चम्पारन सत्याग्रह के बाद किसानों के लिए दूसरा गांधी हैं ‘राहुल गांधी’

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केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा लाये गये तीन कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ देश भर में चल रहे किसान आंदोलनों के एकमात्र नेता बन कर उभरे कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी ने देश को इतना तो उकसाया ही कि भारत के इतिहास में दर्ज किसान विद्रोह/आंदोलनों का अध्ययन किया जाये और भविष्य के संदर्भों में उन्हें समझा जाये। 

• विश्वविजय सिंह

जब खुद को राष्ट्रीय घोषित करने वाले न्यूज चैनलों के ऐंकर उछल-कूद कर किसान आंदोलनों को सिरे से खारिज करने में अपनी सारी ऊर्जा झोंक रहे हों और देश की हुकूमत कृषि सुधारों के नाम पर कानून बनाकर किसानों का गला घोंटने के पुख्ता इंतजामों में जुटी हो तब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का किसानों के साथ खड़े होना इस बात का संकेत है कि कांग्रेस ने संघर्ष के अपने मूल चरित्र को आजादी से अब तक बिसराया नहीं है। यदि बीते एक दसक के किसान आन्दोलनों और उनके नेतृत्व पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि चंपारण सत्याग्रह के बाद देश को किसान नेता के तौर पर दूसरा गांधी मिला है और वह दूसरा गांधी, राहुल गांधी हैं।

केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा लाये गये तीन कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ देश भर में चल रहे किसान आंदोलनों के एकमात्र नेता बन कर उभरे कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी ने देश को इतना तो उकसाया ही कि भारत के इतिहास में दर्ज किसान विद्रोह/आंदोलनों का अध्ययन किया जाये और भविष्य के संदर्भों में उन्हें समझा जाये। इतिहास को अन्यायपरक बनाने और बम फैक्ट्रियों में बदल देने वाले इन छह सालों के नव अभिजन, एक बहुत लंबे कालखण्ड के बाद शोषण, उत्पीड़न और बदहाली के खिलाफ किसानों की देशव्यापी एकजुटता को नेतृत्व देने की राहुल गांधी की पहल के मर्म नहीं समझ सकेंगे।

शुरू से ही किसानों की आवाज रही है कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी ने शुरू से ही किसानों की समस्याओं को लेकर आवाज उठाई है और किसानों की मजबूत आवाज साबित हुई है। बरतानिया शासन के दौरान हुये नील किसानों का आंदोलन, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण सत्याग्रह, बारदोली आंदोलन, दक्कन का विद्रोह, उत्तर प्रदेश का किसान आंदोलन, मोपला विद्रोह, कूका विद्रोह, रामोसी किसान आंदोलन आदि का नेतृत्व कांग्रेस नेताओं ने ही किया। इन तमाम आंदोलनों के जरिए कांग्रेस ने देश भर में किसानों को संगठित किया। आजादी से पहले देश ने इन फैसलाकुन किसान आंदोलनों के नायक महात्मा गांधी, स्वामी सहजानंद, प्रो. एनजी रंगा, पंडित नेहरू, एम वासवपुंनैया जैसे दिग्गज थे।

चम्पारन सत्याग्रह में भाग लेते महात्मा गांधी की तस्वीरें (साभार गूगल)

अधिकांश आंदोलनों का नेतृत्व महात्मा गांधी समेत उस समय के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने ही किया। 1857 की जनक्रांति के बाद विरोध का मोर्चा किसानों ने ही संभाला जो वस्तुतः ब्रितानी हुकूमत की ही मुख़ालिफ़त थी। समय बदलता गया, वैश्वीकरण और उदारीकरण का दौर आया, प्राथमिकताएं बदलीं तो मुद्दे भी बदले। एक दौर महेंद्र सिंह टिकैत का आया। उसके बाद सन्नाटा। खेती-किसानी राजनीति का पताका मुद्दा (फ्लैग इश्यू ) नहीं बन सका। बीते छह सालों से तो उनका अस्तित्व ही खतरे में है। वर्ष 2014 के बाद तो खेती-किसानी और खेतिहर मजदूर सरकार के लिये ‘नान प्रायरटी’ हो गया और अब उसे पूरी तरह सटोरिया पूंजी और कारपोरेट्स के रहमों-करम पर छोड़ दिया गया है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी देश के अकेले राजनेता हैं जिन्होंने खेती-किसानी को राजनीतिक और बड़े जन आंदोलन का मुद्दा बनाया है। वह इस काम में वर्ष 2015 से लगे हैं।

आज जिन तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आज हरियाणा और पंजाब में जिस किसान आंदोलन का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं, उसकी शुरुआत 19 अप्रैल 2015 को दिल्ली के रामलीला मैदान से ही हो चुकी थी।

साल 2015 की 16 अप्रैल को दोपहर से कुछ पहले सवा ग्यारह बजे के आसपास विदेश से लौटे तत्कालीन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी एयरपोर्ट से निकलकर सीधे अपने आवास 12 तुगलक लेन पहुंचते हैं। जहां उनकी माँ और कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी और बहन प्रियंका गांधी इंतजार कर रही हैं। मां और बहन के साथ कुछ समय बिताने के बाद राहुल 10 जनपथ पहुंचते हैं और फिर अगले दिन किसान प्रतिनिधियों व कांग्रेस नेताओं से मिलते हैं। अगले दो दिन तक यह क्रम चलता है, फिर 19 अप्रैल को रामलीला मैदान में देश भर से जुटे किसानों को सम्बोधित करते हुए राहुल ने संकेत दे दिया कि यह और इंतजार करते रहने का वक्त नहीं है। उन्होंने साफ-साफ कह दिया था कि भूमि अधिग्रहण और खेती-किसानी की समस्याएं हमारी अर्थव्यवस्था से अभिन्न रूप से जुड़ी हैं और कोई सरकार इसे नजरअंदाज कर सत्ता में नहीं बनी रह सकती। भूमि अधिग्रहण बिल को उन्होंने वर्तमान सरकार का कारपोरेट्स का एहसान उतारने का प्रयास बताया। इस तरह राहुल गांधी ने भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ देश भर में चल रहे आंदोलन और किसानों के गुस्से के आगे खुद को नेतृत्वकर्ता की भूमिका में खड़ा कर लिया। इसके बाद भी जब जब किसानों पर कुछ आंच आयी राहुल सबसे पहले पहुंचे और किसानों की आवाज बने।

पिछले हफ्ते पंजाब के मोगा जिले के बढनी कलां में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी ने कहा कि, “अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो इन कृषि कानूनों को निरस्त कर दिया जाएगा।”

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा बनाए गए इन कृषि कानूनों के पीछे की नीयत उन कछ दैत्याकार कारपोरेट्स के लिये और सहूलियतों की रेड कारपेट बिछाना है, जिनकी नजर भारत के 12 हजार अरब के खुदरा व्यापार पर पहले से गड़ी है। ये वही कारपोरेट्स हैं जिनकी बैकिंग (पीठ पर हाथ से) से छह साल पहले भाजपा का सत्ता में आना संम्भव हुआ।

इस कानून के जरिए सरकार अपने कुछ कारपोरेट्स मित्रों को 12 हजार अरब की साइज के देश के खुदरा व्यापार को बतौर सौगात सौंप देना चाहती है। वाट्सएप का खुदरा बाजार में 55 हजार करोड़ का निवेश तकरीबन हो चुका है और इसी बाजार के लिये गुगल-रिलायंस के बीच संविदा भी। यानी अब गुगल जैसी बड़ी कंपनी भी भारत के खुदरा बाजार में उतर चुकी है। ऐसी ही और भी कई कम्पनियाँ हैं जो बैकडोर से भारतीय अर्थव्यवस्था पर कब्जे को पूरी तरह तैयार बैठी हैं।

राहुल गांधी की जंग को समझने के लिये कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक, मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक और आवश्यक वस्तु अधिनियम संशोधन विधेयक जो अब कानून बन चुके हैं, के पीछे की नीयत के साथ ही इस कानून से किसानों की तबाही और मजदूर एवं निम्न वेतनभोगी वर्ग पर पड़ने वाले कुप्रभाव को भी समझना जरूरी है।

पहले कृषि उत्पाद और उसकी खरीद फरोख्त अलग-अलग राज्यों की मंडी समितियों के जरिये, राज्यों की सीमा में राज्य का सरोकार, राज्य का विषय था। इस पर हर राज्य में अलग-अलग कर निर्धारण था। हालांकि किसान को अपना उत्पाद कहीं और किसी को बेचने पर रोक पहले भी नहीं थी। बड़े कारपोरेट्स को किसानों का उत्पाद खरीदने के लिए पुराने कानून के अनुसार हर जगह हर राज्य में अपनी आढ़त खोलनी होती और 2 से 6 प्रतिशत तक के अंतर वाले अलग-अलग राज्यों के अलग कर और उसकी स्थानिक प्रणाली से गुजरना होता जो उनके लिये असुविधा जनक था। लेकिन अब नये कानूनों ने किसानों का गला घोंटकर उनकी खेती पर कब्जे के लिए कारपोरेट्स के हाथ में ऐसा हथियार थमा दिया है जिसमें फंस कर परकटे पंक्षी की मानिंद फड़फड़ाते हुए अपनी जान गवां देना ही किसानों की नियती बन जाने वाली है।

ऐसे में किसानों के लिए एक मसीहा के तौर पर उभर कर आये राहुल गांधी आजादी के बाद देश के पहले नेता हैं जिन्होंने आवारा, सटोरिया पूंजी के वर्चस्व को चुनौती दी है। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के मकसद और देश की 80 प्रतिशत गरीब आबादी के लिए लड़ने के उनके बहुत सच्चे, लोकधर्मी हौसले को जनता तक ले जाने की जरूरत है। 

लेखक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव हैं

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