गांधी के हर संघर्ष में उनकी सहभागी रहीं कस्तूरबा

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आज 22 फरवरी का दिन ‘बा’ की जयन्ती है। ‘बा’ यानी महात्मा गांधी की सहधर्मिणी कस्तूरबा गांधी। जिन्होंने गांधी जी का साथ हर परिस्थिति में जीवन पर्यन्त दिया। आजादी की लड़ाई रही हो या बापू द्वारा चलाए गए अछूतोद्धार अथवा दूसरे सामाजिक कार्यक्रम, ‘बा’ कभी पीछे नहीं रहीं। ‘बा’ को जयंती पर नमन।

● सतीश कुमार 

कस्तूरबा महात्मा गांधी की सहधर्मिणी थीं। यों कह सकते हैं कि एक आदर्श सहधर्मिणी थीं, क्योंकि उनका सहधर्म निर्वाह एकांगी नहीं, परिपूर्ण था। वह केवल निजी जीवन तक ही सीमित नहीं था, बल्कि सार्वजनिक जीवन के दायरे तक उसका सम्पूर्ण विस्तार था।

आमतौर पर यह धारणा ही नहीं है, व्यवहार में भी देखा जाता है कि हमारे समाज में स्त्रियों के दाम्पत्य का सहधर्म व्यवहार घर की चारदीवारी के दायरे में सिकुड़ा हुआ, जीवन के पारिवारिक सरोकारों तक संकुचित और पूजा-हवन अनुष्ठानादि तक की सहभागी भूमिकाओं की हद के भीतर ही सक्रिय नजर आता है। ठेठ शब्दों में कहें तो उसकी सीमा रेखा ‘चौका’ है और ‘चौकी’ तक उनकी पहुंच नहीं होती है।

गांधी के साथ ‘बा’ का दाम्पत्य जीवन सहधर्म व्यवहार निजी जीवन की ऐसी चारदीवारियों से आगे उनके सार्वजनिक जीवन तक विस्तारित था। गांधी का सार्वजनिक जीवन कठिन संघर्षों की राजनीति से जुड़ा था। कस्तूरबा उन संघर्षों की भी सहधर्मिणी थीं। इसके कत्तई यह मायने नहीं हैं कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी थी।

उन्हें न तो शोहरत की दरकार थी और न तो कांग्रेस का महासचिव वगैरह ही बनना था। उनका मतलब तो गांधी के जीवन के हर क्षेत्र में साथ निभाते हुये मुकम्मल रूप से जीवन की सहधर्मिणी की भूमिका निभाने से था।

यही कारण है कि कस्तूरबा पूर्ण अनासक्त भाव से सदा ही गांधी के साथ रहीं। पाणिग्रहण संस्कार से अपने अंतिम संस्कार तक अविकल रूप से साथ रहीं। बापू अफ्रीका रहे तो वहां भी गईं और हिन्दुस्तान लौटे तो यहां भी सतत साथ रहीं। 

वह चम्पारण सत्याग्रह हो या भारत छोड़ो आन्दोलन अथवा आश्रम के तपस्वी जीवन की साधना हो या जेल के कठिन बंदी जीवन की, कहीं तो ‘बा’ ने गांधी का साथ नहीं छोड़ा था। मृत्यु का आलिंगन भी किया, तब भी तो जेल जीवन में गांधी के साथ ही थीं। गांंधी की गोंद में सिर रखकर अंतिम सांस ली थी। 

आगा खां पैलेस जेल में गांधी बंदी थे, तो कस्तूरबा भी थीं जहां चंद महीने पहले गांधी के निजी सचिव महादेव देसाई का निधन हुआ था और उसके बाद कस्तूरबा का भी तिरोधान हुआ। गांधी के हर त्याग में ‘बा’ की पूरक भूमिका थी, गांधी के जीवन के हर संघर्ष में उनका सहभाग था।

(लेखक महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी में राजनीतिशास्त्र विभाग के अवकाश प्राप्त आचार्य और राजीव गांधी स्टडी सर्किल के राष्ट्रीय समन्वयक हैं।)

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