है कोई सरकार! जो गरीब बच्चों की जिम्मेदारी उठाए

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देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू है। सबको भोजन का अधिकार यानी फ़ूड सिक्योरिटी एक्ट लागू है। सबको भोजन, सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा सरकार का दायित्व है। फिर कोई बच्ची जो पढ़ना चाहती है तो वह किसी की दया पर क्यों निर्भर है?

● कृष्ण कांत

जमशेदपुर की तुलसी 8 साल की है। तुलसी रविवार को लॉकडाउन के दौरान आम बेच रही थी। एक रिपोर्टर ने तुलसी से पूछा कि वह लॉकडाउन में आम क्यों बेच रही है। तुलसी ने बताया कि उसे आगे की पढ़ाई करनी है और पैसे नहीं हैं। पढ़ाई ऑनलाइन हो रही है। पढ़ाई करने के लिए मोबाइल खरीदना है।

तुलसी के मुताबिक, पहले मोबाइल की जरूरत नहीं होती थी कि क्योंकि स्कूल जाते थे। टीचर पढ़ा देते थे, लेकिन कोरोना के चलते स्कूल भी बंद है। सारी पढ़ाई मोबाइल पर ही हो रही है। इसलिए मोबाइल की बहुत जरूरत है।

ये खबर वायरल हो गई। इसके बाद वैल्युएबल एडुटेंमेंट कंपनी के वाइस चेयरमैन नरेंद्र हेते, तुलसी की मदद करने के लिए आगे आए। उन्होंने जाकर तुलसी से 12 आम खरीदे और बदले में उसे 1.20 लाख रुपये दिए। उन्होंने तुलसी को एक मोबाइल फोन और दो साल का इंटरनेट भी फ्री करवा कर दिया। ताकि वो अपनी ऑनलाइन पढ़ाई कर सके। इसके लिए नरेंद्र हेते की तारीफ हो रही है।

नरेंद्र का काम वाकई काबिले-तारीफ है। लेकिन मेरा सवाल दूसरा है। मेरी शिकायत सरकारों से है। देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू है। देश में भोजन का अधिकार लागू है। फ़ूड सिक्योरिटी एक्ट है। सबको भोजन, सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा सरकार का दायित्व है। फिर कोई बच्ची जो पढ़ना चाहती है तो वह किसी की दया पर क्यों निर्भर है?

क्या भारत में तुलसी अकेली बच्ची है जो पढ़ना चाहती है? भारत में अब भी करोड़ों बच्चे स्कूल से बाहर हैं। उनके लिए अगर कोई दान नहीं देगा तो वे स्कूल नहीं जाएंगे? क्या भारत में कोई सरकार नहीं है?

केंद्र से लेकर राज्यों तक दिन भर भाषण देने वाले नेता कहाँ मर गए हैं? क्या भारत का भविष्य अब कुछ पूंजीपतियों के दान से तय होगा? क्या भारत के करोड़ों बच्चों को दान नहीं मिलेगा तो उनकी पढ़ाई नहीं होगी?

यह स्थिति बेहद खतरनाक है। भारत में एक जवाबदेह सरकार की जरूरत है जो कम से कम लोगों के बारे में सोचे! भारत की करोड़ों की आबादी सियासी तौर पर अनाथ है। भारत बेहद निकृष्ट नेताओं के चंगुल में फंस चुका है।

क्या झारखंड से लेकर दिल्ली तक ऐसे करोड़ों बच्चों की जिम्मेदारी लेने वाला कोई तंत्र बचा है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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