सिंधिया का सियासी करियर दांव पर

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● श्रवण गर्ग 

सिंधिया और उनके समर्थकों की बड़ी जीत या कड़ी हार दोनों ही स्थितियाँ मध्य प्रदेश में बीजेपी की राजनीति को आने वाले समय में काफ़ी तनावपूर्ण बनाकर रखने वाली हैं। नीतीश कुमार ने यह घोषणा तो कर दी है कि यह उनका आख़िरी चुनाव है पर ऐसा कोई इरादा नहीं ज़ाहिर किया है कि वे हरेक परिस्थिति में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में बने रहेंगे। लेकिन सिंधिया तो स्पष्ट कह चुके हैं कि वे अब बीजेपी में ही बने रहने वाले हैं। 

बिहार के साथ-साथ लोग अब यह भी जानना चाहते हैं कि मध्य प्रदेश की 28 सीटों के लिए तीन नवम्बर को पड़े मतों के क्या नतीजे निकलने वाले हैं? बिहार से अलग, मध्य प्रदेश के चुनावों की विशेषता यह रही है कि बीजेपी के पास तो जनता को रिझाने के लिए कोई मुद्दा था ही नहीं, कांग्रेस ने भी ‘बिकाऊ वर्सेस टिकाऊ’ और ‘ग़द्दारी’ को ही प्रमुख मुद्दा बना लिया और वह कुछ हद तक चल भी निकला। इसीलिए, नतीजे चौंकाने वाले भी आ सकते हैं।

दिल्ली के नेताओं को आने वाले नतीजों का कुछ पूर्वानुमान हो गया होगा इसीलिए बीजेपी और कांग्रेस का कोई भी ‘बड़ा नेता’ बिहार की तरह सभाएँ करने मध्य प्रदेश नहीं पहुँचा।

मध्य प्रदेश के नतीजों में जनता के लिए यही जानना दिलचस्पी का विषय रह गया है कि सिंधिया के जो प्रमुख समर्थक शिवराज मंत्रिमंडल में अभी ऊंची जगहें बनाए हुए हैं, उनमें से कुछ या काफ़ी, अगर हार जाते हैं, जैसी कि आशंकाएँ भी हैं, तो ‘महाराज’ और बीजेपी इसके लिए सार्वजनिक रूप से किसे और पीठ पीछे किसे दोषी ठहराने वाले हैं? 

बीजेपी नेताओं की चिंता

दबी ज़ुबान से यह भी कहा जा रहा है कि बीजेपी के ही कई बड़े नेता, विशेषकर ग्वालियर-चम्बल इलाक़े के, ऐसा कम ही चाहते हैं कि उपचुनावों के बाद एक कथित धर्मनिरपेक्ष पार्टी कांग्रेस को छोड़कर नए-नए भगवाधारी हुए महत्वाकांक्षी सिंधिया उनके कंधों से ऊँचे नज़र आने लगें। 

बिहार के चुनाव परिणामों को लेकर जैसे बड़ा मुद्दा अब यह बन गया है कि दस नवम्बर के बाद नीतीश कुमार और बीजेपी के बीच संबंध कैसे रहने वाले हैं, वैसा ही कुछ मध्य प्रदेश में सिंधिया समूह और बीजेपी के बीच केवल आठ महीने पूर्व क़ायम हुए समीकरणों को लेकर भी कहा जा रहा है। 

एमपी के राजनीतिक समीकरण

सिंधिया और उनके समर्थकों की बड़ी जीत या कड़ी हार दोनों ही स्थितियाँ मध्य प्रदेश में बीजेपी की राजनीति को आने वाले समय में काफ़ी तनावपूर्ण बनाकर रखने वाली हैं। नीतीश कुमार ने यह घोषणा तो कर दी है कि यह उनका आख़िरी (विधानसभा?) चुनाव है पर ऐसा कोई इरादा नहीं ज़ाहिर किया है कि वे हरेक परिस्थिति में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में बने रहेंगे। लेकिन सिंधिया तो स्पष्ट कह चुके हैं कि वे अब बीजेपी में ही बने रहने वाले हैं। 

उपचुनावों के नतीजे न सिर्फ़ सिंधिया और उनके समर्थकों का मध्य प्रदेश की भावी राजनीति में भविष्य तय करेंगे बल्कि सिंधिया की बीजेपी के केंद्रीय स्तर पर बहु-प्रतीक्षित भूमिका की पटकथा भी लिखने वाले हैं।

बिहार में अगर यह संभव नज़र नहीं आ रहा है कि नीतीश की जेडीयू को बीजेपी के मुक़ाबले ज़्यादा सीटें मिल पाएँगी तो मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस के मुक़ाबले बीजेपी उम्मीदवारों की ज़्यादा सीटों पर जीत होती नज़र नहीं आ रही। इसके कारण भी बीजेपी को अपनी अंदरूनी चुनावी रणनीति में ही तलाश करना पड़ेंगे।

हार पर बदलेंगे समीकरण

बिहार और मध्य प्रदेश, दोनों जगहों में अगर किसी एक में भी सरकार बीजेपी के हाथ से निकल जाती है तो एनडीए के साम्राज्यवाद को महाराष्ट्र के बाद दूसरा बड़ा धक्का लगने वाला है और उसकी गूंज अगले साल बंगाल के चुनावों में भी सुनाई पड़ेगी। राजस्थान का प्रयोग हाल में विफल हो ही चुका है। मध्य प्रदेश में बीजेपी को हो सकने वाले नुक़सान के संकेत उप चुनावों में प्रचार के दौरान ही दिखने लगे थे। 

मसलन, मध्य प्रदेश में उन तमाम स्थानों के बीजेपी कार्यकर्ता अपने आपको उन नए ‘भगवा’ प्रत्याशियों के पक्ष में काम करने के लिए आसानी से तैयार नहीं कर पाए जिन्होंने 2018 के चुनाव में कांग्रेस के टिकटों पर लड़कर उन्हें (बीजेपी उम्मीदवारों को) ही हराया था। 

संदेह उठता है कि इन कार्यकर्ताओं ने इन नए ‘उम्मीदवारों’ की जीत के लिए पहले की तरह ही अपनी जान की बाज़ी लगाई होगी ! उन्हें सम्भवतः यह भय भी रहा हो कि ये नए लोग अगर जीत कर मंत्री-विधायक बन जाते हैं तो फिर ग्राम, ब्लॉक और ज़िला स्तर तक फैली बीजेपी-संघ कार्यकर्ताओं की जो समर्पित फ़ौज है, वह इन ‘नयों’ का मार्गदर्शन और नेतृत्व कैसे स्वीकार कर सकेगी? 

कारण बताओ नोटिस जारी

उप चुनावों में पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ काम करने को लेकर कुछ वरिष्ठ नेताओं को हाल में जारी हुए कारण बताओ नोटिस यही संकेत देते हैं कि बाग़ियों के विद्रोह की स्थिति अगर किसी एक विधानसभा क्षेत्र में भी थी तो इनकार नहीं किया जा सकता कि वह कुछ और या अधिकांश सीटों पर नहीं रही होगी। 

मध्य प्रदेश में चुनाव परिणाम चाहे जो भी निकलें, कोरोनाकाल में जिस राजनीतिक अराजकता और प्रशासनिक अस्थिरता की शुरुआत आठ महीने पहले मार्च में दल-बदल के घटनाक्रम के साथ हुई थी, हो सकता है वह दस नवम्बर के बाद अगले सोलह महीने और चले। उसके बाद तो नए चुनावों के पहले का राजनीतिक पतझड़ प्रारम्भ हो जाएगा। 

जनता को कोरोना के लॉकडाउन के साथ-साथ एक लम्बा राजनीतिक-प्रशासनिक लॉकडाउन भी झेलना पड़ सकता है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर चुनाव नतीजों के बाद मध्य प्रदेश और बिहार दोनों में ही बीजेपी के लिए एक जैसी राजनीतिक स्थितियाँ क़ायम हो जाएँ। 

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