संविधान! तुम्हें कैसे बचाए?

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● कनक तिवारी 

सत्तर वर्षों के बाद संविधान की जुगाली करते करते यही समझ आया है कि विधायिकाओं, मंत्रालयों, राजभवनों और न्यायालयों में दैनिक हाज़िरी भरते आईन को सड़कों पर चलने का वक्त ही नहीं मिल पाया। संविधान की सड़क व्याख्या की देश को ज़्यादा ज़रूरत है। वह पेटभरे उद्योगपतियों, नौकरशाहों, राजनेताओं, वकीलों और न्यायाधीशों के अकादेमिक चोचलों का व्याख्यान बना दिया गया है। संविधान दिवस के मौके पर संविधान की समीक्षा कर रहे हैं वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी।

कनक तिवारी

इक्कीसवीं सदी के नागरिकों को संविधान के स्नेह, उदारता और न्यायप्रियता की ज़्यादा ज़रूरत है। इस पंथनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक, स्वधर्म पोथी को जनता नहीं पाती है। यह अब तक राजपथ समझा गया है। संविधान को भारत का जनपथ बनना है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र एक तरह से सबसे बड़ी लोकतांत्रिक दुनिया ही तो है। संविधान पूरी तौर पर सफल नहीं रहा है, लेकिन पूरी तौर पर असफल भी नहीं रहा।

हर संविधान की सफलता चुनौतियों को लेकर उसकी क्षमता में होती है। इस लिहाज़ से संविधान ने बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध को असफल नहीं किया है। अन्यथा भारत अपने पड़ोसियों पाकिस्तान, नेपाल, अफगानिस्तान और म्यामांर आदि के वर्तमान का उनसे भी बड़ा और भयावह संस्करण हो जाता। 

सत्तर वर्षों के संविधान सहकार से निष्कर्ष उभरा है कि सामान्य जनता और उपेक्षित वर्ग की सांवैधानिक प्रावधानों में आस्था बनी  दृढ़तर नहीं हुई है। यथास्थितिवाद के समर्थकों को पचास वर्ष के बाद होश आया। संविधान ने बहुत सी संकीर्ण और पुरानी हिन्दू व्यवस्थाओं पर चोट भी की है। इनमें से कुछ सामाजिक आचरण मध्ययुगीन यवन आक्रमणों की प्रतिक्रिया में ओढ़ लिए गए थे।

विदेशी हमलों के विरुद्ध अति सुरक्षा की भावना के कारण रूढ़ हिन्दू विचारक उन्हें सदियों तक छाती से लगाए रहना चाहते हैं। आज ये विचार अपनी कमजोर और घिनौनी कोशिश में आईन में वह  हिन्दुत्व ढूंढ़ रहे हैं, जिसके नहीं रहने की स्थिति संविधान निर्माता पीढ़ी ने ही सुनिश्चित कर दी थी। 

महान देशभक्त स्वाधीनता संग्राम सैनिकों ने जवाहर लाल नेहरू जैसे कुछ एक अपवादों को छोड़कर दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद का पोषण भी किया । इससे संविधान सभा की बानगी में उस आधुनिकता, समकालीनता और दूरदर्शिता का अभाव है, जिसने अपनी समवेत बौद्धिकता को पैना करने के बदले अंगरेजी-अमेरिकी न्यायिक उद्धरणों और संवैधानिक परम्पराओं पर बहुत भरोसा किया गया है।

वे किताबें पवित्र नहीं होतीं जिन्हें कभी कभार खोल कर पढ़ लिया जाए और फिर श्रद्धा अर्थात पलायन के साथ संदूक में बंद कर दिया जाए। किताबें दीमकों के भोजन के लिए नहीं लिखी जातीं। उनका कागज़ पुराना पड़ता जाता है, लेकिन इबारत में ऐतिहासिकता के तेवर उगते जाते हैं। संविधान भी इन उक्तियों का अपवाद नहीं है। द्वंद सृष्टि ने पैदा किया है। सृष्टि से चलकर विनाश तक की मनुष्य यात्रा को अपनी व्यापक समझ से नियंत्रित करना संविधानों का काम होता है। 

भारत के संविधान की कई विशेषताएं विश्व के अन्य संविधानों में नहीं पाई जातीं।

1. भारत में दुनिया का सबसे भारी भरकम शब्द संग्रह का आईन है। इसमें नब्बे हज़ार से अधिक शब्द हैं। जबकि अमेरिकी संविधान में बमुश्किल सात हजार शब्द हैं। संविधान के 395 अनुच्छेदों के मुकाबले जापान और फ्रांस के संविधान में क्रमशः 103 तथा 92 अनुच्छेद हैं। लगभग 845 बोलियां बोलने वाले देश के लिए इससे छोटा संविधान नहीं रचा जा सकना समझाया गया।

2. संविधान न लचीला है, न सख़्त, न ही दोनों। ‘संविधान सभा के अशेष हस्ताक्षरों ने संविधान की प्रकृति में इतने अंतर्विरोध भी गूंथ दिए हैं, जिनसे वह बरी नहीं है। उसमें अचानक संशोधन नहीं किया जा सकता।‘

3. संविधान बोझिल दार्शनिक शब्दावली में लिखित है। 

4. संविधान एक साथ संघीय (फेडरल) और एकात्म (यूनिटरी) है।

5. भारतीय संविधान अपनी अलंकारिक शब्दावली में यमक, श्लेष, अन्योक्ति और वक्रोक्ति की नायाब फितरतों का लाक्षणिक भंडार है।

6. संविधान संसदीय और राष्ट्रपतीय प्रणालियों की  बेमेल राजनीतिक विधाओं की असहज प्रयोगशाला भी है।

7. दुनिया में यह शायद अकेला संविधान है जो अपने देश की किसी भाषा की टकसाल में गढ़ा हुआ सिक्का नहीं है।

8. भारतीय संवैधानिक व्याख्याएं ब्रिटिश परम्पराओं की काठी पर चढ़ी हुई है।

9. संविधान विश्व के सभी हमसफरों में ज़्यादा वाचाल है। 

10. संविधान-न्यायालय अंगरेजी तामझाम के चोगे में लदे फंदे ऐसे अनुतोष देने कमर कसे हुए हैं जिनकी प्रकृति यूनानी और रोमी है। उनके भारतीय संस्करणों और अनुवाद में न्याय समझा जाता है।

11. संविधान ऐसी संविधान सभा द्वारा रचा गया, जो गुलामी के दिन 9 दिसम्बर 1946 से एक सार्वभौम देश के लिए विधि (श्लेष!) का दस्तावेज रच रही थी और दूसरी ओर आजादी मिलने के बाद 15 अगस्त 1947 से 30 नवम्बर 1949 तक संसद बनकर राजकाज भी चलाती रही।

308 सदस्यों ने दो वर्ष 11 माह 19 दिन में रचा संविधान

9 दिसंबर 1946 से 26 नवंबर 1949 तक संविधान सभा के करीब 308 निर्वाचित सदस्यों ने मिलकर संविधान रचा। उसे 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया।

पंथनिरपेक्षता संविधान का मकसद है, लेकिन उस पर तरह तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं। संविधान छुआछूत नहीं मानता लेकिन पंथनिरपेक्षता के विरोधी अपने ज़ेहन और अमल में भी मानते हैं। अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थाएं बनाने की छूट और रियायतें देता है। उसे बहुसंख्यक साम्प्रदायिक लोग असंवैधानिक मानते हैं। धर्म के नाम पर वोट कबाड़ने को लोक प्रतिनिधित्व कानून भ्रष्टाचार की संज्ञा देता है तो धार्मिक तत्व नाक भौं सिकोड़ते हैं। सुप्रीम कोर्ट भी हिन्दुत्व को लेकर अपना विवादास्पद निर्णय देता है। धर्मान्तरण और अपने धर्म का प्रचार करने को भी गड्डमगड्ड कर दिया जाता है। यह सवाल सुप्रीम कोर्ट भी उठाता है कि समान नागरिक संहिता देश में क्यों लागू नहीं की जा सकती।

संविधान में सौ से ज़्यादा संशोधन हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंचें लगभग 2000 बार बैठ चुकी हैं। अधिकतर भरे पेट के लोगों, राजाओं, जागीरदारों, कंपनियों, ट्रस्टों, शराब उत्पादकों और राजनेताओं ने संविधान को चुनौतियां दी हैं। आम आदमी के पक्ष में चुनौतियां देने वाली याचिकाओं की संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है। पढ़ा लिखा सामान्य नागरिक भी संविधान को वकीलों और न्यायाधीशों की लहलहाती फसल का उपजाऊ खेत समझता है। डरता है न्यायाधीश या अदालत के संबंध में कोई खुली टिप्पणी कर दी तो उसे अवमानना के लिए दंडित होना पड़ेगा। वे वकील गरीबों के संविधानवाहक बनते हैं जो एक बार खड़े होने के लिए एक लाख से पचीस लाख रुपये तक की फीस ले लेते हैं।

लेखक प्रख्यात गांधीवादी, भारतीय संविधान पर कई पुस्तकों के लेखक और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।

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