‘सरकार गोदाम में अनाज रखे या न रखे अडानी को करना होगा भुगतान’ टिप्पणी को हटाने का कैग पर दबाव

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हरियाणा के कैथल में बने अडानी समूह के गोदाम में वर्ष 2013-14 से 2015-16 तक क्षमता से कम गेहूं रखने के बावजूद सरकार ने पूरे गोदाम का किराया भरा, जिसे लेकर कैग ने वर्ष 2018 में अपनी रिपोर्ट में टिप्पणी लिखी। अब ‘द वायर’ ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि मोदी सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, जिसके अधीन एफसीआई आता है, ने कैग को पत्र लिखकर मांग की है कि इस पैराग्राफ को रिपोर्ट से हटाया जाना चाहिए। लेकिन कैग ने कहा है कि ये पैराग्राफ हटाया नहीं जा सकता है और उनका आकलन सही है।

● पूर्वा स्टार ब्यूरो 

क्या आप जानते हैं कि वर्ष 2018 में कैग ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि 2013-14 से 2015-16 के बीच एफसीआई ने हरियाणा के कैथल में अडानी समूह के गोदाम में इसकी क्षमता के अनुसार गेहूं नहीं रखा और खाली जगह का किराया भरते रहे जिसके परिणामस्वरूप 6.49 करोड़ रुपये का अनावश्यक खर्च हुआ है। मोदी सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, जिसके अधीन एफसीआई आता है, ने कैग को पत्र लिखकर मांग की है कि इस पैराग्राफ को रिपोर्ट से हटाया जाना चाहिए। लेकिन कैग ने कहा है कि ये पैराग्राफ हटाया नहीं जा सकता है और उनका आकलन सही है। यह सनसनीखेज खुलासा ‘द वायर’ ने अपनी रिपोर्ट में किया है।

आरोप है कि उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की उस रिपोर्ट में संशोधन कराने की कोशिश कर रही है, जिसमें कैग ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को फटकार लगाते हुए कहा था कि हरियाणा के कैथल स्थित अडानी साइलो में स्वीकृत मात्रा में अनाज न रखने के चलते करदाताओं का 6.49 करोड़ रुपये का बेजा खर्च हुआ है। मंत्रालय ने दावा किया है कि जिस आधार पर इस अतिरिक्त खर्च का आकलन किया गया है, वो सही नहीं है। हालांकि कैग ने इन दलीलों को खारिज करते हुए ऐसा करने से इनकार कर दिया है।

‘द वायर’ द्वारा सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्राप्त किए गए 88 पेज के आंतरिक दस्तावेजों से ये जानकारी सामने आई हैं।

इन फाइलों में शामिल कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि 2013-14 से 2015-16 के बीच उस स्टोरेज क्षमता के लिए भी अडानी कंपनी को 24.28 करोड़ का भुगतान किया गया, जिसका एफसीआई ने कभी इस्तेमाल ही नहीं किया था।इस दौरान 11 महीनों में अडानी साइलो में कुल 5.18 लाख टन जगह खाली पड़ी रही, लेकिन एफसीआई ने इसमें गेहूं नहीं रखा और वे खाली जगह का किराया भरते रहे थे।

भारतीय खाद्य निगम हर साल अपनी एवं राज्य सरकार तथा इसकी एजेंसियों द्वारा गेहूं की खरीद करता है। राज्य की एजेंसियां खरीद सीजन बीतने के बाद सारा स्टॉक एफसीआई को हैंड ओवर कर देती हैं। यदि अनाज रखने के लिए एफसीआई के पास जगह नहीं बचती है तो राज्य सरकार और इसकी एजेंसियां अपने साइलो या गोदाम में गेहूं रखती हैं, जिसके बदले में एफसीआई भारत सरकार द्वारा तय की गई राशि का भुगतान करता है।

इसी सिलसिले में साल 2007 में एफसीआई ने हरियाणा के कैथल में अडानी एग्रो लॉजिस्टिक लिमिटेड के साइलो में दो लाख टन गेहूं के भंडारण के लिए कॉन्ट्रैक्ट किया। इसके लिए फरवरी, 2013 में एक समझौता हुआ, जिसमें ये तय किया गया कि गेहूं रखने के लिए एफसीआई हर साल प्रति टन 1,842 रुपये की दर से कंपनी को भुगतान करेगा। बाद में सितंबर 2014 में इसे बढ़ाकर 2,033.40 रुपये प्रति टन प्रति वर्ष कर दिया गया।

एफसीआई और अडानी एग्रो लॉजिस्टिक लिमिटेड के बीच ये समझौता गारंटीड टनेज के आधार पर हुआ था। अर्थात यदि दो लाख टन गेहूं रखने के लिए के लिए कॉन्ट्रैक्ट हुआ है, तो हर साल पूरे दो लाख टन का भुगतान करना होगा, चाहे इससे जितना भी कम गेहूं रखा जाए।

इसे लेकर कैग ने साल 2018 की रिपोर्ट नंबर-4 में बताया था कि एफसीआई ने राज्य सरकार एवं इसकी एजेंसियों के गोदामों या साइलो में ही गेहूं रहने दिया और इसे अडानी साइलो में शिफ्ट नहीं किया गया, जिसके कारण एक तरफ अडानी साइलो में खाली जगह का भी भुगतान करना पड़ा और राज्य के गोदामों में गेहूं रखने से करदाताओं के 6.49 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च हुए, जिसे बचाया जा सकता था।

कैग ने कहा कि 2013-14 से 2015-16 के बीच कैथल साइलो कई बार खाली पड़ा रहा, 14 अप्रैल 2014 को यह 1.33 लाख टन (कॉन्ट्रैक्ट की तुलना में 67 फीसदी) खाली पड़ा रहा। जबकि पेहोवा, पुंडरी और पाई में राज्य के गोदामों में गेहूं पड़ा हुआ था।वर्ष 2013-14 के दौरान आठ महीने और साल 2014-15 के दौरान तीन महीने साइलो में क्षमता के मुकाबले गेहूं का स्टॉक कम था। कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राज्य सरकार एवं इसकी एजेंसियों के गोदामों की तुलना में साइलो में गेहूं रखना सस्ता होता है। इसलिए करदाताओं के पैसे बचाने के लिए ये करना जरूरी था।

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने 28 अक्तूबर 2018 को मंत्रालय ने पत्र लिखकर कहा कि कैग ने ये आकलन इस आधार पर किया है कि कैथल में अडानी साइलो को हर साल गारंटीड दो लाख टन का भुगतान किया गया है। जबकि एफसीआई ने गारंटीड टनेज की मात्रा 2013-14 में घटाकर 1.90 लाख टन, 2014-15 में 1.41 लाख टन और साल 2015-16 में 1.33 लाख टन कर दी थी। इसलिए अतिरिक्त भुगतान करने की बात सही नहीं है।

मंत्रालय ने कहा है कि ‘भंडारण क्षमता का पर्याप्त उपयोग का ये मतलब नहीं है कि हर समय इसकी पूरी क्षमता का इस्तेमाल किया जा सकेगा। कुछ जगह ज़रूर खाली होगी जब स्टॉक को यहां से निकाला जाता है। चूंकि गेहूं की खरीदी सिर्फ दो महीने के लिए होती है और स्टॉक निकालने का कार्य हर महीने होता है, इसलिए भंडारण क्षमता के इस्तेमाल में गिरावट अगले खरीदी सीजन तक जारी रहता है।’

मंत्रालय की इन दलीलों को खारिज करते हुए कैग ने 14 दिसंबर 2018 को दिए अपने जवाब में कहा कि एफसीआई के इस तर्क में कोई दम नहीं है कि उन्होंने घटे हुए गारंटीड टनेज के आधार पर भुगतान किया है क्योंकि साइलो की क्षमता दो लाख टन की थी और इतना गेहूं इसमें रखा जा सकता था।

कैग ने कहा है की अतिरिक्त खर्च का आकलन इस आधार पर किया गया है कि साइलो की कुल क्षमता, जो दो लाख टन थी, में से कितने टन का इस्तेमाल किया गया है। मैनेजमेंट की ये दलील सही है नहीं है कि उन्होंने 2013-14 के दौरान 1.90 लाख टन, 2014-15 में 1.41 लाख टन और 2015-16 में 1.33 लाख टन के लिए भुगतान किया है क्योंकि साइलो की क्षमता दो लाख टन की थी। यदि कुल क्षमता के बजाय गारंटीड टनेज के आधार पर भी अडानी साइलो में गेहूं की मात्रा को देखा जाए तो दस्तावेजों के मुताबिक वित्त वर्ष 2013-14 में आठ महीने- अप्रैल में 10,693 टन, सितंबर में 9,733 टन, अक्तूबर में 27,812 टन, नवंबर में 45,771 टन, दिसंबर में 67,001 टन, जनवरी में 90,887, फरवरी में 99,807 टन और मार्च में 1,17,951 टन जगह खाली पड़ी थी।

इसी तरह वित्त वर्ष 2014-15 में तीन महीने- जनवरी में 2,083, फरवरी में 17,355 और मार्च में 29,573 टन जगह खाली पड़ी थी। इस खाली जगह के लिए भी भारत सरकार ने 15.35 रुपये प्रति क्विंटल प्रति महीने की दर से अडानी एग्रो लॉजिस्टिक लिमिटेड के लिए भुगतान किया है। कैग ने कहा है कि ऑडिट में नुकसान का आकलन करते हुए स्टॉक को लेकर जाने में आने वाले खर्च को शामिल किया गया है। कैग ने कहा कि ये पैराग्राफ हटाया नहीं जा सकता है और उनका आकलन सही है।

दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि खुद भारतीय खाद्य निगम ने हरियाणा के अपने क्षेत्रीय कार्यालय को पत्र लिखकर कहा है कि खाद्यान्न भंडारण के लिए साइलो एक आधुनिक व्यवस्था हैं, जो नुकसान को कम करता है और खाद्यान्न की गुणवत्ता को बनाए रखता है। इसके बाद भी मंत्रालय ने पुरानी दलीलों को ही दोहराते हुए 18 फरवरी 2019 को एक और पत्र भेजा और कैग से इस आकलन को हटाने की मांग की।

कैग की फटकार के बाद मंत्रालय के अवर सचिव मदन मोहन मौर्या ने 18 फरवरी, 2019 को एफसीआई के चेयरमैन और महाप्रबंधक को पत्र लिखकर कहा कि वे कैथल स्थित अडानी साइलो को भरने के लिए सभी कदम उठाएं, क्योंकि ये भंडारण का आधुनिक तरीका है और इसमें कम नुकसान होता है।

कैग ने 26 फरवरी, 2019 को दिए अपने जवाब में एक बार फिर से कहा कि भले ही गारंटीड टनेज को कम कर दिया गया हो, लेकिन साइलो की भंडारण क्षमता दो लाख टन थी, इसलिए मंत्रालय की दलील सही नहीं है और ये पैराग्राफ नहीं हटाया जाएगा।इसके बाद भी मंत्रालय और एफसीआई के बीच पत्राचार होता रहा कि कैग का ये आकलन सही है या नहीं। पिछले साल 21 अप्रैल 2020 को मंत्रालय ने एक फिर पत्र लिखा, जिसके जवाब में एफसीआई ने छह दिसंबर, 2019 को भेजे अपने जवाब को दोहराया था।

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