जासूसी पर अरबों खर्च के बीच दस गुना बढ़ गया एनएसए के सचिवालय का बजट

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राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अगुवाई वाले राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय, जिसका बजट साल 2011-12 में एनएसए सचिवालय का बजट 17.43 करोड़ था, 2012-13 में यह बढ़कर 20.33 करोड़ हो गया। 2014 में इसे 26.06 करोड़ कर दिया गया। एनडीए के सत्ता में आते ही यह 2014-15 में बढ़कर 44.46 करोड़ रुपये हो गया। 2016-17 में यह बजट 33 करोड़ था और 2017-18 में 333 करोड़ तक पहुंच गया।, जिसमें से दो तिहाई हिस्सा साइबर सिक्योरिटी रिसर्च के लिए था। यह वही समय है जब 100 करोड़ रुपये पेगासस खरीदने में खर्च किए गए ताकि जजों, चुनाव आयोग, एक्टिविस्ट और पत्रकारों की जासूसी की जा सके।

● जेपी सिंह

पेगासस जासूसी कांड में कल एक सनसनीखेज खुलासा हुआ है और इसकी जद में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल आ गये हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के बजट को 33 करोड़ से बढ़ाकर 333 करोड़ करने का खुलासा मशहूर वकील प्रशांत भूषण और कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने किया है। आरोप है कि यह वही समय है जब 100 करोड़ रुपये पेगासस खरीदने में खर्च किए गए ताकि जजों, चुनाव आयोग, एक्टिविस्ट और पत्रकारों की जासूसी की जा सके।

प्रशांत भूषण ने अपने ट्विटर अकाउंट पर कुछ दस्तावेजों को साझा करके एनएसए सचिवालय के बजट बढ़ने की बात कही है। प्रशांत भूषण ने अपने ट्वीट में कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय, जिसकी अगुवाई एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार) करते हैं, उसका बजट साल 2016-17 में 33 करोड़ से बढ़कर 2017-18 में 333 करोड़ रुपये हो गया, जिसमें से दो तिहाई हिस्सा साइबर सिक्योरिटी रिसर्च के लिए था। उन्होंने कहा कि यह वही समय है जब 100 करोड़ रुपये पेगासस खरीदने में खर्च किए गए ताकि जजों, चुनाव आयोग, एक्टिविस्ट और पत्रकारों की जासूसी की जा सके।

प्रशांत भूषण के द्वारा साझा किए गए दस्तावेजों के अनुसार साल 2011-12 में एनएसए सचिवालय का बजट 17.43 करोड़ था, 2012-13 में यह बढ़कर 20.33 करोड़ हो गया। 2014 में इसे 26.06 करोड़ कर दिया गया। एनडीए के सत्ता में आते ही यह 2014-15 में बढ़कर 44.46 करोड़ रुपये हो गया। 2016-17 में यह बजट 33 करोड़ था और 2017-18 में 333 करोड़ तक पहुंच गया। शेयर किए गए डाटा के अनुसार 2021 में यह बजट 228.72 करोड़ रुपये है।

कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने यह सवाल किया है कि क्या पेगासस जासूसी प्रकरण के कारण ही यह बजट बढ़ाया गया? उन्होंने शुक्रवार को दावा किया कि साल 2017-18 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिवालय के बजट में 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई और यह उस वक्त हुआ जब ‘पेगासस जासूसी प्रकरण’ आरंभ हुआ था।

पवन खेड़ा ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिवालय का बजट 2011-12 में 17.43 करोड़ रुपये था। यह सरकार आई तो 2014-15 में इन्होंने उसे 33 करोड़ कर दिया। 2017-18 में चौंकाने वाले तथ्य य़ह हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिवालय के तहत एक नयी इकाई जोड़ दी गई और इसका बजट 33 करोड़ से बढ़ा कर 333 करोड़ कर दिया गया यानी 300 प्रतिशत बढ़ा दिया गया।

पवन खेड़ा ने सवाल किया, ‘‘2017-18 में, जब ये जासूसी प्रकरण आरंभ हुआ। इसका कारण बताइए कि ये 333 करोड़ आपने क्यों बढ़ाया? क्या पेगासस सॉफ्टवेयर सरकार या सरकार की किसी एजेंसी ने खरीदा? अगर सरकार ने खरीदा तो क्या उसने अपने ही अधिकारियों, अपने ही राजनेताओं, अपनी पार्टी के नेताओं, पत्रकारों पर इसका इस्तेमाल किया?

पेगासस मामले को लेकर सरकार की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। मानसून सत्र में इस विवाद पर विपक्ष लामबंद हो गया है और लगातार सरकार का घेराव कर रहा है। हालांकि सरकार सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर रही है लेकिन विवाद बना हुआ है। पेगासास मामले पर कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने उच्चतम न्यायालय से दखल देने की मांग व जांच के आदेश देने की बात कही है।

दरअसल पेगासस एक स्पाईवेयर है। इसके जरिए किसी भी शख्स के फोन की सारी जानकारी निकाली जा सकती है। इस स्पाईवेयर को एक्टिव करने के लिए एक लिंक भेजा जाता है। अगर उपभोक्ता इस लिंक को क्लिक करता है तो एक खास कोड फोन में इंस्टॉल हो जाता है और इसकी निगरानी शुरू हो जाती है।

इस बीच ‘द वायर’ ने खुलासा किया है कि इजरायली कंपनी एनएसओ समूह की ग्राहक, एक अज्ञात सरकारी एजेंसी द्वारा दिल्ली के कश्मीरी पत्रकारों और जम्मू-कश्मीर के प्रति आधिकारिक नीति की आलोचना करने वाले एक प्रमुख नागरिक समाज के कार्यकर्ता के अलावा कश्मीर घाटी के 25 से अधिक लोगों को 2017 और 2019 के बीच निगरानी के संभावित लक्ष्य के रूप में चुना गया था। द वायर द्वारा जांचे गए लीक रिकॉर्ड में यह दावा किया गया है। इस संभावित जासूसी के जाल में प्रमुख अलगाववादी नेताओं, राजनीतिज्ञों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और कश्मीर के व्यवसायियों के नंबर शामिल हैं।

इनमें से द वायर दो फोन पर फॉरेंसिक जांच करवाने में सफल रहा, जिसमें पहला फोन अलगाववादी नेता बिलाल लोन का था और दूसरा दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक मरहूम एसएआर गिलानी का था। गिलानी का साल 2018 में देहांत हो गया था। एमनेस्टी इंटरनेशनल की सिक्योरिटी लैब ने लोन के फोन का फॉरेंसिक विश्लेषण किया है। हालांकि यह हैंडसेट वो नहीं था, जैसा वो संभावित तौर पर सर्विलांस का निशाना बनाए जाने के समय इस्तेमाल कर रहे थे, मगर विश्लेषण में पेगासस द्वारा निशाना बनाए जाने के संकेत मिले हैं। स्पायवेयर के निशान 2019 में भी दिखाई देते हैं, जो संभवत: एनएसओ के भारतीय ग्राहक द्वारा शुरू की गई प्रक्रिया का परिणाम है।

लीक हुए डेटाबेस में अन्य लोगों में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) प्रमुख और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के परिवार के कम से कम दो सदस्य शामिल हैं। निगरानी के संभावित निशाने के रूप में उनका चयन तब हुआ जब मुफ्ती भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार में मुख्यमंत्री थीं। असल में जून 2018 में भाजपा के गठबंधन से बाहर होने से सरकार गिरने से कुछ ही महीने पहले मुफ्ती के परिवार के सदस्यों को संभावित सर्विलांस के लिए चुना गया था।

जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के अध्यक्ष अल्ताफ बुखारी के भाई तारिक बुखारी भी इस सूची में शामिल हैं और उस अज्ञात भारतीय एजेंसी की दिलचस्पी के दायरे में हैं, जिसने 2017 और 2019 के बीच उनका नाम डेटाबेस में जोड़ा। रिपोर्ट में कहा गया है, इसके अलावा, कश्मीर के सबसे प्रभावशाली अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के दामाद और पत्रकार इफ्तिखार गिलानी, उनके वैज्ञानिक बेटे सैयद नसीम गिलानी सहित इस परिवार के कम से कम चार सदस्य 2017 और 2019 के बीच एनएसओ के भारतीय ग्राहक की दिलचस्पी के दायरे में थे।

द वायर ने कहा कि लीक डेटाबेस से यह भी पता चलता है कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के वर्तमान प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक 2017 और 2019 के बीच निगरानी का संभावित लक्ष्य थे। फारूक घाटी के प्रमुख धार्मिक व्यक्तियों में से एक हैं। रिकॉर्ड से पता चलता है कि फारूक का ड्राइवर भी संभवत: निगरानी का लक्ष्य था। घाटी के एक प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता वकार भट्टी भी संभावित निगरानी का निशाना थे।

पेगासस प्रोजेक्ट का डेटा यह भी बताता है कि कम से कम पांच कश्मीरी पत्रकार- जिनमें इंडियन एक्सप्रेस के मुजम्मिल जलील, उस समय हिंदुस्तान टाइम्स के साथ काम कर रहे औरंगजेब नक्शबंदी, पूर्व में डीएनए के साथ काम करने वाले इफ्तिखार गिलानी और पीटीआई के सुमीर कौल को भी साइबर निगरानी का निशाना बनाया गया था।

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, पांचवें पत्रकार का नाम उनके अनुरोध पर प्रकाशित नहीं किया जा रहा है। दिल्ली में रहने वाले कश्मीर के राजनीतिक टिप्पणीकार शब्बीर हुसैन भी सर्विलांस सूची में थे। सरकार की कश्मीर नीति की आलोचना करने वाले दिल्ली के एक बेहद चर्चित नागरिक समाज के सदस्य का टेलीफोन नंबर भी 2018 और 2019 के डेटाबेस में पाया गया है। द वायर ने इस नंबर की पुष्टि की है, लेकिन इन शख्स के अनुरोध पर वह उनकी पहचान साझा नहीं कर रहा है।

घाटी के एक प्रमुख व्यवसायी भी संभावित निगरानी के दायरे में थे, उसी तरह दिल्ली के एक कारोबारी का नंबर भी इस सूची में था, जिनके जम्मू कश्मीर के मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के साथ अच्छे संबंध हैं, इन दोनों के अनुरोध पर उनकी पहचान छिपाई जा रही है। श्रीनगर के डाउनटाउन के एक हस्तशिल्प व्यवसायी के फोन को भी संभावित रूप से निशाना बनाया गया था। उन्होंने इस बारे में कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

संभावित निगरानी के लिए चुने गए अन्य लोगों में मीरवाइज के नेतृत्व वाले हुर्रियत से जुड़े एक प्रभावशाली शिया धर्मगुरु और प्रमुख अलगाववादी नेता जफर अकबर भट भी शामिल हैं। द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, रिकॉर्डस से यह भी पता चलता है कि क्षेत्र के एक कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय के एक फैकल्टी सदस्य और दो सोशल एक्टिविस्ट को भी संभावित निगरानी के लिए चुना गया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की जन चौक में प्रकाशित रिपोर्ट।)

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