किसान आंदोलन को इतिहास का सलाम!

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किसान आंदोलन भारतीय आत्मा की निरंतरता और प्रवाहमयता का पड़ाव है। यह अनथक काल यात्रा चलती रहेगी, जब तक किसान जीवित हैं। जिजीविषा, जिद और जिरह से लैस मौजूदा किसान आंदोलन न तो पहली धड़कन है और न ही अंतिम। हार जीत से परे यह आंदोलन सरकारों, प्रतिहिंसकों, पुलिस सेना, अंधभक्तों, दलालों, काॅरपोरेटियों और हर अहंकारी शक्ति के जमावडे़े को जनता की आवाज का एक प्रतिनिधि ऐलान है। पूरी तौर पर अहिंसक ये आंदोलन दुनिया के किसी भी जन-आंदोलन के मुकाबिले इतिहास में दर्ज किया जााएगा।

● कनक तिवारी

मौजूदा किसान आंदोलन राष्ट्रीय पर्व है। वह अवाम के सबसे प्रतिनिधि अंश का आजादी के बाद सबसे बड़ा जनघोष है। सैकड़ों किसानों की मौतें हो चुकीं। लाखों करोड़ों दिलों का वह स्पंदन गायन बन चुका। वह ईंट दर ईंट चढ़ते इरादों की मजबूत दीवार है। करोड़ों किसान सैद्धांतिक हरावलदस्ता बनकर निजाम से जायज अधिकारों की पहली बार पुरअसर मांग कर रहे हैं। हमवतन सरकार से संवैधानिक अधिकार लेने का यह जानदार मर्दाना उदाहरण है। वे मुकम्मिल सत्याग्रह के रास्ते चलकर अधिकार हासिल करना चाहते हैं, जो संसद के मुखौटे की आड़ में छीने जा रहे हैं।

ऐसा नहीं कि सरकारें कानून वापस नहीं लेती रही हैं। ऐसा भी नहीं कि किसानों के पक्ष में देश के बुद्धिजीवी, अर्थशास्त्री, सियासती ताकतें और ईमानदार नागरिक नहीं खड़े हैं। किसान आंदोलन पूरी तौर पर अहिंसक है। यह दुनिया के किसी भी जनआंदोलन के मुकाबिले इतिहास की पोथियों में दर्ज किया जााएगा। रूस, वियताम, क्यूबा, मांटगोमरी और सैकड़ों जगहों पर कुछ हुए जनआंदोलनों से तुलना की जाएगी।

नेताविहीन किसान आंदोलन विश्व इतिहास का श्रेय बनेगा। हो ची मिन्ह, लेनिन, मार्टिन लूथर किंग, फिदेल कास्त्रो और गांधी जैसा कोई नेता नहीं है। फिर भी किसानों ने इतिहास में नई फसल बोई है। इस आंदोलन के जरिये अमिट स्याही से पानी पर पत्थर की लकीर की तरह जो इबारत लिखी है, वो पीढ़ियों की यादों की आंखों में फड़कती रहेगी।

आज कायर रहने की हर कोशिश को एक मनुष्य इकाई बताकर मुफ्त में चावल मिल जाने को निजाम की ताबेदारी करने का चुनावी आचरण बनाया जाता है। जिनके पूर्वजों ने इतिहास की उजली इबारतों पर काली स्याही फेर दी और जिनमें दिमागी वायरस है वे पसीना बहाने वाले किसानों के अहिंसक आंदोलन को काॅरपोरेटियों की तिजोरियों, पुलिस की लाठियों, और मंत्रियों की लफ्फाजी में ढूंढ़ना चाहते हैं।

एक वाचाल भक्तमंडली, जो राष्ट्रीय जीवन में टेस्टट्यूब बेबी की तरह है, उसे कोफ्त है कि किसान अमीर क्यों हैं। उनके पास ट्रैक्टर क्यों है। छह महीने की लड़ाई की घोषणा करके पूरी तैयारी के साथ कैसे आ गए। उनके घरों की महिलाएं, बच्चे, बूढ़े सभी साथ क्यों हैं। सभी तरह की तकनीकी जानकारियों और तकनीकी व्यवस्था से लैस क्यों हैं।

इन बुद्धिशत्रुओं को समझ नहीं कि किसान वे भी हैं, जो लाखों की संख्या में लगातार आत्महत्या करने मजबूर हो रहे। जिन्हें स्वामीनाथन रपट मानने के आश्वासन के बावजूद सरकारों द्वारा फसल की कीमत देने को लेकर धोखा दिया जा रहा है। उन्हें लफ्फाज राजनीतिक नेताओं द्वारा नियंत्रित सहकारी बैंकों में अपनी जमीन, महिलाओं के जेवर और पिता की बुढ़ापे की पेंशन तक गिरवी रखनी पड़ रही है, और छुड़ाने में असमर्थ हैं।

किसान बेटी का ब्याह नहीं कर पा रहे हैं। मां, बाप की दवा नहीं ला पा रहे। पत्नी की अस्मत को बुरी नजरों से बचाने को मुनासिब वस्त्र तक नहीं खरीद पा रहे। बच्चे हालात की मजबूरी के कारण पढ़ाई छोड़कर या तो मां बाप के खेतों पर काम कर रहे या उन्हें बहला फुसलाकर शोहदे बनाकर लफंगों द्वारा ऐसे अपराध करवाए जा रहे जिनमें पीड़ितों में निर्भया जैसी बेटियां भी शामिल हैं।

किसान धरती पुत्र हैं। किसानों के बेटे पुलिस की नौकरी में हैं। भाई की लाठी सगे किसान भाई की पीठ पर मारी जा रही है। किसान नहीं गए थे सुप्रीम कोर्ट में कि न्याय करो। किसानों के बेटे आलिम फाज़िल भी हैं। अर्थशास्त्र, इंजीनियरिंग, डाॅक्टरी और मानव विज्ञानों की डिग्रियां हैं। वे नोटबंदी, जीएसटी, नागरिकता अधिनियम, कश्मीर, कोरोना पीड़ितों वगैरह के कई मुकदमों में सुप्रीम कोर्ट का न्याय देख चुके। सुप्रीम कोर्ट के कुछ जज मनोरंजक सुभाषित और सूक्तियों का प्रवचन करते रहते हैं। उन्हें आने वाला इतिहास पढ़कर सिर धुनते हुए पुलकित होना चाहेगा।

पस्त भारतीय जनता ने सल्तनतों के साथ ही कुषाण, हूण, पठान, तुर्क, मुसलमान, मुगल, अंगरेज, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, डच और बाद में चीनी हमले झेले हैं। तब गांधी की अहिंसा और सत्य, अभय, भगतसिंह और चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत और सुभाष बोस के पराक्रम तथा भारत के तमाम संतों और बुद्धिजीवियों द्वारा ‘उठो जागो और मकसद हासिल करो‘, ‘स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है‘, ‘जय जवान जय किसान‘, ‘दिल्ली चलो‘, ‘इंकलाब जिंदाबाद‘, ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा‘, ‘आजादी की घास गुलामी के घी से बेहतर,‘ ‘किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों एक हो‘, ‘आराम हराम है‘ जैसे नारों ने भारत की मर्दानगी का इतिहास लिखा। ये नारे जिन आत्माओं से फूटे, उनके लिए अनाज किसानों ने खून पसीने से धरती सींचकर पैदा किया था।

किसान आंदोलन भारतीय आत्मा की निरंतरता और प्रवाहमयता का पड़ाव है। यह अनथक काल यात्रा चलती रहेगी, जब तक किसान जीवित हैं। उनमें जिजीविषा, जिद और जिरह है। मौजूदा किसान आन्दोलन न तो पहली धड़कन है और न ही अंतिम। इसमें हार जीत नहीं है। सरकारों, प्रतिहिंसकों, पुलिस सेना, अंधभक्तों, दलालों, काॅरपोरेटियों और हर अहंकारी शक्ति के जमावडे़े को जनता की आवाज का यह एक प्रतिनिधि ऐलान है।

इस आवाज को कुचल दिये जाने के बाद भी इसका आगाज इतिहास में आगे चलकर दर्ज होता रहेगा। नौजवानों, छात्रों, महिलाओं, दलितों, वंचितों और किसानों द्वारा आज़ादी का नारा लगाते आंदोलन करना देश की धड़कन को जिलाए रखने का प्रोत्साहन है।

यही शोला है जो भगतसिंह और चंद्रशेखर आज़ाद में दहका था। भगतसिंह ने कहा था मैं हिंसक नहीं हूं। जनता में साहसी अहिंसक इंकलाब का बीज बोना चाहता हूं। इतिहास को दुख है कि भगतसिंह की बौद्धिक तीक्ष्णता गांधी संयोगवश पढ़ नहीं पाए। वही अग्नि लाखों नाामालूम किसानों और करोड़ों देशवासियों में कहीं न कहीं सुलग रही है। भले ही उस पर सफेद राख उसके बुझ जाने का छद्म रच रही हो।

भारत अभी मरा नहीं है। कभी नहीं मरेगा। अमर है। किसान मेहनत के दम पर कपड़े पहनता है। बीवियों के लिए गहने बनवाता है। बच्चों की तालीम, मां बाप को इलाज के लिए विदेश भी भेज सकता है। धरती की छाती फोड़कर एक साथ मुल्क में इंसानियत, भाईचारा, अमन चैन और आर्थिक रिश्तों को भी उगाता है। वह दलाली नहीं खाता। कुछ लोग हिंदुस्तान के किसान आंदोलन में सेंधमारी कर रहे। वह काम तो चूहे और दीमक ज़्यादा अच्छी तरह करते हैं और किसान का सबसे ज़्यादा।

किसान आंदोलन का जो भी हश्र हो। वह हौसला कभी नहीं मरेगा। हुक्काम रहेंगे लेकिन वे पांच पांच साल तक अपनी अगली जिंदगी मांगने के लिए जिन दहलीजो पर आएंगे, उनमें सबसे ज्यादा संख्या तो किसानों की है।

यदि पूरे देश के किसान किसी तरह से एकजुट होते तो आंदोलन इतने दिन चलने की ज़रूरत नहीं होती। किसान को सभी सरकारों द्वारा जानबूझकर बदहाल रखा गया है। किसान को काॅरपोरेट की गुलामी कराने पूंजीवादी षड़यंत्र रचा गया है।

वह साजिश, अट्टहास, बदगुमानी और अहंकार के कानून की इबारत में भी गूंज रहा है। किसान ने अपनी ज्ञानेन्द्रियों के जरिए उसे देख, सुन और सूंघ लिया है। काॅरपोरेट और निजाम के नापाक गठजोड़ को तार तार कर दिया है।

(लेखक प्रख्यात गांधीवादी विचारक, टिप्पणीकार और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।)

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