उद्धव का धन्यवाद करना चाहिए, जिन्होंने अर्णव पर कार्रवाई करके पत्रकारिता को और कलंकित होने से बचा लिया

Read Time: 6 minutes

खुद ही पुलिस और जज बनकर सत्ता पक्ष व विपक्ष के तमाम राजनेताओं, खासकर कांग्रेस नेताओं का पुलिसिया अंदाज में इंट्रोगेशन करते और फैसला सुनाते सुनाते अर्णब ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे को भी निपटाने की सुपारी ले ली थी। लेकिन उद्धव ने बाजी पलट दी।

● आलोक शुक्ल 

स्वघोषित ‘राष्ट्रवादी’ पत्रकार और टीआरपी स्कैम के आरोपी अर्णब गोस्वामी के मामले में एक जूनियर या नौसिखिया कहे जा सकने वाले मुख्यमंत्री ने जो हिम्मत दिखाई है वह बड़े बड़े, जर्राट मुख्यमंत्री नहीं दिखा पाए। चाहे कोई मुख्यमंत्री हो, वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री, पत्रकार या मीडिया मालिक अथवा शासन-प्रशासन या न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा कोई नाम हो, किसी को भी कुछ नहीं समझने और चैनल पर बैठकर रोजाना सबकी लानत-मलामत करने वाले रिपब्लिक भारत टीवी के सम्पादक अर्णब गोस्वामी को उनकी औकात में ले आने के लिए जिस साहस की जरूरत है वह उद्धव ने ही दिखाई।

खुद ही पुलिस और जज बनकर सत्ता पक्ष व विपक्ष के तमाम राजनेताओं, खासकर कांग्रेस नेताओं का पुलिसिया अंदाज में इंट्रोगेशन करते और फैसला सुनाते सुनाते अर्णब ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे को भी निपटाने की सुपारी ले ली थी। लेकिन उद्धव ने बाजी पलट दी। चुप रहते हुए पूरी तरह कानूनी तरीके से। भारतीय पत्रकरिता के सबसे बड़े घोटाले टीआरपी रेटिंग के आरोप पत्र में महाराष्ट्र पुलिस ने सबूत के तौर पर 500 पन्नों से अधिक जो व्हाट्स चैट पेश किया है उसने इन दिनों मीडिया और केंद्र के मोदी सरकार की चूलें हिला रखी हैं।

अर्णब को टीवी पर बैठकर चिल्लाते जिन लोगों ने देखा है वे जानते हैं कि उसमें पत्रकारिता के कोई लक्षण नहीं हैं। जर्नलिज्म की एक गरिमा होती है पर वह इन सबसे बेपरवाह सबके लिए अपमानजनक टिप्पणियां, उपहास, अवहेलना का भाव लिए जब स्क्रीन पर अवतरित होता तब उसका चेहरा, उसकी भाव भंगिमा, उसकी चिल्लाहट उसके पत्रकार होने की गवाही तो नहीं ही देते हैं।

सबको देशभक्ति के सर्टिफिकेट बांटना और खुद सुरक्षाकर्मियों की शहादत में लाभ देखना! पत्रकारिता में ऐसा पाखंड, अहंकार, बदजुबानी पहले कभी नहीं देखी गयी। 

अर्णब गोस्वामी और पार्थों दास गुप्ता (टीआरपी का निर्धारण करने वाली संस्था बार्क के चीफ) के बीच होने वाली दलाली की व्हाट्सएप चैट लीक होने से मीडिया में भूकंप आ गया। भले ही अभी कोई बोले या न बोले मगर सच ये है कि सारे मीडिया दिग्गज इस समय हिले हुए हैं। जिस टीआरपी की दम पर पूरा टीवी बिजनेस खड़ा है उसे अर्णब कैसे मैनेज करता था और उन लोगों के बारे में क्या क्या बोलता था यह देखकर मीडिया महारथी स्तब्ध हैं।

ऐसा नहीं है कि अर्णब ने सिर्फ नेताओं को ही शिकार बनाया है। उसने समय समय पर मीडिया के कई दिग्गजों को भी शिकार किया। मीडिया भी दूसरे क्षेत्रों से अलग नहीं है। यहां भी एक दूसरे की टांग खिंचाई, आलोचना, प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। लेकिन यह सब एक मर्यादा में रहकर ही होता रहा है। होना भी चाहिए। मगर अर्णब ने सारी हदें पार कर दी। सीनियर लोगों का व्यक्तिगत अपमान जैसा अर्णब ने किया है वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। 

सिवाय अपने किसी को कुछ नहीं समझने वाला अर्णब अरुण पुरी, समीर जैन, रजत शर्मा राजदीप सरदेसाई, सागरिका घोष और नविका कुमार पर निर्णयात्मक टिप्पणियां करता रहा है।

ऐसे अहंकारी को ठाकरे सरकार ने जब दो आत्महत्याओं के लिए उकसाने के गंभीर फौजदारी मामले में गिरफ्तार किया तो सत्ता पक्ष से उसे मदद मिली। वह सुप्रीम कोर्ट जमानत पाकर जल्दी ही बाहर आ गया जिससे उसका दुस्साहस और बढ़ता गया।

लीक व्हाट्सएप चैट के ज़रिए जो जानकारी सामने आई है वो काफी गंभीर व सम्वेदनशील है। पुलवामा और बालाकोट के वाकये ज्यादा गंभीर और देश की सुरक्षा से जुड़े हुए हैं। जिनकी जांच केन्द्र सरकार को अलग से करवानी चाहिए। बालाकोट की एयर स्ट्राइक से पहले अर्णव को इसकी खबर होना बहुत गंभीर बात है। वह इस संवेदनशील जानकारी को आगे पास आन कर रहा था। इसी तरह पुलवामा में हमारे जवानों के मारे जाने पर उसका खुश होना जितना शर्मनाक है उतना ही गंभीर भी। हर किसी को अरबन नक्सल, टुकड़े- टुकड़े गैंग, देशद्रोही कहने वाला अर्णव खुद कौन है इसका पता लगाने के लिए सीबीआई या एनआईए को लगाना चाहिए। 

अर्णब की कहानी बिल्कुल ही इरविंग वालेस के अंग्रेजी उपन्यास “द आलमाइटी“ के उस किरदार की तरह है जो एक अखबार का मालिक है और अपना प्रसार बढ़ाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। पावर के लिए, सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए कुछ भी करने को तैयार। न्यूज हेडलाइन बनना चाहिए, वर्ल्ड इवेंट होना चाहिए! उसके लिए अपराधों में शामिल भी हुआ जा सकता है। बड़े अपराध भी करवाए जा सकते हैं। हर बड़े क्राइम की खबर उसके अख़बार में ब्रेक होती थी। कई बार तो वारदात होने के तत्काल बाद, बहुत बारीक डिटेल्स के साथ। आखिर में उसका पर्दाफाश होता है कि अख़बार में छपने वाली हर बड़ी वारदात, खुद अख़बार ने करवाई होती है!

प्रधानमंत्री मोदी को देखना चाहिए कि वह किस तरह उनका और दूसरे वरिष्ठ मंत्रियों का नाम इस्तेमाल कर रहा है। अर्णव को बचाने का मतलब उसकी उन बातों को सही साबित करना होगा, जिसमें वह नीतियां बदलवाने से लेकर सरकार से काम करवाने के वादे और दावे कर रहा है। केन्द्र सरकार को अपनी साख बनाए रखने के लिए अर्णव के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

मीडिया की तरफ से मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि उन्होंने समय रहते अर्णव पर कार्रवाई करके पत्रकारिता को और कलंकित होने से बचा लिया। हालांकि, इतने भर से काम नहीं चलेगा। मीडिया को अपनी विश्वसनीयता (जो भी थोड़ी बहुत बची है) को और खत्म होने से बचाने के लिए सामने आना होगा। 

अर्णब ने जिन मीडिया वालों के खिलाफ अनाप शनाप बोला है वे अगर जवाब नहीं देंगे तो मैसेज यही तो जाएगा कि अर्णब सही है! पत्रकारिता की इज्जत बचाने कोई और नहीं आएगा। यह काम उन पत्रकारों और थोड़े से बचे हुए मीडिया के उन मालिकों को करना होगा, जिनकी पहचान अपने अखबारों, पत्रिका और चैनल से है। बाकी तो आज मीडिया के बड़े हिस्से के मालिक अंबानी हो गए हैं, जिन्हें मीडिया से नाम और सम्मान नहीं कमाना। अंबानी को जो कमाना है वो कमा रहे हैं मगर समीर जैन, रजत शर्मा और अरुण पुरी का नाम तो मीडिया से ही है। इन्हें कम से कम अपने स्वाभिमान की रक्षा तो करना ही चाहिए!

फिलहाल, अब टीआरपी जालसाजी के मामले में उसे शायद ही किसी की सहानुभूति मिले। उसने जिस तरह पूरे सिस्टम को अपने हाथों में लेने का दावा किया है, उसके बाद राजनीति, न्यायपालिका और मीडिया किसी भी क्षेत्र से उसे मदद मिलना संभव नहीं है। और यह होना भी चाहिए। अर्णब भी समझ ही रहा होगा कि अब उसके साथ कोई नहीं खड़ा होगा क्योंकि उसने खुद ही अपने विनाश की कहानी व्हाट्सएप पर लिख दी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related

माफीनामों का ‘वीर’ : विनायक दामोदर सावरकर

Post Views: 94 इस देश के प्रबुद्धजनों का यह परम, पवित्र व अभीष्ट कर्तव्य है कि इन राष्ट्र हंताओं, देश के असली दुश्मनों और समाज की अमन और शांति में पलीता लगाने वाले इन फॉसिस्टों और आमजनविरोधी विचारधारा के पोषक इन क्रूरतम हत्यारों, दंगाइयों को जो आज रामनामी चद्दर ओढे़ हैं, पूरी तरह अनावृत्त करके […]

ओवैसी मीडिया के इतने चहेते क्यों ?

Post Views: 93 मीडिया और सरकार, दोनो के ही द्वारा इन दिनों मुसलमानों का विश्वास जीतने की कोशिश की जा रही है कि उन्हें सही समय पर बताया जा सके कि उनके सच्चे हमदर्द असदउद्दीन ओवैसी साहब हैं। ● शकील अख्तर असदउद्दीन ओवैसी इस समय मीडिया के सबसे प्रिय नेता बने हुए हैं। उम्मीद है […]

मोदी सरकार कर रही सुरक्षा बलों का राजनीतिकरण!

Post Views: 45 ● अनिल जैन विपक्ष शासित राज्य सरकारों को अस्थिर या परेशान करने के लिए राज्यपाल, चुनाव आयोग, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), आयकर, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) आदि संस्थाओं और केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग तो केंद्र सरकार द्वारा पिछले छह-सात सालों से समय-समय पर किया ही जा रहा है। लेकिन […]

error: Content is protected !!
Designed and Developed by CodesGesture