स्वातंत्र्य समर के अग्निनायक सुभाष चन्द्र बोस

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एक गुलाम, दहशतजदा कौम की धमनियों में लावा भरना असम्भव कार्य था जो सुभाष बाबू ने कर दिखाया। उस मैदान पर खड़े होने से भुरभुरी होती है। लगता है जैसे भारतवासी होना अन्तरराष्ट्रीय गौरव की बात है। 

● कनक तिवारी / कृष्ण कांत 

आज देश नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 125वीं जयंती मना रहा है। स्वाधीनता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान को यह देश धरती और अंबर के रहने तक भूल भी नहीं सकता। आईसीएस की नौकरी को लात मारकर जंगे आजादी में कूदे अग्निमय सुभाष चन्द्र बोस स्वाधीनता आंदोलन की कड़ियल छाती का लावा हैं। ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा‘ और ‘गुलामी के घी से आजादी की घास बेहतर है‘ जैसे पौरुषपूर्ण नारों के साथ सुभाष बाबू कांग्रेस के कथित क्लैव्य के सामने चुनौतीपूर्ण मुद्रा में खड़े होते हैं।

गुलाम भारत में तरुणाई ने यदि स्वतंत्रता आन्दोलन में कहीं मुकाम पाया था, तो वह मध्यप्रदेश की त्रिपुरी में 1939 में, जब इस सदाबहार नौजवान ने कांग्रेस अधिवेशन में पट्टाभि सीतारामैया को कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में मुकम्मिल तौर पर परास्त किया था। बीमार सुभाष को देखकर भी अच्छे अच्छे सूरमाओं को बुखार चढ़ जाता था।

बहुत से तीसमार खां दक्षिणपंथी या वामपंथी-सुभाष के मुकाबले बौने हैं। उनको लेकर आज की सरकारें बिछी जा रही हैं। लेकिन बीसवीं सदी का यह भूकम्प पारम्परिक इतिहासकारों और प्रतिबद्ध राजनेताओं की जड़ता को हिला नहीं पाया है। 

सुभाषबाबू की सबसे बड़ी देन गिरे टूटे भारतवासियों में पौरुष भरना था। देश की तरुणाई को उन्होंने मातृभूमि की बलिवेदी पर मर मिटने की हुंकार लगाई। लगा जैसे पुराणों के पन्नों में जान पड़ गई हो। जैसे हमारे विद्रोही संतों की आत्मा का स्वर उनके कंठ की पर्तों को चीरकर समा गया हो। जैसे दुर्गा सप्तशती की विद्रोहिणी भाषा बीसवीं शताब्दी का इतिहास बदल देने गरज उठी हो।

एक गुलाम, दहशतजदा कौम की धमनियों में तेजाब भरना लगभग असम्भव कार्य था जो सुभाष चन्द्र बोस ने कर दिखाया। उनका ‘दिल्ली चलो‘ का नारा आज भी ‘इन्कलाब जिन्दाबाद‘ के पूरक के रूप में गूंज रहा है। उनका यश हर भारतीय के लिए संचित निधि की तरह है जिसके ब्याज से ही पीढ़ियों का काम चलता रहेगा।

अरविन्द घोष के रहस्यवाद, नजरुल इस्लाम के धर्मनिरपेक्ष छंद, रवीन्द्र संगीत और विवेकानन्द के शौर्य के साथ सुभाष बोस की उपस्थिति बंगाल के जीवन का स्पन्दन है। गांधीजी से व्यापक असहमति के बावजूद आजाद हिन्द फौज में ‘गांधी ब्रिगेड‘ रखना नेताजी की उदारता थी। ‘नेताजी‘ एक जनवादी सम्बोधन है। वह एक बेहतर लोकतांत्रिक, संवैधानिक और जनपदीय अभिव्यक्ति है। महात्मा, सरदार, पंडितजी, देशरत्न, भारतकोकिला, मौलाना, देशबंधु, महामना, राजर्षि, लोकनायक, आचार्य, लोकमान्य जैसे बीसियों संबोधनों के मुकाबले ‘नेताजी‘ जैसा शब्द जनभाषा का सम्मान है।

उनकी संदेहास्पद स्थितियों में हुई मृत्यु को भी खूब भजाया गया। उन्हें मिथकों, रहस्यों और किंवदन्तियों का चरित्र बनाकर रखने से भारतीय पत्रकारिता भी सनसनी फैलाती रही लेकिन वह दृष्टि खो दी जो नेताजी के विचारों को संविधान, प्रशासन और राजनीति के लिए कारगर बनाती। इतिहास के चौखटे में राष्ट्रीय दृष्टि का विकास ही नहीं हो पाया।

एक गुलाम, दहशतजदा कौम की धमनियों में लावा भरना असम्भव कार्य था जो सुभाष बाबू ने कर दिखाया। उस मैदान पर खड़े होने से भुरभुरी होती है। लगता है जैसे भारतवासी होना अन्तरराष्ट्रीय गौरव की बात है। उनके अशेष साथी कर्नल गुरदयाल सिंह ढिल्लन और कैप्टेन लक्ष्मी सहगल का सम्मान समारोह जब मैंने आयोजित किया तो उनकी आंखों में सुभाषबाबू की की चमक दिखी थी।

ये नेताजी ही थे जिन्होंने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहा था। उन्हें राष्ट्रपिता किसी सरकार ने घोषि‍त नहीं किया था। आजाद हिंद फौज बनाकर अंग्रेजों पर धावा बोलने से पहले नेताजी ने आजाद हिंद रेडियो से देशवासियों को संबोधि‍त किया तो सबको उम्मीद थी कि वे गांधी की आलोचना करेंगे।

लेकिन सुभाष बाबू ने बोलना शुरू किया

‘भारत की आजादी की आखिरी लड़ाई शुरू हो चुकी है। आजाद हिंद फौज हिंदुस्तान की धरती पर लड़ रही है। सारी दिक्कतों के बावजूद आगे बढ़ रही है। ये हथियारबंद संघर्ष तब तक चलेगा जब तक कि ब्रिटिश राज को देश से उखाड़ नहीं देंगे। दिल्ली के वॉयसराय हाउस पर तिरंगा फहरेगा… राष्ट्रपिता, हिंदुस्तान की आजादी की लड़ाई में हम आपका आशीर्वाद मांगते हैं।’

इस संबोधन के बाद वहां मौजूद कई लोग भावुक हो गए। तमाम असहमतियों के बावजूद नेताजी ने घोषणा कर दी थी कि गांधी राष्ट्रपिता हैं और आजादी की लड़ाई के निर्विवाद नायक हैं।

आजाद हिंद फौज की पांच रेजिमेंट थीं-सुभाष ब्रि‍गेडगांधी ब्रि‍गेडआजाद ब्रि‍गेडनेहरू ब्रि‍गेडझांसी की रानी रेजिमेंट

लेकिन जैसे नेहरू-पटेल को एक-दूसरे के खि‍लाफ खड़ा किया जाता है, वैसे ही गांधी-सुभाष को एक-दूसरे के खि‍लाफ खड़ा किया जाता है। जिनको गांधी और नेहरू के नाम से ही उबकाई आ जाती है, वे नेताजी पर किस मुंह से दावा ठोंकते हैं?

सुभाष चन्द्र बोस इतिहास निर्माता थे। उनके योगदान को जांचने के लिए प्रगतिशील चश्मे की जरूरत नहीं है। सुभाष बाबू को दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों की काठी पर भी नहीं चढ़ाया जा सकता। इस महान जननायक में भारत ही भारत कुलबुलाता था। कम्युनिस्टों और हिन्दू महासभाइयों में कितने हैं जो आजाद हिन्द फौज और फारवर्ड ब्लाॅक में शामिल हुए?

(कनक तिवारी प्रख्यात गांधीवादी विचारक और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता
हैं और कृष्ण कांत वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख दोनों के फ़ेसबुक पेज से साभार)

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