बुरे दौर में ऑटो इंडस्ट्री

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आर्थिक मंदी की वजह से ऑटो इंडस्ट्री बुरे दौर से गुजर रही है। ऑटो कंपनियों के संगठन- सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (एसआईएएम) के आंकड़ों के मुताबिक जून महीने में कारों की घरेलू बिक्री भी 24.97 फीसदी घटी है। जून में यह आंकड़ा 1,39,628 यूनिट्स का रहा, जो पिछले साल जून में 1,83,885 यूनिट था। यह लगातार आठवां महीना है जब यात्री वाहनों की बिक्री में कमी दर्ज की गई। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से तकरीबन 3.5 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करने वाले ऑटो सेक्टर में आई इस मंदी से हाहाकार मचा हुआ है। मारुति और टाटा जैसे दिग्गजों ने धीमी मांग के चलते या तो प्रोडक्शन कम कर दिया है या अपने कारखाने बंद कर दिए हैं। ऑटो सेक्टर में मंदी का ये दौर आगे और भी बुरा हो सकता है।’
लगातार गिरती बिक्री के ​चलते कार और बाइक निर्माता कंपनियां भी बड़े पैमाने पर नौकरियों में कटौतियां कर रही हैं। यहां तक की कई कंपनियों ने अपने कारखानों को भी बंद कर दिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार वाहन निर्माता, पाट्र्स निर्माता और डीलर्स ने बीते अप्रैल महीने से 3.50 लाख से ज्यादा कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है।
ऑटो सेक्टर के जानकारों का मानना है कि शुरूआती दौर में कार और बाइक निर्माता कंपनियों ने देश भर में 15,000 और कंपोनेंट निर्माताओं ने तकरीबन 1 लाख से ज्यादा कर्मचारियों को बाहर ​निकाला था। हाल के दिनों में पांच ऐसे दिग्गज वाहन निर्माताओं की पहचान की गई हैं जिन्होंने आने वाले दिनों में बड़े पैमाने पर नौकरियों में कटौती करने की योजना बनाई है। ऑटो सेक्टर में आई इस मंदी से हालात और खराब हो सकते हैं। निजी डेटा समूह (सीएमआईई) के अनुसार, जुलाई 2019 में भारत की बेरोजगारी दर एक साल पहले के 5.66 प्रतिशत से बढक़र 7.51 प्रतिशत हो गई। एसआईएएम के महानिदेशक विष्णु माथुर ने के अनुसार भारत में हाल के महीनों में 15 वाहन निर्माता कंपनियों के तकरीबन 7 प्रतिशत अस्थाई कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया है। अपना दूसरा कार्यकाल शुरू कर चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।

मंदी से नौकरी गंवाने वाले कर्मचारियों का दर्द

ऑटो इंडस्ट्री में आई मंदी को सबसे बड़ी चिंता के तौर पर देखा जा रहा है। कई कार मैन्यूफेक्चरिंग कंपनियों ने डिमांड में गिरावट के चलते प्रोडक्शन बंद करने का ऐलान कर दिया है। ऐसे में इस मंदी की मार का शिकार ऑटो प्रोडक्शन कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारी बने हैं। कई कंपनियों ने प्रोडक्शन यूनिट में काम करने वाले कर्मचारियों को घर जाने के लिए कह दिया है। ऑटो इंडस्ट्री से जुड़े जानकारों की मानें तो आने वाले महीनों में इस सेक्टर में काम करने वाले कम से कम दस लाख लोगों की नौकरियां छिन सकती हैं। सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटो मोबाइल मैन्यूफेचर्स की 13 अगस्त को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कुल कार बिक्री जुलाई में 18-71 फीसदी गिरकर 18,25,148 रही जो जुलाई 2018 में 22,45,223 थी। ये दिसंबर 2000 के बाद कार बिक्री में आयी सबसे बड़ी गिरावट है। उस दौरान कार बाजार में 21-81 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी थी।

‘मारुति ने घटाया उत्पादन’

देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया ने वाहन उद्योग में जारी सुस्ती के मद्देनजर जुलाई महीने में उत्पादन में 25.15 प्रतिशत की कटौती की है। यह लगातार छठवां महीना है जब कंपनी ने उत्पादन घटाया है। मारुति ने हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में बताया कि उसने जुलाई 2019 में 1,33,625 वाहनों का उत्पादन किया है। एक साल पहले इसी महीने में कंपनी ने 1,78,533 इकाइयों का उत्पादन किया था। कंपनी की मारुति आल्टो, वैगनआर, सेलेरियो, इग्निस, स्विफ्ट, बलेनो, डिजायर समेत छोटी और कॉम्पैक्ट सेग्मेंट में जुलाई 2019 में उत्पादन 25 प्रतिशत घटकर 95,733 वाहनों पर रहा। जिप्सी, विटारा ब्रेजा, अर्टिगा और एस-क्रॉस जैसे यूटिलिटी वाहनों का उत्पादन 21.26 प्रतिशत घटकर 19,464 इकाइयों पर रहा।

‘टाटा, महिंंद्रा ने बंद किए प्लांट’

टाटा मोटर्स ने पिछले एक माह में अपने चार संयंत्रों को बंद कर दिया है। टाटा मोटर्स के एक बयान में कहा गया है कि, डिमांड और सप्लाई में आए अंतर के चलते ऐसा किया गया है। वहीं महिंद्रा ने कहा है कि अप्रैल और जून महीने के बीच 5 से 13 दिन ऐसी स्थिति रही जब उत्पादन हुआ ही नहीं।

आर्थिक आपातकाल

मैन्यूफैक्चरिंग आउटपुट में भारी गिरावट और कृषि सेक्टर के खराब प्रदर्शन की वजह से फाइनेंशियल ईयर 2019-20 की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ गिरकर 6 साल के निचले स्तर 5 प्रतिशत पर आ गई है। साथ ही मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में ग्रॉस वैल्यू एडेड लुढक़कर 0.6 पर आ गई है। जबकि पिछले फाइनेंशियल ईयर में ये 12.1 परसेंट थी। बायोकॉन की चेयरमैन और एमडी किरण मजूमदार ने इसे ‘आर्थिक आपतकाल’ की संज्ञा देते हुए सरकार के लिए नींद से जागने का वक्त कहा है। देश की ग्रोथ रेट में गिरावट पर अर्थशास्त्रियों, एक्सपट्र्स, कारोबारियों की चौंकाने वाली प्रतिक्रिया सामने आई है। ज्यादातर लोगों के अनुमान से काफी खराब आंकड़े आए हैं। इनका मानना है कि सरकार और रिजर्व बैंक को इस चुनौती से निपटने के लिए अब कदम उठाने ही होंगे…

चीन, फिलीपींस और इंडोनेशिया से पिछड़ गया भारत : सुजान हाजरा

जीडीपी के आंकड़े उम्मीदों से काफी खराब आए हैं। अब भारत सिर्फ चीन ही नहीं, फिलीपींस और इंडोनेशिया से पिछड़ गया है। ये साफ हो गया है कि प्राइवेट कंजम्प्शन और डिमांड में भारी कमी के चलते ग्रोथ प्रभावित हुई है। उम्मीद है कि इस फाइनेंशियल ईयर की दूसरी छमाही में रिकवरी देखने को मिले।
चीफ इकनॉमिस्ट (आनंद राठी ब्रोकर्स)

गिरती मांग सुस्ती की वजह : दीप्ति मैथ्यू

जीडीपी ग्रोथ गिरकर 5 प्रतिशत पर आना चिंताजनक है। आंकड़े गवाह हैं कि देश अभी भी रिकवरी के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ा है। गिरती मांग अर्थव्यवस्था में सुस्ती का सबसे बड़ा कारण है। अगले कुछ महीनों में आरबीआई और सरकार से अच्छे फैसलों की उम्मीद की जाती है।
इकनॉमिस्ट (जियोजीत फाइनेंशियल)

आंकड़ा चौंंकाने वाला : गौरव कुमार

जीडीपी के आंकड़ों ने काफी हद तक चौंकाया है। अनुमान था कि जीडीपी 5.6 से 5.7 प्रतिशत के बीच रहेगी। अगली कुछ तिमाहियों में रिकवरी की उम्मीद कर सकते हैं, क्योंकि एनबीएफसी सेक्टर में अब हल्की रिकवरी दिखने लगी है। मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ाने के लिए कदम उठाना जरूरी हो गया है।
प्रिंसिपल रिसर्च एनालिस्ट, फंड्सइंडियाडाटकॉम

मंदी चिंताजनक : रूपा रेगे नित्सुरे

पहली तिमाही में जिस तरीके से लैंडिंग के आंकड़े आ रहे थे उससे जो तस्वीर बनी थी वही आज जीडीपी के आंकड़ों में भी दिख रही है। अर्थव्यवस्था पर गिरती डिमांड और बदहाल मैन्यूफैक्चरिंग का असर देखने को मिल रहा है। माइनिंग और पावर सेक्टर को छोडक़र ज्यादातर सेक्टरों में गिरावट दिख रही है। यह काफी चिंताजनक है।
ग्रुप चीफ इकनॉमिस्ट, एलएंडटी फाइनेंशियल होल्डिंग

टेक्सटाइल उद्योग : मंदी की मार से धराशायी

आर्थिक मंदी की चपेट में टेक्सटाइल उद्योग भी है। सूट से लेकर साड़ी तक और रूमाल से लेकर अंडरवियर तक की बिक्री घट रही है। 70 के दशक में अमेरिका के फेडरल रिजर्वे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन ने कहा था कि अगर पुरुषों के अंडरवियर बिक्री में कमी आए तो समझिए की इकॉनोमी में मंदी है। ये बात क्या 50 साल बाद भारत पर भी लागू हो रही है। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की मानें तो बारिश के मौसम में भी लोगों ने अंडर वियर की कम खरीददारी की। नतीजा अब रिटेल दुकानदार कम सामान मंगा रहे हैं। होलसेल वालों के पास इतना सामान इक_ा है कि मैन्यूफेक्चरर से उन्होंने भी मंगाना कम कर दिया है। नतीजा ये कि बड़े ब्रांड वीआईपी क्लोथिंग, डॉलर इंडस्ट्री, जॉकी की बिक्री इस साल घट गई है।

आइडिया जो भारत की अर्थव्यवस्था को सही रास्ते पर लाने उसमें जान फूंकने की खातिर कारगर हो सकते हैं

एनबीएफसी को लाइफलाइन देने की शंकाओं या विरोध को छोडऩा होगा’
मुश्किल में फंसी कई कंपनियों के लिए टीएआरपी जैसा बोल्ड कदम उठाना चाहिए। जहां बात भरोसे की हो, वहां लिक्विडिटी (फं्ड) की कमी को सॉल्वेंसी क्राइसिस (कंपनी के वजूद पर संकट) में न बदलने दिया जाए। (नोट : टीएआरपी यानी ट्रबल्ड एसेट्स रिकंस्ट्रक्शन प्रोग्राम को बेन बर्नान्की ने लीमैन ब्रदर्स के दिवालिया होने के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए लॉन्च किया था और इसे शानदार सफलता मिली थी)
एक लाख करोड़ डॉलर का सॉवरिन फंड बनाया जाए
इस प्रोफेशनली मैनेज्ड कंपनी को विदेशी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट कराया जाए, जो एक तरह से ‘इंडिया स्टॉक’ यानी भारत का शेयर होगा। इसे कमजोर और गैर-प्रमुख कारोबार को बेचने की छूट दी जाए। इससे कई सौ अरब डॉलर का प्रॉडक्टिव इनवेस्टमेंट हो सकता है। इसमें पहले फेज में कंपनी शुरू और खड़ी करने के लिए निवेश करना होगा और बाद में उसमें विनिवेश करके रिटर्न हासिल किया जा सकता है।
‘संपत्तियों को बचाइए, घाटे को इक्विटी-बॉन्ड निवेशकों पर डालिए’
मोदी सरकार ने कंपनियों के बदमाश मालिकों और मैनेजरों को सजा दिलाने की कोशिश के साथ संपत्तियों को खत्म करने की भारी भूल की है। ढ्ढरु&स्नस् और जेट एयरवेज इसकी दो बड़ी मिसालें हैं। दोनों ही मामलों में हेल्दी एसेट्स को बचाया जा सकता था और साथ ही कानून तोडऩे वालों को सजा भी दिलाई जा सकती थी। इससे हजारों निर्दोष कर्मचारियों का रोजगार बचता और पूरा घाटा रिस्क कैपिटल के मालिकों पर डाला जाता। आखिर, हवाई जहाज, सडक़ें और फ्लैट्स तो अपराधी नहीं हैं!
डीप डिस्काउंट इक्विटी इश्यू का इस्तेमाल किया जाए
मोदी सरकार ने पिछले कई वर्षों में सरकारी बैंकों में बूंद-बूंद की शैली में निवेश करके उस पैसे को जाया कर दिया है। अब उसे सारे बैंकों की बैलेंस शीट को एक साथ दुरुस्त करना और इसके प्रभाव को बढ़ाने के लिए ‘राइट्स बेसिस पर अटैच्ड वॉरंट के साथ डीप डिस्काउंट इक्विटी इश्यू’ लाना होगा।
‘आईबीसी में व्यापक बदलाव हो’
इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) यानी दिवाला कानून में अब तक के तजुर्बों के आधार पर व्यापक बदलाव किया जाए। इसे कैपिटल एसेट्स मोबिलिटी के लिए तेज और निर्णायक कानून में बदला जाए।
‘इक्विटी कैपिटल पर सितम ढाने वाले टैक्स हटें’
इस मामले में स्थिति को तुरंत सुधारने की जरूरत है। लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस और डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स को खत्म कर देना चाहिए। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों से सुपररिच सरचार्ज भी हटाया जाना चाहिए। डिफरेंशियल वोटिंग राइट्स शेयर जारी करने में आने वाली सारी बाधाएं दूर होनी चाहिए। एंजेल और वैल्यूएशन मिसमैच टैक्स को तो सारी कंपनियों के लिए खत्म करने की जरूरत है।
‘टैक्स टेररिज्म को रोकिए’
मोदी सरकार को मानना चाहिए कि उसने टैक्स अधिकारियों को गिरफ्तार करने और दूसरे अधिकार देकर भस्मासुर खड़ा कर दिया है। उनसे इस तरह के सारे अधिकार वापस लिए जाने चाहिए।
‘फिस्कल डेफिसिट डेटा में हेराफेरी बंद हो’
सरकार ने अपने बहीखाते से बाहर जो भी कर्ज लिए हैं, अगर उसे परपेचुअल बॉन्ड में बदला जाए तो एक झटके में यह खत्म हो सकता है। इसके बाद इसमें पारदर्शिता बरती जाए।
‘महत्वपूर्ण रेगुलेटरी संस्थाओं में रिटायर्ड नौकरशाहों की नियुक्ति बंद हो’
आधुनिक सोच रखने वाले विश्वसनीय एक्सपट्र्स को महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्रों की निगरानी का काम सौंपा जाना चाहिए। अगर रेगुलेटरों और मंत्रियों के बीच मतभेद होते हैं तो पीएम मोदी को ऐसे विरोध पर खुश होना चाहिए क्योंकि इससे समस्याओं के ईमानदार हल निकलेंगे।

आर्थिक तबाही से बचने के लिए चाहिए साहस समझ : सुब्रमण्यम स्वामी

सुब्रमण्यम स्वामी ने गिरती अर्थव्यवस्था पर ट्वीट करते हुए चिंता जतााते हुए सरकार पर व्यंग्य किया है। स्वामी ने ट्विटर पर लिखा, ‘अगर नई आर्थिक नीति नहीं बनाई गई तो हमें 5 ट्रिलियन डॉलर की इकनॉमी का टार्गेट छोड़ देना चाहिए। केवल फैसले लेने का साहस या सिर्फ आर्थिक ज्ञान गिरती अर्थव्यवस्था को नहीं बचा सकता। इसके लिए दोनों की जरूरत होती है। लेकिन आज हमारे पास दोनों नहीं है।’

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