एक खिलते देश का राख के ढेर की ओर बढ़ता हुआ कदम!

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नफरत और धर्म के आडंबरों की जाहिलियत आपको सत्ता तक तो पहुंचा सकती है लेकिन यह वह आग है जो खुद को लगा जाया करती है। आप आसपास देखिए, बिक चुके न्यूज़ चैनलों और अखबारों को हटाकर देखिए कि कैसे आपको आपके ही हवाले कर दिया गया है।‌

● पवन सिंह

चलिए चलते हैं महाभारत की ओर। पांडवों ने महाभारत का युद्ध जीत लिया। विजयोपरांत आह्लादित पांडवों में से युधिष्ठिर ने कहा चलो अपना विजयी राज्य देखकर आते हैं।‌ पांडवों की “टीम इलेवन” ने रथों की व्यवस्था की। राज्य घूमते-घूमते शाम ढल गई। जंगल दिखे, पहाड़ दिखे, पशु पक्षी दिखे, नदियां दिखीं, मंदिर दिखे, झरने दिखे, लेकिन इंसान नहीं दिखे।

पांडव राजधानी की ओर लौटने लगे। अचानक दूर एक झोपड़ी से रौशनी आती दिखी। युधिष्ठिर ने अपने “ब्यूरोक्रेट सारथी” से कहा कि चलो रथ उस ओर ले चलो।‌ युधिष्ठिर का रथ झोपड़ी के सामने रूका।

पांडव झोपड़ी के सामने उतरे ही थे कि झोपड़ी से कराहती आवाज आई- आओ महाराजाधिराज युधिष्ठिर आपका स्वागत है….!

युधिष्ठिर झोपड़ी के भीतर पहुंचे और उस वृद्ध से पूछा कि उसे कैसे पता कि मैं आया हूं।

वृद्ध ने कहा- “युद्ध में तो सारी प्रजा मारी गई। युवा युद्ध लड़ते हुए और औरतें वियोग में बच्चे भूख से मर गये। इक्का-दुक्का हम जैसे वृद्ध बचे हैं वो भी मर जाएंगे।” वृद्ध ने कांपती आवाज में पूछा- “किस पर शासन करिएगा महाराज युधिष्ठिर? पहाड़ों पर, जंगलों और झीलों पर, नदियों व समुद्र पर? राष्ट्र तो लोगों से बनता है और लोग अब शेष नहीं हैं। ईश्वर भी मंदिरों में उदास बैठा है क्योंकि उसकी भी पूजा करने वाले गायब हैं।”

वृद्ध के सवाल सुन युधिष्ठिर सन्न रह गए। उनकी आवाज गुम हो गई थी। वे कहीं खो से गए थे। उनका अब सत्य से साक्षात्कार हो चुका था।

इस कहानी का संदर्भ वर्तमान से है। शासकों से भी और आवाम से भी। दोनों को समझने की जरूरत है कि नफरत और धर्म के आडंबरों की जाहिलियत आपको सत्ता तक तो पहुंचा सकती है लेकिन यह वह आग है जो खुद को लगा जाया करती है।

भारत की आवाम ने हुक्मरानों से अपने लिए सवाल पूछने बंद कर दिए। आवाम धर्म की अफीम चांट कर यह भूल गई कि सत्ता की वह गुलाम नहीं है बल्कि सत्ता उसकी गुलाम है। नफरत और धर्म की अफीम चांट कर बैठी जनता की आंखें अक्सर तब तक बंद रहती हैं जब तक मुल्क और आवाम दोनों ही राख के ढेर तक नहीं पहुंच जातीं।

आज चारों ओर लाशों के ढेर हैं। और इन लाशों में हजारों लाशें उनकी भी हैं जो धर्म व फर्जी राष्ट्रवाद की कुलांचे मारकर फुदक रहे थे। जब लोगों को रोटी, रोज़गार, अस्पताल, शिक्षा की जरूरत थी, हुक्मरान आपको नदी नहलवाकर आपके ऊपर हैलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा करके आपको मोक्ष पथ पर भेज रहे थे। घाटों पर दीप जलवा रहे थे। लोगों का माइंडवाश किया गया।

असल ईश्वर तो जंगल व पहाड़ हैं जिन्हें उद्योगपतियों के हवाले किया जा रहा है। ये नहीं रहेंगे तो कहां से लाएंगे आक्सीजन और नदियां? इस देश की आधी से अधिक आबादी नदियों के किनारे है। नदियां खत्म तो सभ्यता खत्म। फिर कहां नहा कर मोक्ष प्राप्त करेंगे साहेब?

हमारे चित्रकूट के एक पत्रकार साथी ने बताया कि मंदाकिनी इस बार एक महीने पहले ही सूख गई। आज ही एक रिपोर्ट पढ़ रहा था कि ग्लेशियरों के टूटने और पिघलने की रफ्तार दोगुनी हुई है और समुद्र अपना व्यवहार बदल रहे हैं। न जाने कितने देश समुद्र में समां जाए़ंगे। ये मंदिर, ये मस्जिद, ये गिरिजा घर, जिनके लिए इतने कत्ल-ए-आम हुए, जिसमें मूर्तियां बैठाईं है, जहां से आप ईश्वर को आवाज देते‌ हैं, सोचिएगा वक्त मिले जब आप ही नहीं होंगे तो आवाज कौन देगा? आप आसपास देखिए, बिक चुके न्यूज़ चैनलों और अखबारों को हटाकर देखिए कि कैसे आपको आपके ही हवाले कर दिया गया है।‌

तमाम जगहों से ये खबरें आ रही हैं कि कैसे धर्म-जाति से बाहर आकर लोग एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं। कब्रिस्तान जाने वाले लोग लाशों को लेकर शमशान आ रहे हैं। लकड़ी ला रहे हैं। ख़बरें हैं कि किसी ने अपनी छोटी मोटी आक्सीजन फैक्ट्री लोगों के लिए खोल दी। ऐसे में सब एक दूसरे को थामें हुए हैं। दरअसल यही धर्म है और इसी ताकत से कोई मुल्क एक मुल्क बनता है।

देश की अर्थव्यवस्था रोज ब रोज नष्ट हो रही है। एक बड़ी आर्थिक सुनामी की ओर हम सब बढ़ रहे हैं। अभी-अभी खबर मिली आजतक के ऐंकर रोहित सरधाना नहीं रहे। कोरोनावायरस का शिकार हुए। इशारा साफ है नेचर जब अपने निर्णय सुनाती है तो वो फर्क नहीं करती कि आप क्या हो? आपने गलती की तो सजा मिलनी तय है क्योंकि नेचर की डिक्शनरी में क्षमा नाम का कोई शब्द नहीं है।

याद है कलिंग युद्ध… इसमें कलिंग के लगभग 150,000 योद्धा और 100,000 मौर्य योद्धा मारे गए। इतना रक्तपात देखकर अशोक ने अपने सैन्य आक्रमणों को समाप्त कर दिया और मौर्य साम्राज्य की क्षेत्रीय विकास नीति को पूरी तरह से रोक दिया। अशोक ने 40 से अधिक वर्षों तक शांति, सद्भाव और संपन्नता के साथ अपने साम्राज्य पर शासन किया। लेकिन वर्तमान में एक शासक उससे ज्यादा मौतें देखने के बाद भी सत्ता प्राप्ति में व्यस्त है।

कभी सोचिएगा कि आपने क्या चुना है। आपका यह रहनुमा अपनी निजी छवि के लिए विदेश को 9301 मीट्रिक टन ऑक्सीजन, 11 लाख रेमडेसीवीर, 6 करोड़ 63 लाख वैक्सीन दे देता है और खुद के देश को श्मशान बना जाता है।

हम विनाश के एक ऐसे रास्ते पर हैं जहां इस देश की एकता और इसकी संप्रभुता पर खतरा है। केवल इशारा करूंगा। दक्षिण के संपन्न राज्य और नार्थ ईस्ट के राज्य चंद जाहिल हिंदी भाषी राज्यों के साथ मिलकर रहने से इंकार कर दें? सेना के रिटायर्ड अफसरों के ट्विट देखिए। सैनिक हमारे अपने उन घरों से हैं जिनके बाबा पिता किसान हैं और वो….. इससे ज्यादा नहीं लिखूंगा।

इशारा काफी है कि क्या म्यांमार दिखेगा या वैनेजुएला या चीनी शहर के थियानमेन चौक पर जून, 1989 का नजारा। जहां लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों पर चीनी सेना की कार्रवाई में कम से कम 10,000 आम लोग मारे गए थे। या गोर्बाचोव वाला रूस…. आगे आप समझदार हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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