से भी नीचे थी। उसी समय ऐसे उपभोक्ता सामने आने लगे थे जिन्होंने आर्थिक तंगी के चलते दुबारा गैस नहीं भरवाई। और वे पुनः धुआँ युक्त पारंपरिक प्राकृतिक ईंधन इस्तेमाल करने लगे।

सोचने का विषय है कि आज भले ही उज्ज्वला 2.0 की घोषणा कर उसी पुरानी योजना के नाम पर पुनः वाहवाही लूटने की कोशिश की जा रही हो परन्तु आज उसी गैस का मूल्य लगभग 900/-रुपये प्रति सिलेंडर पहुँचने के क़रीब है। हर महीने और कभी तो हर हफ़्ते क़ीमतों में इज़ाफ़ा जारी है।

सवाल यह है कि जो ग़रीब 550 रुपये की क़ीमत का सिलेंडर भरने में असमर्थ था वह भला 1000/-रुपये का सिलेंडर कैसे भरवा सकेगा? और वह भी कोरोना का भयानक संकट झेल चुके उस देश में जहाँ करोड़ों लोग बेरोज़गार हो चुके हों? और इस बेरोज़गारी का भी सबसे अधिक प्रभाव भी इन्हीं ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों पर ही पड़ा हो?

द सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी’ (सीएमआईई) द्वारा जुटाए गए आँकड़े बताते हैं कि गत वर्ष लॉकडाउन के बाद बेरोज़गारी दर बढ़कर 8.35 फ़ीसदी थी। इस साल मई माह में बेरोज़गारी दर 11.9 फ़ीसदी थी और इसी महीने 1.5 करोड़ लोगों की नौकरियाँ ख़त्म हो गयी थीं।

यदि आज हम किसी भी राज्य की ग़रीब गृहणियों से मुलाक़ात करें तो यही पायेंगे कि गैस की क़ीमत बेतहाशा बढ़ने के चलते अधिकांश ग़रीबों ने गैस भरवाना बंद कर दिया है। सरकारी उज्ज्वला योजना के अंतर्गत आवंटित सिलेंडर चूल्हे इनके घरों में धूल खा रहे हैं। किसी ने कई महीनों से गैस नहीं भरवाई तो किसी ने साल दो साल से गैस नहीं ली। ऐसे में इस योजना की सार्थकता पर सवाल उठना लाज़िमी है।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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