स्वतंत्रता संग्राम के नायक

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हिन्दुस्तान को आजादी आसानी से नहीं मिली है। आजादी के लिए अगणित देशवासियों ने खून पसीना एक कर दिया था। एक सोच, एक संकल्प और एक विश्वास के साथ अपनी जान की बाजी लगा दी कई स्वतंत्रता सेनानियों ने, तब सैकडों वर्ष की गुलामी के दंश से छुटकारा मिल सका हमेें। आज हम जिस स्थिति में है वह सब हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की देन है। यदि वह घर में बैठे रहते और आजादी की पहल न करते तो शायद आज भी हम गुलाम ही बने रहते। हमारे जिन वीर सेनानियों ने आजादी प्राप्त करने के लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर कर दिया, जेेल की काल कोठरी में अपने जीवन होम कर दिये और ब्रतानिया हुकूमत के जुल्मो सितम सहते हुए उफ तक न की, उन्हें याद रखना, उनके जीवन मूल्यों की रक्षा करना प्रत्येक हिन्दुस्तानी का कर्तव्य है। इन अमर सेनानियों को याद कर प्रत्येक भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। इस स्तम्भ में हम आजादी के उन अमर सेनानियों को याद करेंगे जिनकी जयंती या स्मृति दिवस सितंबर महीने में है….

  • डॉ. प्रमोद कुमार शुक्ल

राजा राममोहन राय

आधुनिक भारत और नवयुग के जनक राजा राममोहन राय ने पारम्परिक हिन्दू परम्पराओं को तोड़ते हुए महिलाओं और समाज के हित में कई सामाजिक कार्य किए। राजा राममोहन रॉय का नाम उन समाज-प्रवर्तकों में शामिल हैं जिन्होंने जातिवाद के कारण उपजी असमानता का विरोध करने की शुरुआत की। वे व्यक्ति के राजनीतिक स्वतन्त्रता और किसानों के अधिकारों के पक्षधर थे, इसके लिये इन्होंने बहुत काम किया। भारत के इतिहास में इनकी पहचान देश में सती प्रथा को समाप्त कराने वाले व्यक्ति के रूप दर्ज हैं। इसके अतिरिक्त भी कई ऐसे कार्य हैं जिनके कारण राजा राममोहन राय को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता हैं। महान शिक्षाविद, विचारक और प्रवर्तक राजा राममोहन राय ने कलकत्ता के एकेश्वरवादी समाज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देशवासियों को दुनिया का मुकाबला करने के लिए इंग्लिश, विज्ञान, वेस्टर्न मेडिसिन और टेक्नोलॉजी जैसे नवीन विषयों के अध्ययन को जरूरी माना और इसके पक्षधर बने।
राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 को बंगाल के हूगली जिले के राधानगर गांव में एक वैष्णव परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम रामकंतो रॉय और माता का नाम तैरिनी था। उनकी शादी 9 वर्ष की उम्र में ही कर दी गई लेकिन उनकी प्रथम पत्नी का जल्द ही देहांत हो गया। इसके बाद 10 वर्ष की उम्र में उनकी दूसरी शादी की गयी जिससे उनके दो पुत्र हुए लेकिन 1826 में दूसरी पत्नी का भी देहांत हो गया और इसके बाद उनकी तीसरी शादी हुई, हालांकि तीसरी पत्नी भी ज्यादा समय जीवित नहीं रह सकी। राजा राममोहन राय ने 15 वर्ष की उम्र तक बंगला, पर्शियन, अरेबिक और संस्कृत जैसी भाषाएं सीख ली थी। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा संस्कृत और बंगाली भाषा में गांव के स्कूल से ही हुई। बाद में उन्हें पटना के मदरसे में भेज दिया गया जहां उन्होंने अरेबिक और पर्शियन भाषा सीखी। काशी जाकर उन्होंने जहां वेदों और उपनिषदों का अध्ययन किया वहीं बाइबिल, कुरान और अन्य इस्लामिक ग्रन्थों का अध्ययन भी किया।
राजा राममोहन राय ने 14 वर्ष की उम्र में सन्यास लेने की इच्छा व्यक्त की लेकिन परिवार के लोग इस पर तैयार नहीं हुए तो उन्होंने घर छोड़ दिया और हिमालय तिब्बत की तरफ चले गए। इस दौरान भ्रमण किया और देश दुनिया के साथ सत्य को भी जाना-समझा। बाद में वे घर लौट आए और 1805 में ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी आरंभ की। यहां काम करते हुए उन्हें लगा कि वेदांत के सिद्धांतों को पुन: परिभाषित करने की आवश्यकता हैं। वे पश्चिमी और भारतीय संस्कृति का संगम करवाना चाहते थे। उन्होंने एकेश्वर वाद के सिद्धांत का अनुमोदन किया, जिसके अनुसार एक ईश्वर ही सृष्टि का निर्माता है। इस मत को वेदों और उपनिषदों द्वारा समझाते हुए उन्होंने इनकी संकृत भाषा को बंगाली, हिंदी और इंग्लिश में अनुवाद किया।
1814 में राजा राममोहन राय ने सामजिक और धार्मिक मुद्दों पर पुन: विचार कर परिवर्तन के उददेश्य से आत्मीय सभा की स्थापना की। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कई मुहिम चलाई जिनमे विधवा विवाह और महिलाओं को जमीन सम्बन्धित हक़ दिलाना मुख्य थे। उनके अभियानों के फलस्वरूप 1829 में सती प्रथा पर रोक लगा दी गई। वे बाल विवाह, बहु-विवाह के भी विरोधी थे। समाज में व्याप्त धार्मिक ढोंग और क्रिश्चेनिटी के बढ़ते प्रभाव को खत्म करने के लिए उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना कर सबको एक परमपिता परमेश्वर की सन्तान कहते हुए मनुष्यों के बीच व्याप्त भेदभाव, घृणा, शत्रुता को खत्म करने पर जोर दिया।
राजा राममोहन राय ने शिक्षा को समाज की आवश्यकता माना। 1822 में उन्होंने इंग्लिश मीडियम स्कूल की स्थापना की। उन्होंने कलकता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना भी की, जो कालान्तर में देश का प्रमुुख शैक्षिक संस्थान बन गया। राय ने विज्ञान के फिजिक्स, केमिस्ट्री और वनस्पति शास्त्र जैसे विषय को प्रोत्साहन दिया। वे चाहते थे कि देश का युवा और बच्चे नयी से नयी तकनीक की जानकारी हासिल करे।
गुलाम भारत में कुछ भी प्रकाशित करने के लिये ब्रिटिश सरकार की अनुमति लेनी होती थी। राजा राममोहन राय ने इसका विरोध किया और इंग्लिश, हिंदी, पर्शियन एवं बंगाली भाषाओं में कई पत्रिकाएं प्रकाशित किया। भारतीय पत्रकारिता के शुरुआती दौर में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया और समाज में जागरुकता लाने के लिए अपने सम्पादकीय में देश की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और अन्य समस्याओं पर लिखते रहते थे। इसके अलावा उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं जिनमें इशोपनिषद, कठोपनिषद, मूंडुक उपनिषद के अनुवाद, गाइड टू पीस एंड हैप्पीनेस, गौडिया व्याकरण, ब्रह्मोपासना, ब्रह्मसंगीत और द युनिवर्सल रिलिजन लिखीं। 1830 में राजा राम मोहन राय अपनी पेंशन और भत्ते के लिए मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के राजदूत बनकर यूनाइटेड किंगडम गए। 27 सितम्बर 1833 को ब्रिस्टल के पास स्टाप्लेटोन में मेनिंजाईटिस के कारण उनका देहांत हो गया।
राजा की उपाधि और उन्हें मिले सम्मान
वर्ष 1829 में दिल्ली के राजा अकबर द्वितीय (मुगल साम्राज्य) द्वारा उन्हें ‘राजा’ की उपाधि दी गयी थी। जब वे मुगल सम्राट के प्रतिनिधि बनकर इंगलैंड गए तो वहां के राजा विलियम चतुर्थ ने भी उनका अभिनंदन किया। उनके वेदों और उपनिषद के संस्कृत से हिंदी, इंग्लिश और बंगाली भाषा में अनुवाद के लिए फ्रेंच Societe Asiatique ने उन्हें 1824 में सम्मानित किया।

दादाभाई नौरोजी

सम्मानपूर्वक ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ कहे जाने वाले दादा भाई नैरोजी वो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखने वाले लोगों में से एक थे। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और तीन बार अध्यक्ष भी रहे।’
4 सितंबर, 1825 को बॉम्बे में एक गरीब पारसी परिवार में जन्मे और दादाभाई नौरोजी हमारे देश के महान राजनीतिक और सामाजिक संस्थापकों के रूप में दर्ज हैं। इन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की बुराईयों के खिलाफ संघर्ष किया और भारत को ब्रिटिश राज के चंगुल से मुक्ति के पथ पर अग्रसर किया। बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, अर्थशास्त्री, वतनपरस्त, समाज सुधारक और शिक्षक दादाभाई नौरोजी ने कई महत्वपूर्ण संगठनों जैसे रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बॉम्बे और लंदन में ईस्ट इंडियन एसोसिएशन की स्थापना भी की। उनकी विशिष्ट क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे पहले ऐसे भारतीय थे जो ब्रिटिश संसद के सदस्य बने, जहां उन्होंने हाउस ऑफ कॉमन्स में लिबरल पार्टी के सदस्य के रूप में संसद सदस्य की जिम्मेदारियां निभाईं। दादाभाई नौरोजी ने अर्थशास्त्र में अतुल्य अभिरुचि के कारण गरीबी और भारत से औपनिवेशिक राज का खात्मा विषयक मौलिक रचना लिखी, जिसमें मशहूर ‘समृद्धि के सिद्धांत’ के बारे में बताया गया था। इस सिद्धांत से अंग्रेजों द्वारा विभिन्न तरीकों से बड़े पैमाने पर किये गये भीषण जुल्म और शोषण की गहरी समझ मिलती है, जिसके चलते भारत लगातार दुर्दशा की ओर बढ़ता चला गया। समानता को मानने वाले और प्रगतिशील विचारों के हिमायती दादाभाई नौरोजी पुरुषों और महिलाओं दोनों के साथ बराबरी के व्यवहार में विश्वास करते थे और वे महिलाओं की शिक्षा की वकालत करने वालों में सबसे अग्रणी थे। उदारवादी नज़रिया रखने के नाते उन्होंने हर तरह के जातिगत भेदभाव और उत्पीडऩ का कड़ाई से विरोध किया और संवैधानिक प्रक्रियाओं के महत्व को बरकरार रखा।
दादाभाई नौरोजी जब केवल चार साल के थे तब उनके पिता नौरोजी पलांजी डोरडी का देहांत हो गया। उनका पालन-पोषण उनकी माता मनेखबाई द्वारा हुआ जिन्होंने अनपढ़ होने के बावजूद भी यह तय किया कि दादाभाई नौरोजी को यथासंभव अच्छी अंग्रेजी शिक्षा मिले। उन्होंने बम्बई के एल्फिंस्टोन इंस्टिट्यूट से अपनी पढ़ाई पूरी की और शिक्षा पूरी होने पर सिर्फ 27 साल की उम्र में एल्फिंस्टोन इंस्टिट्यूट में ही गणित और भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक नियुक्त हो गए। किसी विद्यालय में प्राध्यापक बनने वाले वह प्रथम भारतीय थे। इसके पहले दादाभाई नौरोजी ने विद्यार्थी जीवन के दौरान बड़ौदा के महाराजा के दीवान (मंत्री) की भूमिका निभाई। पारसी धर्म को पुनस्र्थापित करने के लिए 1 अगस्त, 1851 को रहनुमाई मैदायस्ने की स्थापना की और पारसी संप्रदाय के सामाजिक सुधारों, समानता और बंधुत्व के संदेश को बढ़ावा देने के लिये उन्होंने वर्ष 1851 में गुजराती भाषा के ‘रास्त गफ्तार’ नामक प्रमुख पाक्षिक पत्र का संपादन तथा संचालन भी किया।
वर्ष 1855 में दादाभाई नौरोजी इंग्लैंड में पहली भारतीय कंपनी स्थापित करने के लिए लंदन चले गये। वे लिवरपूल में स्थापित कामा एंड कंपनी के हितधारकों में से एक बन गये। इसके बाद वर्ष 1859 में दादाभाई नौरोजी ने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में गुजराती के प्रोफेसर के रूप में अध्यापन कार्य किया। भारतीय राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति से निपटने के मामलों में योगदान देने के लिए दादाभाई नौरोजी ने वर्ष 1865 में लंदन इंडियन सोसाइटी की स्थापना की। दादाभाई नौरोजी के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के रुख को बदल दिया था, ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना थी जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मुख्य संस्थाओं में से एक थी। इस संगठन ने अंग्रेजों के सामने भारतीयों की ताकत, उन्हें प्रभावित करने वाले मसलों और उनके नजरिये को रखने की कोशिश की और बाद में यह भारतीय लोगों को हीन बताने वाले गोरे अंग्रेजों के नस्लीय वर्चस्व को चुनौती देने वाला महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ। वे वर्ष 1885 से वर्ष 1888 तक बॉम्बे के विधान परिषद सदस्य बने और उन्होंने वर्ष 1874 में बड़ौदा के प्रधान मंत्री का पद भी संभाला। दादाभाई नौरोजी सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी द्वारा स्थापित इंडियन नेशनल एसोसिएशन में भी रहे। यह संगठन बाद के वर्षों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में रूपांतरित हुआ। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जन्म के बाद उन्हें वर्ष 1886 में इसका अध्यक्ष चुना गया। इसके बाद उन्होंने 1893 और 1906 में भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया।
वर्ष 1901 में, उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में यह सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकों में से एक ‘पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रुल इन इंडिया’ का प्रकाशन किया। इस पुस्तक में बताया गया कि अंग्रेजों ने किस तरह भारत की संपत्ति और संसाधनों की लूट-खसोट की, जिसके कारण भारत में लगातार अभाव, गरीबी और दुर्दशा बढ़ती चली गयी।
अपने लंबे जीवन में दादाभाई ने देश की सेवा के लिए बहुत से कार्य किए। कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (1906) में पहली बार भारत के लिए स्वराज की मांग दादा भाई नौरोजी ने ही की। अधिवेशन में दिए अपने भाषण में स्वराज्य को मुख्य स्थान देेते हुए कहा, ‘हम कोई कृपा की याचना नहीं कर रहे हैं, हमें तो केवल न्याय चाहिए।
आरंभ से ही अपने प्रयत्नों के दौरान में मुझे इतनी असफलताएं मिली हैं जो एक व्यक्ति को निराश ही नहीं बल्कि विद्रोही भी बना देने के लिए पर्याप्त थीं, पर मैं हताश नहीं हुआ हूं और मुझे विश्वास है कि उस थोड़े से समय के भीतर ही, जब तक मै जीवित हूं, सद्भावना, सच्चाई तथा सम्मान से परिपूर्ण स्वायत्त शासन की मांग को परिपूर्ण, करने वाला संविधान भारत के लिए स्वीकार कर लिया जाएगा।’

लाला लाजपत राय

ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध आजीवन विद्रोह का स्वर मुखरित करने वाले राष्ट्रभक्त लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब प्रांत के मोगा जिले में एक अग्रवाल परिवार में हुआ था। लाला जी सही मायने में क्रांतिकारी थे। वे क्रांति के द्वारा भारत की स्वतंत्रता चाहते थे, भिक्षु बनकर नहीं। किशोरावस्था में स्वामी दयानंद सरस्वती से मिलने के बाद आर्य समाजी विचारों ने उन्हें प्रेरित किया। आजादी के संग्राम में वे तिलक के राष्ट्रीय चिंतन से भी बेहद प्रभावित रहे। लाल-बाल-पाल त्रयी के स्वतंत्रता आन्दोलन में योगदान में लाला लाजपत राय का सम्माननीय स्थान है। इन्हीं तीनों नेताओं ने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वतन्त्रता की मांग की थी। बाद में समूचा देश इनके साथ हो गया। लालाजी ने हिन्दी में शिवाजी, श्रीकृष्ण और कई महापुरुषों की जीवनियां लिखीं। उन्होने देश में और विशेषत: पंजाब में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बहुत सहयोग दिया। देश में हिन्दी लागू करने के लिये उन्होंने हस्ताक्षर अभियान भी चलाया था।
1905 में लाजपत राय गोपाल कृष्ण गोखले के साथ कांग्रेस प्रतिनिधि के रूप में इंग्लैंड गए और वहां की जनता के सामने भारत की आजादी का पक्ष रखा। 1907 में पूरे पंजाब में उन्होंने खेती से संबंधित आन्दोलन का नेतृत्व किया। लालाजी 1908 में पुन: इंग्लैंड गए और वहां भारतीय छात्रों को राष्ट्रवाद के प्रति जागृत किया। उन्होंने 1913 में जापान व अमेरिका की यात्राएं की और स्वदेश की आजादी के पक्ष को जताया। उन्होंने अमेरिका में 15 अक्टूबर, 1916 को ‘होम रूल लीग’ की स्थापना की।
नागपुर में आयोजित अखिल भारतीय छात्र संघ सम्मेलन (1920) के अध्यक्ष के नाते छात्रों को उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन से जुडऩे का आह्वान किया। 1921 में वे जेल गए। उन्होंने कुछ समय हरियाणा के रोहतक और हिसार शहरों में वकालत भी की और स्वामी दयानन्द सरस्वती के साथ मिलकर आर्य समाज को पंजाब में लोकप्रिय बनाने के लिए काम किया। लाला हंसराज के साथ दयानन्द एंग्लो वैदिक (डीएवी स्कूल) विद्यालयों की स्थापना और प्रसार किया। लालाजी ने अनेक स्थानों पर अकाल में शिविर लगाकर लोगों की सेवा भी की। 30 अक्टूबर 1928 को इन्होंने लाहौर में साइमन कमीशन के विरुद्ध आयोजित एक विशाल प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जिसके दौरान हुए लाठी-चार्ज में ये बुरी तरह से घायल हो गये। उस समय इन्होंने कहा था- ‘मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।’ और वही हुआ भी। लालाजी के बलिदान के 20 साल के भीतर ही ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया। 17 नवंबर 1928 को इन्हीं चोटों की वजह से इनका देहान्त हो गया।
लाला जी की मृत्यु से सारा देश उत्तेजित हो उठा और चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों ने लालाजी पर जानलेवा लाठीचार्ज का बदला लेने लेने के लिए अपने प्रिय नेता की हत्या के ठीक एक महीने बाद 17 दिसम्बर 1928 को ब्रिटिश पुलिस के अफसर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया। लालाजी की मौत के बदले सांडर्स की हत्या के मामले में ही राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।

विनोबा भावे

महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के एक गांव ‘गागोदा’ के चितपावन ब्राह्मण नरहरि भावे के पुत्र के रुप में 11 सितंबर 1895 को जन्मे विनोबा भावे ने मां भारती की सेवा कर अपना नाम दुनिया के इतिहास में अमर कर लिया। विनोबा के बचपन का नाम विनायक था। विनोबा नाम गांधी जी ने दिया था।
विनोबा भावे के ऊपर उदार-चित्त, आठों याम भक्ति-भाव में डूबी रहने वाली अपनी मां रुक्मिणी बाई का गहरा प्रभाव पड़ा था। विनोबा का मन भी हमेशा अध्यात्म चिंतन में लीन रहता। विनोबा को अध्यात्म के संस्कार देने, उन्हें भक्ति-वेदांत की ओर ले जाने में, बचपन में उनके मन में संन्यास और वैराग्य की प्रेरणा जगाने में जहां उनकी मां रुक्मिणी बाई का योगदान था वहीं गणित की सूझ-बूझ और तर्क-सामथ्र्य, विज्ञान के प्रति गहन अनुराग, परंपरा के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तमाम तरह के पूर्वाग्रहों से अलग हटकर सोचने की कला उन्हें पिता से प्राप्त हुई थी।
विनोबा ने जीवन भर गांधी को जिया। वे महात्मा गांधी के सच्चे अनुयायी थे। स्वतन्त्रता के पूर्व गान्धीजी के रचानात्म्क कार्यों में सक्रिय रूप से योगदान देते रहे। विनोबा ने खुद को गांधी जी के आश्रम के लिए समर्पित कर दिया। अध्ययन, अध्यापन, कताई, खेती के काम से लेकर सामुदायिक जीवन तक आश्रम की हर गतिविधि में वे आगे रहते। वर्धा में गांधी जी के नये आश्रम के निर्माण और देखरेख की जिम्मेदारी विनोबा के कन्धे पर डाली गयी तो वे 8 अप्रैल 1923 को वर्धा चले गये। वहां उन्होंने ‘महाराष्ट्र धर्म’ मासिक का संपादन शुरू किया। मराठी में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका में विनोबा ने नियमित रूप से उपनिषदों और महाराष्ट्र के संतों पर लिखना आरंभ कर दिया। पत्रिका को अप्रत्याशित लोकप्रियता मिली जिससे उसे जल्दी ही साप्ताहिक कर देना पड़ा। कार्यधिक्य से उनका स्वास्थ्य गिरने लगा, डाक्टर ने उन्हें किसी पहाड़ी स्थान पर जाने की सलाह दी। अत: 1937 ई0 में विनोबा भावे पवनार आश्रम में गये। तब से लेकर जीवन पर्यन्त उनके रचनात्मक कार्यों का केन्द्र पवनार आश्रम ही रहा।
रचानात्म्क कार्यों के अतिरिक्त वे महान स्वतंत्रता सेनानी भी थे। नागपुर झंडा सत्याग्रह में वे बंदी बनाये गये। 1937 में गांधी जी जब लंदन की गोलमेज कांफ्रेंस से खाली हाथ लोटे तो जलगांव में विनोबा भावे ने एक सभा में अंग्रेजों की आलोचना की तो उन्हें बंदी बनाकर छह माह की सजा दी गयी। कारागार से मुक्त होने के बाद गांधी जी ने उन्हें पहला सत्याग्रही बनाया। द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रतानिया हुकूमत द्वारा भारत को जबरन झोंकने के खिलाफ विनोबा भावे ने 17 अक्टूबर 1940 को सत्याग्रह किया और बंदी बनाये गये तथा उन्हें 3 वर्ष के लिए सश्रम कारावास का दंड मिला। गांधीजी ने 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन करने से पूर्व विनोबाजी से परामर्श लिया था।
देश को आजादी मिलने के बाद विनोबा ने स्वयं को राजनीति की जगह रचनात्मक कार्यों में लगा लिया। उन्होंने वर्ष 1951 में भूदान आन्दोलन के रूप में स्वैच्छिक भूमि सुधार आन्दोलन आरंभ किया। उनकी कोशिश थी कि भूमि का पुनर्वितरण सिर्फ सरकारी कानूनों के जरिए नहीं हो, बल्कि एक आंदोलन के माध्यम से इसकी सफल कोशिश की जाए। भूदान आंदोलन को सफल बनाने के लिए विनोबा ने गांधीवादी विचारों पर चलते हुए ट्रस्टीशिप जैसे विचारों को प्रयोग में लाया। उन्होंने सर्वोदय समाज की स्थापना की। यह रचनात्मक कार्यकर्ताओं का अखिल भारतीय संघ था, जिसका उद्देश्य अहिंसात्मक तरीके से देश में सामाजिक परिवर्तन लाना था।
18 अप्रैल 1951 को आचार्य विनोबा भावे को तेलंगाना क्षेत्र में स्थित पोचमपल्ली गांव में जमीन का पहला दान मिला। यह विनोबा के उसी भूदान आंदोलन की शुरुआत थी, जो अब इतिहास के पन्नों में दर्ज है। विनोबा पदयात्राएं करते और गांव-गांव जाकर बड़े भूस्वामियों से अपनी जमीन का कम से कम छठा हिस्सा भूदान के रूप में भूमिहीन किसानों के बीच बांटने के लिए देने का अनुरोध करते। शुरुआती दिनों में विनोबा ने तेलंगाना क्षेत्र के करीब 200 गांवों की यात्रा की थी और उन्हें दान में 12,200 एकड़ भूमि मिली। इसके बाद आंदोलन उत्तर भारत में फैला। बिहार और उत्तर प्रदेश में इसका गहरा असर देखा गया। मार्च 1956 तक दान के रूप में 40 लाख एकड़ से भी अधिक जमीन बतौर दान मिल चुकी थी। साल 1955 आते-आते आंदोलन ने एक नया रूप धारण किया। इसे ‘ग्रामदान’ के रूप में पहचाना गया। इसका अर्थ था ‘सारी भूमि गोपाल की’। ग्रामदान वाले गांवों की सारी भूमि सामूहिक स्वामित्व की मानी गई, जिस पर सबों का बराबर का अधिकार था। इसकी शुरुआत उड़ीसा से हुई और इसे काफी सफलता मिली। 1960 तक विनोबा के आह्वान पर देश में 4,500 से अधिक ग्रामदान गांव हो चुके थे। इनमें 1946 गांव उड़ीसा के थे, जबकि महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर था। वहां 603 ग्रामदान गांव थे। दान में मिली भूमि गरीबों व भूमिहीनों के बीच बांटी गयी। यह आजादी के बाद उन पहली कोशिशों में से एक था, जहां रचनात्मक आंदोलन के माध्यम से भूमि सुधार की कोशिशें की गई थी।

पं. गोविंद वल्लभ पंत

प्रसिद्ध देशभक्त, राजनितिज्ञ और आधुनिक उत्तर प्रदेश के निर्माण की नींव रखने वाले पंडित गोविन्द वल्लभ पंत का जन्म 30 अगस्त 1887 ईस्वी को अल्मोड़ा (अब उत्तराखंड) के निकट खूंट नामक गांव में हुआ था। उनकी आरम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुयी। बाद में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की। इलाहाबाद में आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. कैलाश नाथ काटजू आदि उनके सहपाठी थे। वहीं से पंत जी सार्वजनिक कार्यो में रूचि लेने लगे।
1905 की बनारस कांग्रेस अधिवेशन में वे स्वयंसेवक के रूप में सम्मिलित हुए थे जहां अध्यक्ष गोपाल कृष्ण गोखले के भाषण का उन पर बहुत प्रभाव पड़ा। वकालत की परीक्षा पास करने के बाद पंत जी ने कुछ दिन अल्मोड़ा और रानीखेत में वकालत की, फिर काशीपुर (नैनीताल) आ गये। यहां वकालत के साथ ही वे सार्वजनिक कार्यो में भी सक्रिय हो गये। इनके प्रयत्न से ‘कुमाऊं परिषद’ की स्थापना हुयी जिसने 1921 में कुमाऊं में प्रचलित ‘कुली बेगार’ की अपमानजनक प्रथा का अंत कराया। रोलेट एक्ट के विरोध में जब गांधीजी ने 1920 में असहयोग आन्दोलन आरम्भ किया तो पन्त जी ने अपनी चलती वकालत छोड़ दी। वे नैनीताल जिला बोर्ड तथा काशीपुर नगर पालिका के अध्यक्ष चुने गये। स्वराज्य पार्टी के उम्मीदवार के रूप में 1923 में पंत जी उत्तर प्रदेश विधान परिषद के चुनाव में सफल हुए और स्वराज्य पार्टी के नेता के रूप में वहां अपनी धाक जमा दी।
दिसम्बर 1921 में वे गांधी जी के आह्वान पर असहयोग आन्दोलन के रास्ते खुली राजनीति में उतर आये। 9 अगस्त 1925 को काकोरी ट्रेन लूट कांड के बाद जब पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल आदि क्रांतिकारी गिरफ्तार हुए तो उनके मुकदमें की पैरवी के लिये अन्य वकीलों के साथ पन्त जी ने जी-जान से सहयोग किया। उस समय वे नैनीताल से स्वराज पार्टी के टिकट पर लेजिस्लेटिव कौन्सिल के सदस्य भी थे। 1927 में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ व उनके तीन अन्य साथियों को फांसी के फन्दे से बचाने के लिये उन्होंने पण्डित मदन मोहन मालवीय के साथ वायसराय को पत्र भी लिखा। 1928 के साइमन कमीशन के बहिष्कार और 1930 के नमक सत्याग्रह में भी उन्होंने भाग लिया और मई 1930 में देहरादून जेल की हवा भी खायी।
पन्त जी उत्तर प्रदेश के कई बार मुख्यमंत्री बने। ब्रिटिश शासन के दौरान वे 17 जुलाई 1937 से लेकर 2 नवम्बर 1939 तक संयुक्त प्रान्त (अब उत्तर प्रदेश) के पहले मुख्य मंत्री बने। इसके बाद दोबारा उन्हें 1 अप्रैल 1946 से 15 अगस्त 1947 यही दायित्व फिर सौंपा गया। जब देश आजाद हुआ और भारतवर्ष का अपना संविधान बन गया तब संयुक्त प्रान्त का नाम बदल कर उत्तर प्रदेश हुआ तो फिर से तीसरी बार उन्हें ही इस पद के लिये सर्व सम्मति से चुना गया। इस प्रकार स्वतन्त्र भारत के नवनामित राज्य के भी वे 26 जनवरी 1950 से लेकर 27 दिसम्बर 1954 तक मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने उत्तर प्रदेश के विकास की आधारशिला रखी और लोकतंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

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