भाजपा बताये- “मुम्बई के परमवीर सिंह की चिट्ठी, चिट्ठी है तो यूपी वाले वैभव कृष्ण की चिट्ठी क्या है?”

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मुम्बई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह की चिट्ठी पर इन दिनों खूब बावेला मचा है। बीजेपी महाराष्ट्र के गृहमंत्री को हटाने और उच्च स्तरीय जांच की मांग कर रही है। पर कुछ महीने पहले यूपी के एक एसएसपी की ऐसी ही चिट्ठी पर जांच करने की बजाय उस अधिकारी को ही हटा दिया गया। सवाल है कि मुम्बई में पुलिस कमिश्नर की चिट्ठी पर चिल्लाने रही बीजेपी की यूपी के मामले में घिग्घी क्यों बँध जाती है?

● आलोक शुक्ल 

यह चिट्ठिनामा भी अजब है। खबर है कि मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह (मौजूदा डीजी होमगार्ड) ने मुख्यमंत्री को एक चिट्ठी लिख कर बताया है कि महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख इंस्पेक्टर सचिन वाज़े के माध्यम से हफ्ता वसूली कराते थे। चिट्ठी में हफ्ता वसूली का रेट भी दिया गया है। कुल 100 करोड़ का टारगेट रखा गया है और उसके वसूलने के तऱीके भी बताए गए हैं। इंस्पेक्टर सचिन वाज़े मुकेश अम्बानी के आवास, एंटीलिया के सामने जिलेटिन भरे विस्फोटक केस में बतौर संदिग्ध मुल्जिम सामने आए हैं, और जेरे तफ्तीश हैं।

हालांकि पत्र भेजने के तरीके, उस पर हस्ताक्षर और टाइमिंग को लेकर भी कुछ संदेह उठाये जा रहे हैं, पर फिलहाल उन तकनीकी बारीकियों में न भी जायें तो उसमें लिखी बातें उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती हैं।

सवालों के घेरे में परमवीर?

किसी गृहमंत्री द्वारा वसूली का दायित्व सौंपना, मांझी नाव डुबाये जैसा ही है। यह एक बेहद गम्भीर आरोप है। और जब यह आरोप एक डीजी स्तर का पुलिस अफसर लगाए तो यह और भी गम्भीर हो जाता है। पर इस आरोप की सच्चाई या इसमें किसी साजिश के होने अथवा यह कि यह एक व्हिसिलब्लोअर की व्हिसिल है, यह तो पूरे घटनाक्रम की जांच के बाद ही पता चल सकेगा। लेकिन चिट्ठी की टाइमिंग कई सारे सवाल भी खड़ा करती है।

परमवीर सिंह (फोटो साभार – विकिपिडिया)

सवाल उठता है कि इस तथ्य की जानकारी परमवीर सिंह को कब हुयी थी? क्या उन्हें इस बात की जानकारी कमिश्नर के पद से हटाए जाने के पहले हो गयी थी या यह सब पता बाद में चला? यदि कमिश्नर के पद पर रहते हो गयी थी तो उन्होंने उसी वक्त सचिन वाज़े के खिलाफ कोई कार्यवाही क्यों नही की? और यह बात उन्होंने मुख्यमंत्री, डीजी महाराष्ट्र एवं मुख्य सचिव की जानकारी में क्यों नही लायी? यदि वे किसी दबाव में वाजे के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पा रहे थे तो उन्होंने इस तथ्य की जानकारी होते ही खुद को कमिश्नर पुलिस के दायित्व से मुक्त क्यों नहीं कर लिया?

यहां ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि किसी राज्य या शहर का पुलिस विभाग का मुखिया गृहमंत्री का विश्वासपात्र हो या न हो पर वह मुख्यमंत्री का भरोसेमंद अफसर ज़रूर होता है।

पुलिस पर वसूली का आरोप नया नहीं है

पुलिस द्वारा अवैध वसूली का आरोप नया नहीं है और यह लगभग हर जगह हर पुलिस बल में समान रूप से संक्रमित है। लेकिन यह भी सच है कि कहीं कहीं वरिष्ठ पुलिस अफसरों का संरक्षण भी इस अवैध कृत्य में रहता है तो कहीं कहीं वरिष्ठ अफसर सख्ती कर के इसे रोकने की कोशिश भी करते हैं। पर यह व्याधि निर्मूल नष्ट हो जाय यह सम्भव नहीं है।

पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। इस भ्रष्टाचार को यह कह कर जस्टिफाई भी नहीं किया जाना चाहिए कि भ्रष्टाचार सभी जगहों पर है। पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार को अन्य विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार से अधिक गम्भीरता से लेना चाहिए, क्योंकि पुलिस के पास भ्रष्टाचार रोकने, रिश्वत लेने देने के आरोप में कार्यवाही करने की वैधानिक शक्तियां प्राप्त हैं।

एक जैसी दो चिट्ठियों में बीजेपी का अलग-अलग मानदंड

बीजेपी इस चिट्ठी को लेकर महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी सरकार पर हमलावर है। वह गृह मंत्री को हटाने, इसकी उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग कर रही है और ऐसा करते हुए बीजेपी के निशाने पर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ही हैं।

विपक्ष में होने के नाते बीजेपी को यह करना भी चाहिए। लेकिन एक राजनीतिक दल होने और केंद्र व कई राज्यों में सरकार चलाने के नाते बीजेपी को यह भी बताना चाहिए कि बिल्कुल एक जैसे मामलों में वह दो मानदंड कैसे अपना सकती है? बीजेपी को इस सवाल का जवाब भी देना ही होगा कि यदि महाराष्ट्र में परमवीर सिंह की चिट्ठी पर कार्रवाई हो तो बीजेपी के शासन वाले राज्य यूपी में कुछ महीने पहले एक तत्कालीन एसएसपी द्वारा लिखी गयी बिल्कुल ऐसी ही चिट्ठी पर कार्यवाई क्यों नहीं हुई?

यूपी के आईपीएस अफसर की चिट्ठी

अब एक और चिट्ठी की बात। परमवीर सिंह की चिट्ठी पर उठे बवाल के साथ ही यूपी की ऐसी ही एक चिट्ठी की बात भी होनी चाहिए। यह चिट्ठी उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के एसएसपी वैभव कृष्ण ने लिखी थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को सम्बोधित उस चिट्ठी में राज्य के 5 वरिष्ठ पुलिस अफसरों पर संगठित तौर पर भ्रष्टाचार करने की तफसील में जानकारी दी गयी थी।

वैभव कृष्ण, आईपीएस, यूपी

वैभव कृष्ण ने अपनी चिट्ठी में बीजेपी सरकार में चल रहे ‘ट्रांसफर-पोस्टिंग रैकेट’ का खुलासा किया था। पर उस चिट्ठी पर कोई जांच हुयी या नहीं यह तो नहीं पता, पर उस चिट्ठी के बाद वैभव कृष्ण को सजा जरुर मिल गई। उन्हें गौतम बुद्ध नगर के एसएसपी के पद से हटा कर सस्पेंड कर दिया गया।

वैभव कृष्ण की चिट्ठी में ‘पुलिस पोस्टिंग रैकेट’ का खुलासा

नोएडा के तत्कालीन एसएसपी वैभव कृष्ण ने वर्ष 2019 के अंत में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गोपनीय चिट्ठी लिखकर एक बड़े पुलिस पोस्टिंग रैकेट की सूचना दी थी। वैभव कृष्ण ने अपनी इस चिट्ठी का खुलासा जनवरी 2020 में तब किया जब कथित तौर पर पोस्टिंग रैकेट में शामिल लोगों ने उनका एक अश्लील ‘मॉर्फ्ड वीडियो’ वायरल किया।

चिट्ठी के मुताबिक सूबे के 5 आईपीएस अफसर, कुछ ताकतवर नेता और पत्रकार मिलकर इस रैकेट को चलाते हैं और राज्य में जिला कप्तान की पोस्ट के लिए 50 लाख से 80 लाख रुपये तक की रिश्वत चलती है।

फोन रिकॉर्डिंग का खुलासा

यूपी के डीजीपी और सीएम के प्रधान सचिव के नाम लिखे गए इस खत में 5 आईपीएस अफसरों की मोबाइल फोन रिकॉर्डिंग का खुलासा किया गया था। चिट्ठी के मुताबिक डील का खुलासा अगस्त, 2019 में नोएडा से गिरफ्तार 4 लोगों के केस की तफ्तीश के दौरान पुलिस की साइबर टीम द्वारा कई फोन कॉल्स और मैसेज की जांच से हुयी। चिट्ठी में एसएसपी मेरठ की पोस्टिंग के लिए एक आईपीएस अफसर और एक पावर-ब्रोकर के बीच व्हाट्सएप मैसेज के आदान-प्रदान का जिक्र है, जो 80 लाख रुपये की घूस को लेकर थी।

चिट्टी में कई और जिलों में पोस्टिंग के लिए पेश की गई घूस की जानकारी भी है। इसके मुताबिक यूपी काडर के एक दूसरे पुलिस अफसर ने लाखों रुपयों की पेशकश की। उन्होंने लिखा कि एसएसपी आगरा के पद के लिए 50 लाख रुपये, एसएसपी बरेली के पद के लिए 40 लाख रुपये, एसपी बिजनौर के पद के लिए 30 लाख रुपये का रेट है।

बीजेपी बताए, यूपी वाली चिट्ठी मुम्बई वाली से अलग कैसे ?

वैभव ने यह पत्र पद पर रहते हुए लिखा था जबकि परमवीर सिंह ने पद से हटाने के बाद। ऐसे में परमवीर को व्हिसिलब्लोअर माना जाए या पद से हटने के बाद की नाराजगी, कि ‘मैं सब पोल खोल दूंगा’ जैसा भाव या उनकी चिढ़?

हालांकि परमवीर और वैभव की चिट्ठियों की टाइमिंग, आरोपों और परिस्थितियों में अंतर है लेकिन इन तमाम अंतर के बाद भी दोनों में एक समानता है। दोनों ही चिट्ठियां सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती हैं। ऐसे में खुद को नैतिकता और इमानदारी का अलमबरदार घोषित करने वाली बीजेपी दोनों के लिए अलग-अलग रवैया कैसे अख्तियार कर सकती है। यह कैसे हो सकता है कि जहां विरोधी दल की सरकार है वहां सरकार पर लगे आरोपों पर सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए और जहां बीजेपी की सरकार है वहां आरोप लगाने वाले को ही सजा दे दी जाए।

महाराष्ट्र सरकार को परमवीर सिंह के लगाए आरोपों की उच्च स्तरीय जांच जरुर करानी चाहिए, लेकिन बीजेपी जब ये मांग करती है तो उसे सबसे पहले अपने यूपी सरकार को भी वैभव कृष्ण के पत्र पर ऐसी ही जांच बैठाने को कहना चाहिए।

जहां तक राजनेताओं का प्रश्न है तो अनिल देशमुख अकेले राजनेता नहीं हैं जिनपर ऐसा आरोप लगा है। बल्कि कुछेक अपवादों को छोड़ दिया जाए तो इस पंक में सभी राजनेता सने हुए हैं।

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