आखिर किसान क्या चाहते हैं जो सरकार उन्हें नहीं देना चाहती?

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● अनिल जैन

केंद्र सरकार के बनाए कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब और हरियाणा के किसानों के असंतोष ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। अपना विरोध जताने को दिल्ली पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे किसानों को रोकने के लिए पहले तो सरकार ने कड़ाके की सर्दी में पानी की बौछारों और आंसू गैस का सहारा लिया, कंटीले तारों वाले बैरीकैड्स लगाए। इस सिलसिले में कई जगहों पर पुलिस और किसानों के बीच जबर्दस्त टकराव भी हुआ। इसी बीच पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसान भी सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। हालांकि सरकार किसानों की मांगें मानने को कतई तैयार नहीं है, लेकिन उसकी यह अकड़ अब ढीली पड़ गई है कि किसानों को दिल्ली में नहीं घुसने दिया जाएगा। सरकार ने अब न सिर्फ किसानों को दिल्ली में प्रवेश करने की इजाजत दे दी है, बल्कि उनके प्रदर्शन के लिए जगह भी तय कर दी है। सवाल है कि आखिर किसान सरकार से क्यों खफा हैं और ऐसा क्या चाहते हैं जो सरकार मानने को तैयार नहीं है?

दरअसल, करीब तीन महीने पहले जब सरकार के अलावा तमाम लोग देश की आर्थिक विकास दर के शून्य से नीचे 24 फीसद तक गोता लगा जाने पर परेशान हो रहे थे, तब इस बात पर राहत भी महसूस की जा रही थी कि हमारी खेती की हालत बहुत अच्छी नहीं तो बहुत खराब भी नहीं है। देश की आबादी के बड़े हिस्से का जीवन जिस कारोबार पर निर्भर है और जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, उसकी विकास दर का कम होने के बावजूद संकट के समय में भी सकारात्मक बने रहना राहत की बात थी।

लेकिन महज दो हफ्ते में ही हालात बदल गए। सितंबर महीने के दूसरे हफ्ते में ही सरकार ने किसानों के लिए मुसीबत के पैगाम रूपी कृषि विधेयकों को संसद में पेश कर दिया। देश के विभिन्न हिस्सों में किसान इन विधेयकों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। संकट सिर्फ सड़कों पर ही नहीं दिखा। एनडीए यानी भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन भी इस संकट के दायरे में आ गया।

भारतीय जनता पार्टी का तीन दशक पुराना सहयोगी अकाली दल भी इन विधेयकों के विरोध में उससे छिटक गया। केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने सरकार से इस्तीफा दे दिया। यही नहीं, अकाली दल ने एनडीए से अलग होने का ऐलान भी कर दिया। अकाली दल के इस फैसले से ही जाहिर हो गया था कि कोरोना काल के दौरान कृषि सुधार के नाम पर जो तीन अध्यादेश जारी किए थे, वे उसके लिए भारी पड़ सकते हैं। इसके बावजूद सरकार ने असहमति की तमाम आवाजों को अनसुना कर इन अध्यादेशों को विधेयक के रूप में संसद में पेश कर दिया और हल्ला बोल अंदाज में पारित भी करा लिया।

संसद में पारित इन विधेयकों पर राष्ट्रपति ने भी अपने दस्तखत करने में देरी नहीं की। इस तरह तीनों अध्यादेशों ने कानून का रूप ले लिया। लेकिन किसानों का प्रतिरोध जारी है। दरअसल सरकार ने इन कानूनों को बनाने का अपना इरादा अप्रैल महीने में लॉकडाउन के दौरान ही जता दिया था, जब उसने किसानों सहित विभिन्न तबकों के लिए 20 लाख करोड़ रुपए का कथित राहत पैकेज घोषित किया था। उस वक्त वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ‘एक देश, एक मंडी’ का नारा देते हुए कहा था कि किसान अब अपनी उपज पूरे देश में कहीं भी बेच सकेंगे।

अभी तक देश में कृषि मंडियों की जो व्यवस्था है, उसमें अनाज की खरीद के लिए केंद्र सरकार बड़े पैमाने पर निवेश करती है। इसी के साथ किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का आश्वासन मिल जाता है और करों के रूप में राज्य सरकार की भी आमदनी हो जाती है। ऐसी बिक्री पर जहां आढ़तियों को 2.5 फीसद का कमीशन मिलता है, वहीं बाजार शुल्क और ग्रामीण विकास के नाम पर 6 फीसद राज्य सरकारों के खजाने में चला जाता है। नए कृषि कानूनों में यह व्यवस्था खत्म कर दी गई है। यही वजह है कि किसानों के अलावा स्थानीय स्तर पर आढ़तिए और राज्य सरकारें भी इन कानूनों का विरोध कर रही हैं। हालांकि यह बात अलग है कि भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सरकारें विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं।

नए कानून के हिसाब से कोई भी व्यक्ति जिसके पास पैन कार्ड हो वह कहीं भी किसानों से उनकी उपज खरीद सकता है- उनके खेत में, किसी कोल्ड स्टोरेज में और किसी बाजार में भी। केंद्र सरकार का कहना है कि कृषि उपज की खरीद-बिक्री की जो जगह अभी तक मंडियों तक सीमित थी, उसे अब बहुत ज़्यादा विस्तार दे दिया गया है।

किसानों का कहना है कि मंडी समिति के जरिए संचालित अनाज मंडियां उनके लिए यह आश्वासन थीं कि उन्हें अपनी उपज का एमएसपी मिल जाएगा। अब मंडियों की बाध्यता खत्म होने से यह आश्वासन भी खत्म हो जाएगा। इसीलिए एमएसपी सुनिश्चित करने की किसानों की मांग जारी है। वहीं सरकार नए कृषि कानूनों को किसान हितैषी बताते हुए अपने तर्कों पर अड़ी हुई है। उसका कहना है कि खुले बाजार में मंडी से इतर फसल की बिक्री का अधिकार देकर उसने किसानों की आमदनी बढ़ाने और उसे बिचौलियों से मुक्त कराने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

केंद्र सरकार यह भी सफाई दे रही है कि वह एमएसपी की व्यवस्था को खत्म नहीं करने जा रही है। लेकिन किसानों को उसकी सफाई मंजूर नहीं है। उनका मानना है कि इसका अंतिम नतीजा एमएसपी का खत्म होना ही होगा। किसानों का कहना है कि मंडियों के बाहर लोग उनसे उनकी फसल बाजार भाव के हिसाब से ही खरीदेंगे। यह व्यवस्था उनके लिए काफी दुश्वारियां पैदा करेगी।

इसमें कोई दो मत नहीं कि देश के किसानों और कृषि व्यवस्था पर लंबे समय से संकट बना हुआ है। इसलिए कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सुधार और निवेश की जरूरत है। सरकार का दावा है कि वह भी किसानों और खेती की स्थिति को लेकर चिंतित है और इसीलिए उसने सुधारात्मक कदम उठाते हुए नए कानून बनाए हैं। लेकिन किसान संगठनों का मानना है कि अभी तक जो सुधार सामने आ रहे हैं, उसमें सरकार की मुख्य चिंता किसानों को लेकर नहीं बल्कि कृषि व्यापार को लेकर है। ऐसे सुधारों में अक्सर सभी प्रभावित पक्षों, खासकर किसानों या किसान संगठनों को भरोसे में नहीं लिया जाता और इस बार तो राज्य सरकारों तक को भरोसे में नहीं लिया गया, जबकि कृषि का शुमार संविधान की समवर्ती सूची में है यानी वह केंद्र के साथ ही राज्यों से जुड़ा मामला भी है।

अधिकांश राज्य सरकारें पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रही हैं। कोरोना काल में जीएसटी ने राज्यों के आर्थिक संकट को काफी गहरा कर दिया है। इसलिए वे भी अब कृषि सुधार के नाम पर अपने संकट को और ज्यादा बढ़ाने का और जोखिम नहीं लेना चाहेंगे।

इन कानूनों का जमीनी स्तर पर क्या असर हुआ है, इसे किसानों के गुस्से और असंतोष के साथ ही अकाली दल की प्रतिक्रिया से ज्यादा अच्छी तरह समझा जा सकता है। पंजाब में सत्ता का वनवास लेकिन केंद्र में सत्ता सुख भोग रहे अकाली दल को शुरू में तो सरकार के इरादों की गंभीरता का अहसास नहीं हुआ, इसलिए कैबिनेट में कृषि संबंधी विधेयकों के पारित होने तक तो उसने चुप्पी साधे रखी। लेकिन संसद का वर्षाकालीन सत्र शुरू होने के साथ ही जिस तरह से पंजाब और हरियाणा में किसान सड़कों पर उतर आए, उससे अकाली दल की नींद खुली और उसे यह समझ में आया कि यह उदासीनता और चुप्पी उसे भारी पड़ सकती है। इसलिए उसने भी इन विधेयकों पर आपत्ति जताते हुए केंद्र सरकार में शामिल अपनी मंत्री हरसिमरत कौर बादल से इस्तीफा भी दिलवा दिया।

पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव और फिर लोकसभा चुनाव में अकाली दल का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है। इस बीच उसे पंजाब में कांग्रेस सरकार को घेरने जैसा कोई बड़ा मुद्दा भी हाथ नहीं लगा। खिलाफ भी किसी बड़े मुद्दे को भी नहीं उठा सकी। अब वह इन कानूनों का विरोध करके वापसी की उम्मीद बांध रही है। हालांकि पंजाब के किसानों की नाराजगी का प्रतिनिधित्व खुद मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह कर रहे हैं। उनकी सरकार ने इन कानूनों के खिलाफ सिर्फ विधानसभा में प्रस्ताव और राज्य स्तर पर नया कानून ही पारित नहीं कराया बल्कि केंद्र सरकार के बनाए कानूनों के खिलाफ दिल्ली में एक दिन का धरना भी दिया।

हरियाणा में भी केंद्र के बनाए कृषि कानूनों के चलते सरकार गिरने का खतरा पैदा हो गया है। वहां सरकार चला रही भाजपा और सरकार में शामिल दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी के ज्यादातर विधायक इन कानूनों को लेकर चिंतित और परेशान हैं। उन्हें लग रहा है कि अगर वे किसानों का साथ नहीं देते हैं तो अगली बार उनका जीतना मुश्किल हो सकता है। दोनों पार्टियों के कई विधायक इस मुद्दे पर विधानसभा से इस्तीफा देना चाहते हैं, लेकिन वे उपचुनाव नहीं चाहते। वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके इस्तीफे से सरकार गिरे और मध्यावधि चुनाव की नौबत आए। लेकिन सरकार गिराने लायक संख्या में एकजुट नहीं हो पा रहे हैं।

जिस तरह पंजाब और हरियाणा की राजनीति करवट ले रही है, वैसी ही राजनीतिक करवट आने वाले समय में अन्य कई राज्यों में दिख सकती है। खासकर उन राज्यों में जहां किसान आमतौर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य के भरोसे ही खेतीबाड़ी करते हैं।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।) 
साभार : जनचौक 

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