आरएसएस-बीजेपी की संस्कारशाला से निकला राममंदिर ‘जमीन खरीद घोटाला’!

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राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट पर लगे ‘भूमि खरीद घोटाला’ के आरोप में कुछ ट्रस्टीयों और संघ-बीजेपी से जुड़े लोगों का नाम सामने आना और इसपर सरकार व संघ-बीजेपी की रहस्यमयी चुप्पी से लोग जहां हैरान हैं, वहीं एक के बाद एक कई मामले सामने आने से आरएसएस के लिए मुंह चुराना अब मुश्किल हो चला है।

● आलोक शुक्ल

मई महीने में अयोध्या में बन रहे राम मंदिर के नाम पर जमीन खरीदने के मामले में बड़े भ्रष्टाचार का सनसनीखेज मामला सामने आया। पता चला कि ट्रस्ट ने 2 करोड़ की जमीन साढ़े अठारह करोड़ में खरीदी है। एक जमीन जिस दिन 2 करोड़ में खरीदी गई उसी दिन महज दस मिनट के भीतर ही ट्रस्ट को वही जमीन साढ़े अठारह करोड़ में बेच दी गई। इस जमीन एक ही दिन हुए दोनो खरीद फरोख्त में ट्रस्ट के एक ट्रस्टी और एक भाजपा नेता गवाह हैं। ट्रस्ट सचिव चम्पत राय द्वारा ढिठाई पूर्वक आरोपों को दरकिनार करने के प्रयास ने पूरे आरएसएस को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है।

पहले मंदिर निर्माण ट्रस्ट द्वारा अयोध्या में एक जमीन की खरीदी में बड़े घोटाले का खुलासा हुआ। सामने आए कुछ दस्तावेजों के आधार पर ट्रस्ट और संघ-बीजेपी से जुड़े लोगों पर ट्रस्ट के नाम पर जमीन की खरीदने में दलाली और मंदिर निर्माण के लिए आये चंदा की रकम का बंदरबाट करने आरोप लगा। जिसके बाद सामने आये ट्रस्ट के सचिव चम्पत राय ने निहायत ही गैरजिम्मेदाराना ढंग से बात करते हुए आरोप लगाने वालों पर ही सवाल खड़ा करना शुरू कर दिया। जिससे आरोप गहराते चले गये। उन्होंने कहा, “हम पर आरोप लगते ही रहते हैं। 100 साल से आरोप ही देख रहे हैं हम लोग। हम पर महात्मा गांधी की हत्या के आरोप लगे। आरोप की हम चिंता नहीं करते, आप भी चिंता मत करिए। आप खूब लगाइए। आप अपना काम करिए, हम अपना काम करेंगे।”

संघ अभी अभी पहले आरोप की तपिश से बचने के कुछ उपाय रचता कि अगले ही दिन दिन इसी जमीन के एक और टुकड़े की खरीद का मामला सामने आ गया। इस सौदे में ट्रस्ट द्वारा चुकायी गई कीमत, पहले लगे आरोपों को पुष्ट करती दिखी। अगले दो तीन दिन बीतते-बीतते दो और जमीनों की खरीद में धांधली और ट्रस्ट के धन की लूट सामने आई। सभी मामलों में ट्रस्टीयों और संघ-बीजेपी से जुड़े लोगों की भूमिका साफ दिख रही है। एक के बाद एक लगे घोटाले के आरोपों ने ट्रस्ट को बैकफुट पर ला दिया।

जमीन खरीद घोटाले में शुरू से चर्चा के केंद्र में रहे चम्पत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा, अयोध्या के मेयर व भाजपा नेता ऋषिकेश उपाध्याय और उनके भांजे व बीजेपी नेता दीप नारायण उपाध्याय के ऊपर लगातार उंगलियां उठ रही हैं। मेयर ऋषिकेश उपाध्याय खुद भी प्रॉपर्टी डीलर का काम करते हैं और कालेज भी चलाते हैं।

दावा किया जा रहा है कि मेयर ऋषिकेश उपाध्याय पीएम मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ के करीबी हैं और उनके भांजे दीप नारायण यूपी में बीजेपी के आईटी सेल से जुड़े हैं।

इस घोटाले में किरदारों के रूप में जो चेहरे सामने आये हैं उससे बट्टा आरएसएस और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की साख को ही लगा है। मंदिर निर्माण के लिए बने ट्रस्ट में ज्यादतर आरएसएस के लोग ही न्यासी हैं और इनका चयन प्रधानमंत्री ने किया है। घोटाले में ट्रस्ट के बाहर के जो नाम सामने आए हैं उनमें भी कई संघ-बीजेपी से ही जुड़े लोग हैं। रामजन्मभूमि ट्रस्ट पर लगे इस दाग़ ने जहां आरएसएस-बीजेपी के लिए मुसीबतों का पहाड़ खड़ा कर दिया है वहीं आस्थावानों को भी बेचैन कर दिया है।

मंदिर का प्रारुप और ट्रस्टी अनिल मिश्रा, अयोध्या के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय व दीप नारायण उपाध्याय

घोटाला दर घोटाला

अयोध्या में पहले एक जमीन सौदे पर सवाल उठे थे लेकिन अब कई सौदे सवालों के घेरे में हैं। अब तक कम से कम चार जमीन के सौदे सामने आए हैं जिनपर सवाल उठ रहे हैं। सबमें एक कॉमन आरोप है कि कुछ लोग कम दाम में जमीनें खरीदकर कई गुना दाम पर इन्हें मंदिर ट्रस्ट को बेच रहे हैं।

हरीश पाठक और कुसुम पाठक ने गाटा संख्या 242 में 1.208 हेक्टेयर (लगभग 100 बिस्वा) जमीन 18 मार्च 2021 को 2 करोड़ रुपये में रवि मोहन तिवारी और सुल्तान अंसारी के नाम बैनामा किया। पाठक से ये जमीन लेने के बाद सिर्फ दस मिनट में ही यही जमीन ट्रस्ट को साढ़े अठारह करोड़ में बेच दी। इन दोनो खरीद फरोख्त में ट्रस्ट के एक ट्रस्टी अनिल मिश्रा और मेयर व भाजपा नेता ऋषिकेश उपाध्याय गवाह हैं।

हरीश पाठक और कुसुम पाठक ने 18 मार्च 2021 को ही की गयी एक अन्य रजिस्ट्री में उसी गाटा संख्या 242 में ही 1.037 हेक्टेयर (लगभग 80 बिस्वा) भूमि 8 करोड़ में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के पक्ष में बैनामा की।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक ही जमीन मालिक से एक जमीन के दो टुकड़ों की खरीद में कीमत का इतना अंतर कैसे हो गया? जब 80 बिसवा जमीन आठ करोड़ में ली गयी तो फिर 100 बिसवा जमीन 18 करोड़ 50 लाख में कैसे और क्यों ली गई?

दीप नारायण ने महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य के कब्जे वाली एक नजूल भूमि 20 लाख रुपये में खरीदी और फिर उसे राम जन्मभूमि ट्रस्ट को ढाई करोड़ में बेच दी।

अयोध्या के कोट रामचंद्र इलाके में स्थित (गाटा संख्या 135, रकबा 0.89 हेक्टेयर) नजूल लैंड पर इस साल के फरवरी महीने तक महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य का नाम बतौर सिकमी कास्तकार दर्ज था। यानी महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य कब्जेदार तो थे पर मालिक नहीं। वे जमीन को फ्री होल्ड कराये बगैर बेच नहीं सकते थे। इस नजूल भूमि को दीप नारायण उपाध्याय ने महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य से पहले 20 लाख रुपये में खरीदा और फिर उसे राम मंदिर ट्रस्ट को ढाई करोड़ में बेच दिया।

देवेंद्र प्रसादाचार्य कहते हैं कि मेयर उनसे मिले और कहा कि रामलला के मंदिर के लिए जमीन चाहिए तो उन्होंने जमीन दे दी। हमें 20 लाख रुपये मिले। वही जमीन उन्होंने ढाई करोड़ में कैसे बेची, ये मेरी समझ से परे है। जांच हुई तो नजूल भूमि के सौदे में कुछ प्रशासनिक अधिकारियों समेत कई और रसूखदारों के भी नाम सामने आ सकते हैं।

एक और जमीन की कीमत 27 लाख रुपये थी, उसे भी दीप नारायण ने राम मंदिर ट्रस्ट को एक करोड़ में बेची है।

यह टुच्चई और लुच्चई की पराकाष्ठा ही है कि राम की नगरी में राम मंदिर के बहाने उससे जुड़े लोग कमाई कर रहे हैं। तीन की ज़मीन तेरह में नहीं तेरह सौ में बेच और खरीद रहे हैं। इस तरह के सौदों में क्रेता और विक्रेता दोनों की मिलीभगत होती है।

चंदा का खेल पुराना

‘राम की चिड़िया, राम का खेत, खालो चिड़िया भर भर पेट’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए राम मंदिर निर्माण के नाम चंदा वसूलने का खेल पुराना है। जब ट्रस्ट बना और उसने मंदिर बनाने के लिए देश भर में चंदा वसूली कार्यक्रम चलाया तो उसकी पूरी कमान संघ से जुड़े लोगों ने संभाली। बताया जा रहा है कि ट्रस्ट को मंदिर निर्माण हेतु 5 अप्रैल 2020 तक 5474.94 करोड़ रुपयों का चंदा मिला। इतनी रकम तो बाकायदा ट्रस्ट के लिखत पढ़त में है। इसके बहुत पहले नब्बे के दशक में मंदिर आन्दोलन के दौरान संघ के अनुषांगिक संगठन विश्व हिंदू परिषद ने देश विदेश में चंदा वसूली अभियान में करीब 14 सौ करोड़ रुपये चंदा जुटाया था। लेकिन अब विहिप और संघ उसके बारे में एकदम मौन हैं। वीएचपी के कुछ नेता कई बार कुछ आँकड़ा बता देते हैं लेकिन उसका कोई आधार नहीं होता है।

पहले वाला चंदा हो या इस बार का, कोई हिसाब बताने को तैयार नहीं है। ट्रस्ट के सचिव चम्पत राय तो इस बारे में पूछा जाना ही गलत कहते हैं। चम्पत राय हों, श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास हों या प्रवीण तोगड़िया अथवा अशोक सिंघल रहे हों, किसी ने भी चंदे की रकम का कभी हिसाब नहीं दिया। चम्पत राय तो ऐसे किसी सवाल को ही गलत बताते हैं। एक न्यूज चैनल ने जब उनसे पूछा कि पहले कितना चंदा आया था और अब वो कहां है तो वे कहते हैं कि ये सवाल ही गलत है।

चंदे के बारे में पूछे जाने पर महंत नृत्य गोपाल दास कहते रहे हैं,

“कितना पैसा आया, कितना नहीं आया, हमें नहीं मालूम। हमें ना पैसा लेना है ना देना है, हिसाब क्या लेना है। पैसे का हिसाब कारसेवकपुरम वाले ही रखते हैं। मेरा पैसे से कोई मतलब नहीं हैं। वीएचपी के नेताओं से जब भी राम मंदिर के लिए आने वाले चंदे के बारे में पूछा गया उन्होंने कभी जवाब नहीं दिया।”

हाल के सालों में निर्मोही अखाड़े और हिंदू महासभा से जुड़े नेताओं ने श्रीराम जन्मभूमि न्यास को मिलने वाले चंदे पर सवाल उठाए हैं और विश्व हिंदू परिषद के खातों के बारे में जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है। पारदर्शिता तो यही होती है। लेकिन, इस पर चंपतराय कहते हैं, “जिन लोगों को शिकायत है, उन्हें आयकर विभाग में शिकायत करनी चाहिए और जाँच की माँग करनी चाहिए। जो लोग हमसे हिसाब -किताब मांग रहे हैं, ये पैसा उनका नहीं है, ये राम का पैसा है।”

पहले भी लगे हैं चम्पत पर आरोप

चम्पत राय का ‘आरोपों’ से पुराना नाता है। उनपर अपने गृह नगर नगीना में धर्मार्थ श्री कृष्ण गौशाला की लगभग ₹ 50 करोड़ रुपये कीमत की 20 हज़ार वर्गमीटर ज़मीन अपने भाईयों से क़ब्ज़ा करवाकर, उस पर अवैध डिग्री कॉलेज बनवाने का आरोप है।

चम्पत राय, सचिव, ट्रस्ट

नगीना कस्बा चम्पत राय का गृह नगर है। यहीं की रहने वाली और अब इंडोनेशिया में बस गयी श्रीमती अलका लहोटी का आरोप है कि उनके पिता द्वारा बिजनौर जिले के नगीना कस्बा में पचास के दशक में स्थापित की गई श्री कृष्ण गौशाला की 20 हज़ार वर्गमीटर ज़मीन पर राय के भाइयों ने अवैध क़ब्ज़ा कर एक डिग्री कालेज बना लिया है। श्रीमती लाहोटी के अनुसार जमीन कब्जा करने और कॉलेज बनवाने में उनके कुटुम्बियों ने राय के प्रभाव का खुल कर दबंगई से प्रयोग किया।

वर्ष 2018 से ही अलका लाहोटी इंडोनेशिया से आकर गौशाला की जमीन इन भूमाफ़ियाओं के क़ब्ज़े से मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रही हैं। अलका कहती हैं कि ज़िला प्रशासन और इस कॉलेज को मान्यता देने वाले महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्विद्यालय बरेली की जाँच में ये अवैध क़ब्ज़ा सिद्ध हो चुका है। जिसकी जानकारी संघ परिवार, भाजपा, यूपी के सीएम योगी व उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा सहित अन्य महत्वपूर्ण लोगों को है। पर चम्पत राय के संघ से जुड़ा होने और राजनैतिक दबदबे के सामने सब चुप हैं।

जैसे घोटाला न हुआ, शान की बात हुई!

कितना दिलचस्प है ये कि राम मंदिर के नाम पर जमीन खरीद में घोटाले पर घोटाले सामने आते जा रहे हैं और ट्रस्ट के जिम्मेदार सचिव चम्पत राय इसे घोटाला मानने की बजाय शान के साथ कहते हैं- “हम पर आरोप लगते ही रहते हैं। 100 साल से आरोप ही देख रहे हैं हम लोग। हम पर महात्मा गांधी की हत्या के आरोप लगे। आरोप की हम चिंता नहीं करते, आप भी चिंता मत करिए। आप खूब लगाइए। आप अपना काम करिए, हम अपना काम करेंगे।”

चम्पत राय इस जवाब के जरिए जैसे यह साबित करना चाहते हैं कि आरएसएस के लिये घोटाला कोई शर्म की बात नहीं है बल्कि यह शान की बात है। उनका जवाब यह भी बताता है कि उन्हें और उनके संगठन को आरोपों से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि सरकार उनकी है।

संघ का ये कैसा चरित्र निर्माण!

संघ व्यक्ति के चरित्र निर्माण का दावा करता है। पर देशवासियों के अनुभव में कुछ और ही आ रहा है। मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने एक साधारण घोबी के सतही आरोप पर ही महारानी सीता (जिन्हें वे कठिन संघर्ष में लंका से छुड़ा कर लाये थे) को त्यागने में क्षण भर भी समय नहीं लगाया, उन्हीं भगवान के मंदिर निर्माण के लिए मोदी सरकार द्वारा नियुक्त सार्वजनिक ट्रस्ट के सचिव चंपत राय मीडिया से कहते हैं कि, “आरोप तो लगते रहते हैं, हम उनकी परवाह नहीं करते“। जबकि आरोप भी साधारण नहीं है। बड़े भ्रष्टाचार का है और समर्थन में दस्तावेज भी हैं। देश विदेश से मंदिर निर्माण के लिए चंदा देने वाले भक्त बिना निष्पक्ष खुली जाँच के कैसे मानें कि भ्रष्टाचार नहीं हुआ?

संघ में ढले और इतने बड़े दायित्व के पद पर होते हुए भी चम्पत राय का ऐसा कहना बहुत गम्भीर विषय है। जिस पर समाज अब सोचना प्रारम्भ कर रहा है कि हिंदुत्व और राम राज्य के नाम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय समाज को किस दिशा में ले जा रहा है।

हिंदुओं का दुर्भाग्य

ये हिंदुओं का दुर्भाग्य ही है कि उन्हें धर्म की ठेकेदारी करने वाले जिन लोगों से धर्म के रक्षा की आशा थी वो इतने धर्मद्रोही सिद्ध हो रहे हैं। जिन भगवान राम के नाम पर आदर्श राज्य व्यवस्था को राम राज्य का नाम दिया गया, उसी भगवान का मंदिर बनाने में घोटालों के आरोप हैं।

हिंदू धर्म सम्राट, प्रातः स्मरणीय संत श्री करपात्री जी तो पहले ही अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और हिंदू धर्म’ में विस्तार से सप्रमाण चेतावनी दे गये हैं कि संघ का सनातन हिंदू धर्म से कोई नाता नहीं है।

जमीन खरीद घोटाले में ट्रस्टीयों और भाजपा नेताओं की संलिप्तता सामने आने के बाद लोग कह रहे हैं कि धर्म के नाम पर हिंदुओं की भावनाओं का शोषण करने, फिर मूर्ख बनाने और धर्म के नाम पर बड़े-बड़े घोटाले करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। मंदिर निर्माण का धन लूटकर ये लोग सनातन धर्मावलंबियों की आस्था से खेल रहे हैं।

आध्यात्मिक मार्ग के पथिक को साध्य पाने के लिये साधन की शुद्धता पर ज़ोर देना सिखाया जाता है। अयोध्या में राम मंदिर अगर धार्मिक उद्देश्य से बन रहा है तो साधन की शुद्धता और पारदर्शिता को साथ लेकर चलना ही होगा।

जो पैसा राम मंदिर निर्माण के नाम पर मिला है, उससे ज़मीन की खरीदी अपने आप में चंदे का दुरुपयोग है। मंदिर निर्माण के लिए मिला पैसा ईंट, सिमेंट, पत्थर, सरिया खरीदने के लिए है। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि जब राम मंदिर के लिए जितनी ज़मीन चाहिए, उतनी अदालत के आदेश से मुफ्त ही मिल गई है तो फिर ये आस पास की ज़मीनों की खरीद क्यों? और ट्रस्ट का काम मंदिर निर्माण है, फिर ट्रस्ट वहां ज़मीन का कारोबार क्यों कर रहा है? यह ज़मीनें जो करोड़ों रुपये में खरीदी जा रही हैं, उसका क्या उपयोग होने वाला है?

सरकार-बीजेपी-आरएसएस त्रयी को यह ध्यान रखना होगा कि 100 करोड़ लोगों की आस्था भगवान राम में है न कि भगवान के नाम पर हो रहे गोरखधंधे में। इसलिए, भगवान के नाम पर भी लूट और भ्रष्टाचार करने वालों के हाथों में देश या धर्म का भविष्य सुरक्षित रहेगा, ऐसा कैसे सोचा जा सकता है।

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