विकट महामारी के दौरान मोदी सरकार के रवैया पर सवाल खड़ा कर गया टॉप वायरोलॉजिस्ट डॉ. शाहिद जमील का इस्तीफा

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केन्द्र सरकार द्वारा जीनोम सीक्वेंसिंग को लेकर पिछले साल दिसंबर में बनाई गई Indian SARS-CoV-2 Consortium on Genomics (INSACOG) नामक कमेटी के हेड डॉ. शाहिद जमील ने कोरोना प्रबंधन को लेकर मोदी सरकार के लचर, अवैज्ञानिक और जिद्दी रवैया पर कई सवाल उठाए हैं।

● आलोक शुक्ल

भारत जिस वक्त कोरोना की दूसरी लहर का सामना कर रहा है, ऐसे मुश्किल वक्त में केंद्र सरकार द्वारा गठित वैज्ञानिक सलाहकार समिति के प्रमुख डॉ. शाहिद जमील ने इस्तीफा दे दिया। INSACOG वही संस्था है, जिसने केंद्र सरकार को मार्च में कोरोना के कहर को लेकर चेताया था, लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया गया। विकट महामारी के दौरान टॉप वायरोलॉजिस्ट का अपने पद से इस्तीफा देना सामान्य घटना नहीं है।

मोदी सरकार के सात वर्षों के अब तक के कार्यकाल में अहम पदों पर बैठे तमाम लोग निराश होकर अपना पद छोड़ रहे हैं। अरविंद पनगढ़िया से लेकर डॉ शाहिद जमील तक काफी लंबी लिस्ट है। भारत में हर विशेषज्ञ का यही हाल होता है।

एक समय नोटबंदी के प्रबल समर्थक रहे उर्जित पटेल आरबीआई बोर्ड की अहम मीटिंग के पहले ही पद छोड़कर भाग गए थे। पटेल के बाद आरबीआई के डिप्टी गवर्नर पद से विरल आचार्य ने भी इस्तीफा दे दिया। उसी दौरान अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद से इस्तीफा दे दिया। सुरजीत भल्ला नोटबंदी और अन्य आर्थिक फैसलों के समर्थक थे। इनका इन पदों से इस्तीफा देना ऐतिहासिक घटना थी। इसी तरह अरविंद सुब्रह्मण्यम ने भी मुख्य आर्थिक सलाहकार पद से और अरविंद पनगढ़िया ने नीति अयोग के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के भी दो सदस्यों ने सरकार के फर्जीवाड़े से तंग आकर इस्तीफा दे चुके हैं।

डॉ जमील ने कुछ दिन पहले ही कोरोना महामारी से निपटने के सरकारी तौर तरीके पर सवाल उठाए थे। उनके नेतृत्व वाले विशेषज्ञों के इस ग्रुप ने मार्च के शुरू में ही चेताया था कि कोरोना का एक नया वैरिएंट देश में तेजी से फैल रहा है, लेकिन सरकार ने ध्यान नहीं दिया। कोई उपाय तो दूर की बात है। सरकार की प्राथमिकता थी चुनाव। पूरी सरकार को एक हारी हुई बाजी में झोंक दिया गया।
कई लेख में उठाए थे सवाल :

हाल में डॉ जमील ने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख लिखकर कहा था कि भारत में वैज्ञानिकों को ‘साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण के लिए जिद्दी प्रतिक्रिया’ का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने मोदी सरकार को भी सलाह दी थी कि उनको वैज्ञानिकों की बात सुननी चाहिए और पॉलिसी बनाने में जिद्दी रवैया छोड़ना चाहिए।

अपना पद छोड़ने से एक हफ्ते पहले ही डॉ. जमील ने न्यूयॉर्क टाइम्स में भारत में जारी कोरोना की दूसरी लहर पर एक लेख लिखा था। जिसमेे उन्होंने कई मुद्दों पर बात की थी। उन्होंने कहा था कि कोरोना को लेकर उनके साथी वैज्ञानिकों द्वारा जो सवाल खड़े किए गए, उसमें उन्हें साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने टेस्टिंग और आइसोलेशन बढ़ाने, और ज्यादा अस्थायी सुविधाएं बनाकर हॉस्पिटल बेड्स की संख्या में बढ़ोतरी करने, अहम दवाओं और ऑक्सीजन के लिए सप्लाई चेन को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया था।

भारत के कोविड मैनेजमेंट में कई समस्याए हैं। इनमें कम टेस्टिंग, धीमी रफ्तार से वैक्सीनेशन और वैक्सीन की कमी शामिल है। इसके अलावा हेल्थकेयर वर्क फोर्स भी काफी ज्यादा चाहिए।

डॉ. शाहिद जमील

इसमें लिखा गया कि 30 अप्रैल को करीब 800 वैज्ञानिकों ने प्रधानमंत्री से अपील की थी कि उन्हें डाटा उपलब्ध करवाया जाए ताकि वो वायरस के बारे में अंदाजा लगाने और उसे रोकने के लिए स्टडी कर सकें।

इसके अलावा डॉ. जमील ने कोरोना की दूसरी लहर के बीच सरकार के रवैये पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था कि संकट के वक्त में जो भी नीति बननी चाहिए, वह तथ्यों को साथ लेकर बननी चाहिए उसके अलावा कुछ नहीं किया जाना चाहिए।

डॉ. शाहिद जमील के मुताबिक, किसी भी तरह की नीति बनाने के लिए विज्ञान का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। हालांकि, मैं जानता हूं कि मेरी पहुंच कहां खत्म होती है. बतौर वैज्ञानिक हम तथ्य ही दे सकते हैं, फैसला लेना सरकार का काम है।

डाटा के आधार पर फैसला न लेना एक और आपदा है, क्योंकि भारत में महामारी नियंत्रण से बाहर हो गई है। हम जो जानें गंवा रहे हैं, वो कभी न मिटने वाला जख्म का निशान दे जाएगी।

डॉ. शाहिद जमील

अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस के एक हालिया कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि सरकारी अथॉरिटीज ने समय से पहले यह मानकर गलती की थी कि जनवरी में महामारी खत्म हो गई।

जमील ने ऑक्सीजन सप्लाई के प्रबंधन के लिए एक टास्क फोर्स नियुक्त करने के सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले को भी दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा था, ”हमारे पास डॉक्टरों की कमी है और हमने अपने कुछ बेहतरीन डॉक्टरों से ऑक्सीजन-ऑक्सीजन खेलने के लिए कहा है…ये अच्छे डॉक्टर दवा के बारे में तो जानते हैं, लेकिन ऑक्सीजन सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स के बारे में क्या जानते हैं?”

मार्च में ही सरकार को चेताया था

रॉयटर्स ने एक रिपोर्ट में बताया था कि डॉ. जमील ने मार्च में ही चेतावनी दे दी थी कि भारत में नया और ज्यादा संक्रामक वायरस फैल रहा है। इस B.1.617 वैरिएंट की वजह से ही देश कोरोना की सबसे बुरी लहर से गुजर रहा है। जब न्यूज एजेंसी ने सवाल किया कि सरकार इन तथ्यों पर ज्यादा तेजी से काम क्यों नहीं कर रही है, इस पर डॉ. जमील ने कहा था कि हमें यह चिंता है कि अधिकारियों ने पॉलिसी सेट कर ली है और इसी के चलते वो सबूतों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।

बहरहाल, डॉ. जमील अपने इस्तीफे की कोई वजह बताने से भले ही इनकार कर रहे हों लेकिन इस इस्तीफे ने मोदी सरकार की कार्यशैली को लेकर सवाल जरुर खड़े कर दिये हैं। सरकार की ओर से नियुक्त इतनी संख्या में विशेषज्ञ अपना पद छोड़ें, यह इससे पहले कभी नहीं हुआ। ऐसा इसलिए हो रहा है कि यह एक अक्षम और अयोग्य सरकार है जो जिद्दी और अपनी प्रवृत्ति से मूर्ख भी है। हाल ही में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का बयान देखें तो वे भी सरकार के रवैये से हैरान हैं।

किस ग्रुप के हेड थे डॉ. जमील?

पिछले साल दिसंबर में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जीनोम सीक्वेंसिंग को लेकर देश की दस बड़ी लैब्स को शामिल कर Indian SARS-CoV-2 Consortium on Genomics (INSACOG) नामक एक कमेटी बनाई गई। कमेटी का काम कोरोना के नए वैरियंट को लेकर रिसर्च करना और जीनोम सीक्वेंसिंग से उनके बारे में पता लगाना है।

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